क्या नेपाल का राजनीतिक घटनाक्रम चीन के लिए भी झटका है ?

नई दिल्ली- नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (KP Sharma Oli) ने अपने दूसरे कार्यकाल के तीन साल से भी कम समय में सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (Nepal Communist Party) में अपने विरोधियों को बड़ा झटका दे दिया है। लेकिन, सवाल है कि 275 सदस्यों वाली नेपाली संसद को भंग करने की उनकी सिफारिश पर जिस तरह से वहां की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी (Bidya Devi Bhandari) ने फौरन मुहर लगाई है, वह क्या सिर्फ सत्ताधारी दल में नेपाली पीएम के विरोधियों के लिए ही सदमे की तरह है या इसने नेपाली सत्ता को बैकडोर से चलाने की ताक में लगे चीन और वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए असहज स्थिति पैदा की है। नेपाल में चीन परस्त कम्युनिस्टों की यह सरकार 2017 में विपक्षी नेपाली कांग्रेस को बुरी तरह हराकर सत्ता में आई थी।

ओली विरोधी खेमा को झटका

ओली विरोधी खेमा को झटका

नेपाल की सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (Nepal Communist Party) में पीएम ओली विरोधी खेमे के लिए उनका संसद भंग करके चुनाव का रास्ता साफ करने का फैसला कितना जोरदार झटका है, यह इससे पता चलता है कि उन्होंने यही तर्क देने की कोशिश की है कि नेपाल के संविधान में नेपाली प्रधान मंत्री को संसद भंग करने का अधिकार ही नहीं है। सत्ताधारी दल के सेंट्रल कमिटी के एक सदस्य बिष्णु रिजाल ने एक न्यूज एजेंसी से कहा है कि पीएम ओली ने पार्टी में समझौता करने की बजाय संसद भंग करना चुना है। जबकि, उन्होंने पार्लियामेंट्री पार्टी, सेंट्रल कमिटी और पार्टी के सचिवालय में अपना बहुमत खो दिया था। नेपाल की सत्ताधारी दल में ओली विरोधी खेमा लगातार उन्हें हटाने की कई कोशिशें कर चुका था।

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    दो पार्टियों का विलय कर बनी थी नेपाली सत्ताधारी पार्टी

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    नेपाल की राजनीतिक घटनाक्रम को अच्छी तरह जानने वाले लोगों का कहना है कि संसद भंग होने के बाद ओली (KP Sharma Oli)को स्वतंत्र रूप से सरकार चलाने का मौका मिल गया है। यही नहीं अब उनके लिए सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (Nepal Communist Party)में विभाजन करना भी आसान हो गया है। गौरतलब है कि यह पार्टी 2018 में ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) और उनके विरोधी पुष्प कमल दहल उर्फ प्रंचड (Pushpa Kamal Dahal aka Prachanda) की अगुवाई वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-माओइस्ट सेंटर को विलय करके बनाई गई थी। पिछले कुछ महीने से प्रचंड का खेमा ओली को सत्ता से हटाने के लिए कई कोशिशें कर चुका था। लेकिन, राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनकर आए केपी शर्मा ओली कभी उनके आगे हथियार डालने को तैयार नहीं हुए। विरोधियों को कमजोर करने के लिए उन्होंने भारत के साथ नक्शा विवाद भी मोल ले लिया। ओली बार-बार यह संकेत दे रहे थे कि अगर उनकी कुर्सी छीनने की कोशिश हुई तो वह पार्टी को तोड़ देंगे।

    नेपाली सरकार में बढ़ गया था चीन का दखल

    नेपाली सरकार में बढ़ गया था चीन का दखल

    नेपाल में सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में टूट को रोकने के लिए चीन (China) की सरकार ने हर मुमकिन दखलंदाजी देने की कोशिश की। यह भी सच्चाई ये है कि अगर चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ने दखल नहीं दी होती तो जो स्थिति अब पैदा हुई है, चार-पांच महीने पहले भी आ सकती थी। शी जिनपिंग (Xi Jinping) ने अपनी चहेती राजनयिक हू यांकी (Hou Yanqi) को खास इसी मकसद से काठमांडू में तैनात किया था। इस साल अप्रैल-मई में जब चीन की सेना पूर्वी लद्दाख में भारत में घुसपैठ करने के लिए पैंतरेबाजियों में लगी थी, उस समय नेपाल में चीन की राजदूत यांकी नेपाल की सत्ताधारी दल के नेताओं के साथ बैठक पर बैठकें करके उनपर आपसी विवाद फौरन मिटाने के दबाव डाल रही थी। उनकी पैठ नेपाल सरकार में इतनी गहरी थी कि वह सभी प्रोटोकॉल तोड़कर सीधे नेपाली राष्ट्रपति से भी मुलाकात करके आ जाती थी, जिसपर नेपाल के बड़े अधिकारियों ने भी आपत्ति जताई थी।

