इजरायल में फाइटर पायलटों ने ट्रेनिंग से किया इनकार, पूरे देश में विरोध के बावजूद क्यों अड़े हैं नेतन्याहू?
Israel Protest: इजरायल में नेतन्याहू सरकार के न्यायिक फेरबदल के विरोध में 37 रिजर्व इजरायली वायु सेना के पायलटों ने प्रशिक्षण या रिजर्व ड्यूटी में भाग लेने से इनकार कर दिया है।

Image: Oneindia
इजरायल में वायुसेना के दर्जनों रिजर्व कर्मचारियों ने ऐलान किया है कि वे सरकार के न्यायिक फेरबदल के विरोध में प्रशिक्षण दिवस पर ड्यूटी में हिस्सा नहीं लेंगे। इजरायली वायुसेना के 69वें स्क्वाड्रन के 40 में से 37 रिजर्व पायलट जो F-15 फाइटर जेट्स का संचालन करते हैं, ने एक खुला पत्र लिखकर इस बात की घोषणा की है कि वे देश की न्यायपालिका की शक्ति को मौलिक रूप से प्रतिबंधित करने की सरकार की योजना के विरोध में इसी सप्ताह 8 मार्च को होने वाले अभ्यास में हिस्सा नहीं लेंगे। इसके बजाय वे लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता के लिए संवाद करेंगे। पायलटों ने धमकी दी है कि जब तक सरकार अपनी न्यायिक सुधार योजनाओं को जारी रखेगी, तब तक वे प्रशिक्षण नहीं करेंगे।
विपक्षी नेता भी हुए नाराज
इजरायली सेना ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है लेकिन इजरायल के रक्षामंत्री योव गैलेंट ने कहा कि सैन्य अवज्ञा के लिए कोई भी आह्वान सेना के कामकाज और उसके कर्तव्यों को पूरा करने की क्षमता को नुकसान पहुंचाएगा। विपक्ष के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड ने भी इसकी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि वे उनकी चिंताओं को समझ सकते हैं मगर यह सही तरीका नहीं है। एक इंटरव्यू में लायर लैपिड ने कहा, "मैं ऐसे विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ हूं। मुझे नहीं लगता कि यह सही तरीका है। मैं दर्द, दुख, भय और रोष को समझता हूं। लेकिन मुझे लगता है कि यह एक गलती है। हमारे पास एक सेना है, और और उनके लिए 'मना' करना 'मना' है।"
69वां स्क्वाड्रन क्यों है खास?
आपको बता दें कि 69वां स्क्वाड्रन जिसे हैमर्स नाम से भी जाना जाता है, दक्षिणी इजरायल के हेट्जेरिम एयरबेस से F-15 फाइटर जेट्स का संचालन करता है। ये इजरायल की सेना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यह दल पिछले एक दशक में सीरिया में ईरानी समर्थित हिजबुल्लाह के आतंकी नेटवर्क को नुकसान पहुंचाने और उनके घुसपैठ को रोकने के लिए जाना जाता रहा है। 2007 में स्क्वाड्रन ने सीरिया के परमाणु रिएक्टर पर हमला किया था जिसे दुनिया भर में ऑपरेशन ऑर्चर्ड के रूप में जाना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट पर अंकुश लगाने की तैयारी
इजरायल के गठन के बाद से ऐसा पहली बार हो रहा है जब देश में इस कदर विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार सुप्रीम कोर्ट पर अंकुश लगाने के लिए न्यायपालिका में बदलाव का प्रयास कर रही है। दरअसल न्यायिक प्रणाली में सुधार को लेकर बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार एक नया बिल लेकर आयी है जिसे लेकर 2 महीने से भी अधिक समय से हंगामा हो रहा है। यदि सरकार कानून बनाने में सफल हो जाती है तो सुप्रीम कोर्ट, संसद में पास कानूनों को आसानी से पलट नहीं पाएगा। इतना ही नहीं इस कानून के बनने से सरकार कोर्ट के जजों को चुनने में और स्वतंत्र हो पाएगी। और तो और साधारण बहुमत से ही संसद, सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक को बदलने में सक्षम हो जाएगी।
प्रस्ताव का क्यों हो रहा विरोध?
