श्रीलंका में भारत क्या चीन पर हावी होता जा रहा है

श्रीलंका संकट
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श्रीलंका संकट

श्रीलंका में साल 2022 की शुरुआत से ही सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे थे और अब, जुलाई में ये प्रदर्शन इतने उग्र हो गए कि गोटाबाया राजपक्षे को देश छोड़कर भागना तो पड़ा ही, उन्हें राष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा भी देना पड़ा.

श्रीलंका में जिस समय लोग गोटाबाया राजपक्षे के ख़िलाफ़ और उनके परिवार के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे और प्रदर्शन कर रहे थे, उस समय कुछ नारे भारत विरोधी भी सुनाई दिए. भारत के ख़िलाफ़ भी कुछ लोग नारे लगाते दिखे.

लोग कुछ इस तरह के नारे लगा रहे थे-

"भारत और अमेरिका के हाथों देश को मत बेचो"

"श्रीलंका,भारत का कोई दूसरा राज्य नहीं"

"भारत, श्रीलंका की स्थिति का फ़ायदा नहीं उठाओ"

ऐसे और उसी तरह के दूसरे कई नारे और बयान श्रीलंकाई प्रदर्शन के दौरान सुनने और पढ़ने को मिले.

लेकिन ऐसे में जबकि इस तरह की भारत-विरोधी भावनाएं अभी भी मौजूद हैं, श्रीलंका के लोग भारत के बारे में क्या सोचते हैं. ख़ासतौर पर ऐसे समय में जबकि श्रीलंका ऐतिहासिक आर्थिक संकट से जूझ रहा है. देश में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है और राष्ट्रपति पद के लिए आज चुनाव हो रहे हैं.

बीते कुछ सालों में श्रीलंका कर्ज़ के बोझ तले दब चुका है. कर्ज़ इस कदर बढ़ चुका है कि अब श्रीलंका को खाद्य सामग्री, ईंधन और दवा जैसी दूसरी ज़रूरी चीज़ें ख़रीदने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.

श्रीलंका के लोग इस संकट की स्थिति के लिए राजपक्षे परिवार को, और ख़ासतौर पर पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को ज़िम्मेदार ठहराया था. उन पर दबाव इस क़दर बढ़ गया कि उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. और अब, आज यानी बुधवार को श्रीलंका में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान हो रहे हैं.

भारत-श्रीलंका
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नए नहीं हैं भारत विरोधी प्रदर्शन

एक ओर जहां श्रीलंका के संदर्भ में बहुत से लोग भारत को 'बड़े भाई' वाली भूमिका में देखते हैं, वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो श्रीलंका के मामले में भारत की भूमिका पर संदेह करते हैं.

पिछले कुछ सालों में सिंघला राष्ट्रवादियों और वामपंथी दलों ने कई बार भारत-विरोधी प्रदर्शन का नेतृत्व किया है. लेकिन मौजूदा समय में जबकि श्रीलंका बीते कुछ महीनों से ऐतिहासिक रूप से संकट से घिरा, तो उसने भारत का रुख़ किया और इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है कि भारत की बीजेपी सरकार ने श्रीलंका की वित्तीय सहायता भी की.

जानकारों का कहना है कि श्रीलंका जिस तरह वित्तीय सहायता की आवश्यकता से जूझ रहा है, वैसे में 22 मिलियन आबादी वाले इस द्विपीय राष्ट्र की सहायता करके भारत ने अपने प्रभुत्व को दोबारा से हासिल करने में कामयाबी पायी है. वो भी तब जब 15 सालों में इंफ़्रास्ट्रक्चर के लिए कर्ज़ देकर और वित्तीय सहायता देकर चीन ने श्रीलंका में अपनी पैंठ बनायी है.

श्रीलंका में मुख्य विपक्षी दल के नेता सजिथ प्रेमादासा ने बीबीसी को बताया, "जिस तरह की परिस्थितियों से श्रीलंका अभी जूझ रहा है, ऐसे में भारत ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हम एक देश के रूप में बड़े संकट से जूझ रहे हैं और भारत ने आगे आकर हमारी सहायता की है."

भारत और श्रीलंका बेहद घनिष्ठ सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक रिश्ते साझा करते हैं. दोनों देशों के ये रिश्ते सदियों से हैं.

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चीन से मदद

दिल्ली, कोलंबो के लिए एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार रहा है. श्रीलंका भारत से कई उत्पादों, ख़ासतौर पर खाद्य-पदार्थों का आयात करता है. इसके अलावा श्रीलंका की अल्पसंख्यक तमिल आबादी का तमिलनाडु के लोगों के साथ क़रीबी सांस्कृतिक संबंध है.

महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद, साल 2005 से कोलंबो, भारतीय प्रभाव से दूर जाता गया. उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान चीन के साथ, श्रीलंका के कई समझौते हुए. इसी में से एक देश के दक्षिण शहर हम्बनटोटो में बंदरगाह का निर्माण करना भी शामिल रहा.

आंकड़े बताते हैं कि चीन ने अब तक श्रीलंका को पांच बिलियन डॉलर से अधिक का ऋण दिया है, जोकि श्रीलंका के कुल विदेशी ऋण का लगभग 10 फ़ीसद है.