    नेपाली राजनयिक से ओली का मोहभंग!

    नेपाली राजनयिक से ओली का मोहभंग!

    नेपाल की राजनीति को करीब से समझने वाले लोगों की मानें तो शुरू में तो लग रहा था कि चीन 68 साल के केपी शर्मा ओली (KP Sharma Oli)को प्रधानमंत्री बनाए रखना चाहता है, लेकिन इस साल जब उसे लगा कि अगर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को एकजुट रखने के लिए ओली की गर्दन (कुर्सी) भी लेनी पड़े तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन किसी भी सूरत में पार्टी टूटनी नहीं चाहिए। जिनपिंग ने इस काम के लिए यांकी को लग जाने को कह दिया। उनका नेपाली सत्ता में दखल बढ़ने लगा। उनके पीएम ओली से करीबी होने को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी शुरू हो गईं। कहा जाने लगा कि ओली पर पूरी तरह चीन की राजदूत हावी हो चुकी हैं। यह स्थिति पिछले महीने तक बनी रही। लेकिन, माना जा रहा है कि अचानक पीएम ओली ने चीन की राजदूत हू यांकी (Hou Yanqi) से कह दिया कि वह बिना किसी दूसरे देश की सहायता से भी नेपाल और सत्ताधारी दल के सामने आने वाली हर चुनौतियों से निपटने में सक्षम हैं।

    ओली ने ऐसा दिया जिनपिंग को झटका

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    लेकिन, नेपाल के मामलों में पिछले कुछ वर्षों में ड्रैगन का दबदबा किस कदर बढ़ चुका है, इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के मना करने के बावजूद चीनी राजदूत हू यांकी (Hou Yanqi) गुपचुप तरीके से अपने मिशन में लगी रहीं। नेपाली घटनाक्रम को जानने वाले लोगों का कहना है कि अलबत्ता अब उन्होंने सत्ताधारी पार्टी के नेताओं से मिलने के लिए बिना नंबरों वाली गाड़ियों या टैक्सियो का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। ऐसे ही एक जानकार ने बताया कि ओली से दो टूक जवाब सुनने के बाद चाइनीज राजदूत ने दो फॉर्मूले पर काम करना शुरू दिया था। वो ओली को किनारे रखकर सत्ताधारी पार्टी के नेताओं प्रचंड और माधव नेपाल के बीच कोई फॉर्मूला निकालने की कोशिशों में जुटी रही। उसने ओली को हटाकर उपप्रधानमंत्री बामदेव गौतम (Bamdev Gautam ) को प्रधानमंत्री बनाए जाने के एजेंडे पर भी काम किया। क्योंकि, गौतम ओली ही के पार्टी के हैं, इसलिए चीन को लगा कि ऐसा करने पर नेपाली पीएम पार्टी या सरकार का ज्यादा नुकसान नहीं कर सकेंगे।

    ओली ने लिया चुनाव में जाने का फैसला

    ओली ने लिया चुनाव में जाने का फैसला

    यहां तक कि चाइनीज एंबेसडर ने किसी युवा नेता को भी नेपाल की कमान सौंपने की तिकड़म रची। लेकिन, नेपाली पीएम ओली ने रविवार को संसद भंग करने का फैसला करके चीन की सभी चालबाजियों की हवा निकाल दी है। ओली के सहयोगी राजन भट्टाराई के मुताबिक उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया है, क्योंकि उनकी पार्टी के अंदर ही उनके खिलाफ कोशिशें जारी थीं। उन्होंने कहा है कि इसलिए 'उन्होंने चुनाव में जनता का सामना करने का फैसला किया है, जो लोकतंत्र में सबसे अच्छा तरीका है।'

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