लोगों को यह प्रस्ताव पसंद नहीं आ रहा है और इसके विरोध में लगभग 2 महीनों से लाखों की संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ऐसे बदलाव लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला हैं। विश्लेषकों का भी ये मानना है कि प्रस्तावित सुधार न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा देंगे। इस नई व्यवस्था ने न सिर्फ भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा बल्कि ये अल्पसंख्यकों के हक में बाधा डालेंगे। इससे लोगों का न्याय व्यवस्था में भी भरोसा कमजोर पड़ेगा। लोग इजराइली सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश एस्थर हयात और देश के अटॉर्नी जनरल तक का विरोध कर रहे हैं और उन्हें इसमें शामिल बता रहे हैं।
विरोध के बावजूद क्यों अड़ी है सरकार?
इजरायल की नेतन्याहू सरकार का कहना है कि जजों के दबदबे पर अंकुश लगाने के लिए अदालती सुधारों की जरूरत है। दरअसल नेतन्याहू अपने आप को फिर से मजूबत करने की कोशिशों में लगे हुए हैं लेकिन न्यायिक व्यवस्था इसमें मुश्किलें खड़ी कर रहा है। इजरायली पीएम खुद भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी आदि के गंभीर मामले में फंसे हुए हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने सिगार और शैंपेन जैसी चीजों को घूस के तौर पर लिया और खबर प्रकाशित करने के एवज में मीडिया के लोगों को राजनीतिक लाभ दिया।
अदालती झंझट खत्म करना चाहते हैं पीएम
नेतन्याहू के करीबी सहयोगी रहे पत्रकार नीर हेफेत्ज, शीर्ष सहायक रहे श्लोमो फिल्बर मामले में उनके खिलाफ हो गए हैं। वे कोर्ट में नेतन्याहू के खिलाफ गवाही दे चुके हैं। उनका फंसना तय माना जा रहा है। इसका अनुमान पहले से लगाया जा रहा था कि अगर नेतन्याहू चुनाव हार जाते हैं तो वे पक्का जेल जाएंगे और जीत जाते हैं तो भी अदालत उन्हें परेशान करती रहेगी और जेल जाने का खतरा फिर भी बना रहेगा। ऐसे में यह भी माना जा रहा था कि चुनाव जीतने के बाद वे ऐसा कानून लाएंगे जिससे उनके सारे केस रद्द हो जाएं। अनुमानों को सही करते हुए, चुनाव जीतने के कुछ ही समय बाद इजरायली पीएम अपने मिशन को पूरा करने में लग गए।
आम से खास तक, हर जगह विरोध
इजरायली पीएम इसमें सफल भी हो जाते मगर जनता का 'अदालती प्रेम' जाग गया। आपको बता दें कि इजरायल का कोई लिखित संविधान नहीं है। ऐसे में लोगों को आशंका है कि यदि पीएम कानून बनाने में सफल हो जाते हैं तो इजरायल का लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा। एक लिखित दस्तावेज के अभाव में सरकार में बैठ लोग कानून को अपने मुताबिक बना और बिगाड़ सकेंगे। इससे देश में नागरिकों और उनके अधिकार खतरे में पड़ जाएंगे। लोकतंत्र के कमजोर होने का खतरा न सिर्फ आम लोगों को है बल्कि कई बड़े लोगों को भी इसका आभास है। यही वजह है कि 500 से भी अधिक पुलिस के पूर्व अधिकारी समेत, मोस्साद के अनेक पूर्व प्रमुखों ने नेतान्याहू के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है। मोसाद के पूर्व प्रमुख तामीर पार्दो, दैनी यतोम, पूर्व पुलिस आयुक्त श्लोमो अहरोनिशकी और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार उजी अरद आदि इसमें शामिल हैं।
नेतन्याहू ने नहीं मानी बाइडेन की बात
दैनी यातोम ने एक इंटरव्यू में कहा कि अगर नेतान्याहू इसी तरह से अदालत की स्वायत्तता का अंत करने की कोशिशों में लगे रहे तो फायटर पायलट्स और स्पेशल फोर्सेस भी सरकार के आदेशों का उल्लंघन करने के लिए कानूनी रूप से सक्षम हो जाएंगे। यातोम ने कहा कि अगर इजरायल तानाशाहीपूर्ण देश बन जाता है और सैन्य बलों को एक अवैधानिक सरकार से आदेश मिलते हैं तो उन्हें उनको मानने से इनकार करने का पूरा अधिकार होगा। इसकी गंभीरता को समझते हुए अमेरिका ने भी ने भी सरकार को चेतावनी दी थी, लेकिन नेतान्याहू ने राष्ट्रपति बाइडेन की हिदायतों को भी अनसुना कर दिया।












Click it and Unblock the Notifications