लेकिन ऐसे समय में जबकि श्रीलंका को अतिरिक्त ऋण की ज़रुरत है, बीजिंग की ओर से अभी तक किसी भी तरह के मदद का आश्वासन नहीं दिया गया है. श्रीलंका, ईंधन की कमी से जूझ रहा है और देश में खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं, ऐसे में उसे अतिरिक्त ऋण की ज़रूरत है.

वहीं दूसरी ओर भारत ने श्रीलंका को क़रीब 3.5 बिलियन डॉलर की क्रेडिट और करेंसी-स्वैप सहायता दी है. बीते कुछ महीनों में क्रेडिट लाइन के स्तर पर भारत ने श्रीलंका को ईंधन, खाद्य और ज़रूरी चीज़ों के कई शिपमेंट्स भेजे हैं.

दिल्ली की ओर दी गई सहायता के अतिरिक्त, भारत के तमिलनाडु राज्य सरकार ने भी श्रीलंका को खाद्य पदार्थों और दवाइयों की शिपमेंट्स सहायता के तौर पर भेजी हैं. इसके अलावा मंगलवार को तमिलनाडु के विभिन्न राजनीतिक दलों ने केंद्र ने श्रीलंका की मौजूदा स्थिति पर चर्चा के लिए एक सर्वदलीय मीटिंग करने का आग्रह किया था.

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धारणा में आया है बदलाव

जानकारों का कहना है कि भारत की ओर से दी गई अरबों डॉलर की वित्तीय सहायता से श्रीलंकाई लोगों के बीच सार्वजनिक धारणा में बदलाव आया है.

प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले एक कर्मचारी टायरॉन सेबेस्टियन का कहना है, "भारत ने हमें ईंधन और खाद्य-पदार्थ भेजकर समय पर सहायता दी है. अगर भारत, श्रीलंका की सहायता नहीं करता तो देश के लिए हालात और अधिक बुरे होते."

सामाजिक कार्यकर्ता मेलानी गुनाथिलके का कहना है कि भारत के "समर्थन" के लिए वे आभारी हैं.

लेकिन जानकारों का कहना है कि श्रीलंका की मदद करने के भारत के फ़ैसले का अपना रणनीति महत्व भी है, जो भारत के लिए उसके पड़ोसी देश के संदर्भ में फ़ायदा देने वाला है.

भारत ने जब प्रारंभिक क्रेडिट लाइन की घोषणा की थी, उसके बाद दोनों देश उत्तर-पूर्वी त्रिंकोमाली बंदरगाह में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान निर्मित 61 विशाल तेल टैंकों के संयुक्त संचालन के साथ आए थे.

30 से अधिक वर्षों से, भारत ब्रिटिश-युग की इस सुविधा का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा था. इसकी मदद से भारत तेल के भंडारण में सक्षम हो पाएगा.

इसी तरह, सितम्बर महीने में, भारत के अडानी समूह को रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले कोलंबो बंदरगाह पर पश्चिमी कंटेनर टर्मिनल बनाने और उसका संचालन करने के अनुबंध में बड़ी सदस्यता दी गई.

नेशनल पीपल्स पावर अलायंस की सांसद हरिणी अमरसूरिया ने बीबीसी से कहा, "मुझे नहीं लगता कि कोई भी देश अपने लिए कुछ मांगे बिना या लाभ देखे बिना हमारी मदद करेगा. यह बिल्कुल साफ सी बात है कि भारत अपने हितों को तो देखेगा ही."

अमरसूरिया कहती हैं, "भारत की तरह श्रीलंका को भी अपने हितों को ध्यान में रखकर फ़ैसले लेने की आवश्यकता है."

विशेषज्ञों का कहना है कि श्रीलंका के तमिल अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों की मांग का सवाल भी भारत के साथ श्रीलंका की कूटनीतिक बातचीत को प्रभावित करता रहेगा.

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भारत-श्रीलंका के बीच खटास

1980 के दशक में कई श्रीलंकाई तमिल विद्रोही समूहों के भारत में शरण लेने के बाद द्विपक्षीय संबंधों में खटास आ गई थी. कोलंबो ने दिल्ली पर चरमपंथियों को हथियार और ट्रेनिंग देने का आरोप भी लगाया था. ये वो थे जो श्रीलंका में तमिलों के लिए एक अलग ज़मीन की मांग कर रहे थे.

मई 2009 में विद्रोहियों की हार के साथ ही गृहयुद्ध भी समाप्त हो गया. लेकिन इस पूरे युद्ध के दौरान भारत, श्रीलंका की सरकार के साथ खड़ा रहा.

हालांकि, 1987 के भारत-श्रीलंका शांति समझौते को पूरी तरह से लागू करना बाकी है.

हालांकि मौजूदा समय ने दोनों देशों ने राजनीति चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया है.

इसके अलावा जब भी समस्या आई हैं श्रीलंका के अल्पसंख्यक तमिल और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने हमेशा भारत की ओर देखा है.

पिछली बातों से इतर, बहुसंख्यक सिंहली समुदाय के लोग भी अब बड़ी संख्या में भारत की ओर मदद के लिए देख रहे हैं.

आईटी प्रोफ़ेशनल मोहम्मद सुफ़ियान कहते हैं, "द लंकन-इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन अभी भी कुछ मात्रा में ही सही पर आपूर्ति तो कर पा रहा है, जिसकी वजह से हम चल पा रहे हैं."

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