मौसम में ख़तरनाक बदलावों के लिए क्या ग्लोबल वॉर्मिंग है ज़िम्मेदार
यूरोप के ज़्यादातर हिस्से इस वक़्त अभूतपूर्व गर्मी से झुलस रहे हैं.
कई देश जबर्दस्त हीट वेव की चपेट में हैं. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पश्चिमी फ़्रांस में भारी आफ़त आने वाली है क्योंकि पूरा यूरोप भारी गर्मी की तपिश झेल रहा है.
ब्रिटेन में गर्मी रिकॉर्ड तोड़ने की ओर है, तो स्पेन, पुर्तगाल और ग्रीस में ऐसा लग रहा है, जैसे आसमान से आग बरस रही हो. जंगलों में लगी आग ने इन देशों से हज़ारों लोगों को घर छोड़ भागने पर मजबूर कर दिया है.
भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में भी बुरा हाल है. यहाँ गर्मियों की शुरुआत में जबर्दस्त लू ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया था और कई जगह तापमान 45 डिग्री के पार पहुँच गया. भारी गर्मी की वजह से इथोपिया और सोमालिया दशकों का सबसे भीषण सूखा झेल रहे हैं.
यहाँ लोग सोशल मीडिया पर कह रहे हैं, "देखिये, जलवायु परिवर्तन इस दुनिया का क्या हाल कर रहा है."
लेकिन क्या यह जानना संभव है कि हमारी आँखों के सामने दिख रहे मौसम के ये बड़े बदलाव इंसान की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन के ही नतीजा हैं.
जलवायु एट्रिब्यूशन
इस सवाल का संक्षिप्त जवाब है- हाँ. वैज्ञानिकों के बीच इस बात को लेकर सहमति है कि सैद्धांतिक तौर पर वे इस बात का जवाब दे सकते हैं कि किसी प्राकृतिक घटना में जलवायु परिवर्तन कि कितना हाथ है. या फिर इस तरह की घटनाएं इसकी वजह से बढ़ गई हैं.
इस तरह के जवाब के लिए विज्ञान से जुड़ा एक क्षेत्र मददगार साबित होता है, इसे एक्सट्रीम इवेंट एट्रिब्यूशन कहते हैं.
तुलनात्मक तौर पर यह विज्ञान की नई शाखा है. लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में एनवायरमेंटल जियोग्रॉफ़ी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. थॉमस स्मिथ का कहना है भले ही यह तुलनात्मक रूप से विज्ञान की नई शाखा है लेकिन इसका तेज़ी से विस्तार हो रहा है.
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डॉ. स्मिथ का कहना है, "2018 में पहली बार (फ्लोरेंस तूफ़ान के वक्त) मौसम में भारी परिवर्तन से जुड़ी घटनाओं के कारणों का विस्तृत अध्ययन हुआ था. तब से इस बात को समझने के लिए सैकड़ों अध्ययन हो चुके हैं कि क्या इंसान की गतिविधियों से हुए जलवायु परिवर्तन मौसम में होने वाले भारी बदलाव के कारण हैं."
"जंगल में लगी आग, तूफ़ान, लू, सूखा और अतिवृष्टि की घटनाओं के विश्लेषण के लिए इसे आज़माया जा चुका है."
वैज्ञानिकों के समूह वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन (WWA) ने हाल में एक ऐसी गाइड प्रकाशित की है, जो मौसम में भारी बदलाव की घटनाओं और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंधों को समझने में मददगार साबित हो सकती है.
इस स्टडी के प्रमुख लेखकों में से एक इंपिरियल कॉलेज लंदन की जर्मन मौसम विज्ञानी फ्रेडरिक ओट्टो ने बीबीसी से कहा, "हालांकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग अब इस बारे में जानने लगे हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग मौसम से जुड़ी घटनाओं को कैसे बदल रहा है, लेकिन अभी भी लोगों को यह कम पता है कि अलग-अलग इलाक़ों में यह कैसे काम करता है."
जलवायु परिवर्तन अकेला कारण नहीं
डॉ. ओट्टो और उनके सहयोगी इसकी तुलना ख़ूब सिगरेट पीने वाले ऐसे शख़्स से करते हैं, जिसके फेफड़े धीरे-धीरे कैंसर का शिकार होने की ओर बढ़ रहे हैं.
वो कहती हैं कि, "यह ऐसा ही है जैसे डॉक्टर ये नहीं बता पाते हैं कि कैंसर की असली वजह धूम्रपान है लेकिन वो ये निश्चित रूप से ये कहने की स्थिति में होते हैं कि सिगरेट की वजह से यह लक्षण ज़्यादा बढ़ा होगा."
"इसी तरह जलवायु परिवर्तन अकेले मौसम में किसी बदलाव का ज़िम्मेदार नहीं हो सकता क्योंकि मौसम से जुड़ी सभी घटनाओं की कई वजह हो सकती हैं. लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग ऐसी घटनाओं को तीव्रताओं को प्रभावित कर सकता है."
यानी इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम से जुड़ी घटनाएं कैसी हो सकती हैं. इसके साथ ही यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसी किसी घटना का लोगों, संपत्तियों और प्रकृति पर क्या असर पड़ता है.
ये कैसे काम करता है?
इस तरीक़े में कंप्यूटर मॉडलों का इस्तेमाल होता है. दो कंप्यूटर में दो परिदृश्य दिखाए जाते हैं. पहला कंप्यूटर किसी ख़ास दिन का जलवायु दिखाता है, इसमें इंसानी गतिविधियों की वजह से हुआ जलवायु परिवर्तन शामिल है.
इसका मतलब यह है क्लाइमेट मॉडल सिम्युलेशन को एक ही परिस्थितियों के असर को बार-बार देखकर मौजूदा जलवायु में कई मौसम को समझा जाता है.
दूसरे प्रयोग के तहत ग्रीन हाउस उत्सर्जन के प्रभाव को हटा दिया जाता है. इसके साथ ही औद्योगिक क्रांति के पहले के जलवायु से मिलते-जुलते जलवायु का सिम्युलेशन (एक जैसी स्थिति) तैयार किया जाता है.
इसके बाद वैज्ञानिक इस बात की गणना करते हैं कि दोनों मामलों में कितनी बार मौसम में भारी बदलाव की घटनाएं हुईं. यानी इस तरह का भारी बदलाव ग्लोबल वॉर्मिंग के हालात में कितनी बार हुआ और कितनी बार इसके बग़ैर हुआ.
इनकी तुलना कर वो ये बता सकते हैं कि पहले परिदृश्य के तहत मौसम से जुड़ी कोई घटना तीन बार हुई है तो मनुष्यों की गतिविधियों से पैदा ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से ऐसा होने की संभावना तिगुनी हो सकती है
हीट वेव पर जलवायु परिवर्तन का असर
झुलसा देने वाली गर्मी की वजह जलवायु परिवर्तन भी हो सकता है. लेकिन व्यावहारिक तौर पर मौसम में भारी बदलाव का स्तर जलवायु परिवर्तन के स्तर पर निर्भर करता है.
डॉ. ओट्टो कहती हैं, "ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से सभी हीट वेव पर जलवायु परिवर्तन का असर होता है."
अब यह सवाल बनता है जब कोई देश इस तरह के बड़े मौसम परिवर्तन से जूझ रहा हो तो ग्लोबल वॉर्मिंग ने इसे और कितना बुरा बनाया है या फिर इससे इसमें थोड़ी कमी आई?
डॉ. ओट्टो कहती हैं, "जब हमने 2021 में साइबेरिया में हीट वेव देखा, तो पाया कि जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसा हुआ. अगर जलवायु परिवर्तन नहीं हुआ होता ऐसी स्थिति नहीं आती."
वह कहती हैं, "हमने 2019 में यूरोपियन देशों में आए कुछ हीट वेव का विश्लेषण किया तो पाया कि इस वजह से तापमान में पांच गुना की बढ़ोतरी हुई थी."
वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन के विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश का मामला ज़्यादा सीधा है क्योंकि गर्म हवा की वजह से ज़्यादा नमी बनती है.
हालांकि चक्रवात, सूखा, बाढ़ और जंगल में आग जैसी घटनाओं के लिए यह सवाल अब भी बना हुआ है कि इनमें जलवायु परिवर्तन की कितनी भूमिका है?
इन विशेषज्ञों का मानना है कि सूखा अक्सर कई वजहों से होता है. इसमें कम बारिश, ऊंचा तापमान और जलवायु और ज़मीन के सतह के आपसी संबंध अहम भूमिका निभाते हैं.
बाढ़ भी कई कारणों से आ सकती है. निश्चित तौर पर इसमें ज़्यादा बारिश की भूमिका होती है, लेकिन इसमें इंसानी गतिविधियों का भी हाथ होता है. जैसे ज़मीन इस्तेमाल करने का तरीक़ा और ज़मीन की सीमा बांधने से जुड़ी गतिविधियां.
विशेषज्ञों का कहना है कि हर साल आने वाले चक्रवातों की संख्या तो नहीं घटी है लेकिन जलवायु परिवर्तन वजह से उनकी भयावहता ज़रूर बढ़ी है. जहाँ तक जंगल में आग लगने की घटना का सवाल है तो इससे जुड़े आँकड़े सीमित हैं जो एट्रिब्यूशन स्टडीज को चुनौतीपूर्ण बना देते हैं. लेकिन उनका मानना है कि आग लगने की घटनाएं सभी महादेशों में बढ़ रही हैं
जलवायु परिवर्तन समानता और न्याय के लिए सबसे बड़ा ख़तरा
डॉ. ओट्टो का मानना है कि दुनिया में समानता और न्याय की राह में जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ा ख़तरा है. उनका मानना है कि वैज्ञानिकों के उनके समूह का अध्ययन जलवायु परिवर्तन को समझने में अहम भूमिका अदा करेगा.
वह कहती हैं, कई बार आधिकारिक रिपोर्टों में प्राकृतिक आपदाओं के लिए तुरंत जलवायु परिवर्तन को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है. हालांकि यह ज़रूरी है इस तरह के मौसम में भारी बदलाव के लिए तापमान में तेज़ बढ़ोतरी को ज़िम्मेदार ठहराने की प्रवृति से बचा जाए.
वह कहती हैं, "हमारी टीम के अध्ययन ने पाया गया कि मैडागस्कर में 2021 के सूखे की वजह जलवायु परिवर्तन नहीं था."
जलवायु परिवर्तन का अध्ययन करने वालों का कहना है कि एट्रिब्यूशन का इस्तेमाल कार्बन उत्सर्जन करने वालों को अदालतों में ले जाने के लिए हो सकता है. इसके आधार पर उनसे हर्जाना मांगा जा सकता है.
डॉ. ओट्टो का कहना है कि इस तरह का अध्ययन हमें जलवायु परिवर्तन और उससे होने वाले नुक़सान और हादसे को समझने में मदद करता है.
वो कहती हैं, "इससे हम समझ सकते हैं कि हमने कितना उत्सर्जन किया है. लेकिन हमारे पास जलवायु परिवर्तन के असर की इन्वेंट्री नहीं है. इस तरह का अध्ययन यानी एट्रिब्यूशन हमें इस प्रक्रिया को और बेहतर समझने में मदद करता है."
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