Iran War Impact: ईरानी तेल लेकर भारत आ रहा शिप अचानक चीन मुड़ा, पेमेंट को लेकर हुआ विवाद?
Iran War Impact: मिडिल ईस्ट की जंग के बीच भारत को एक बड़ा झटका लगा है। दरअसल ईरानी तेल लेकर भारत आ रहा जहाज अचानक से बीच समुंदर में ही रास्ता बदलकर चीन की तरफ मुड़ गया है। अगर यह टैंकर भारत पहुंचता, तो करीब 7 साल बाद ईरान से भारत को पहली तेल खेप मिलती। लेकिन ऐसा क्यों हुआ, समझते हैं।
'पिंग शुन' टैंकर ने बदली डेस्टिनेशन
जहाज ट्रैकिंग फर्म Kpler के मुताबिक, अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित अफ्रामैक्स टैंकर पिंग शुन पहले गुजरात के वाडीनार आ रहा था, लेकिन अब उसने अपनी डेस्टीनेशन बदलकर चीन के डोंगयिंग कर दी है। यह समझना जरूरी है कि जहाज का गंतव्य AIS (ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) के जरिए दिखाया जाता है, लेकिन यह अंतिम नहीं होता। सफर के दौरान इसे कभी भी और कितनी भी बार बदला जा सकता है।

पेमेंट पर अटकी थी गरारी?
एक एक्सपर्ट के मुताबिक, इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह पेमेंट टर्म्स हो सकती हैं। पहले जहां 30-60 दिन की क्रेडिट मिलती थी, अब विक्रेता एडवांस या जल्दी पेमेंट की मांग कर रहे हैं। मतलब पहले तेल मिलने के 30 से 60 दिनों तक पेमेंट कर सकते थे, लेकिन अब मौका देखकर ईरानी कंपनियों का कहना है कि या तो एडवांस पेमेंट करो या फिर इस हाथ दो- उस हाथ लो। हालांकि असली खरीदार और विक्रेता कौन हैं, यह साफ नहीं है।
वाडीनार रिफाइनरी की भूमिका
वाडीनार में Nayara Energy की 20 मिलियन टन प्रति वर्ष क्षमता वाली रिफाइनरी है, जिसे Rosneft का समर्थन प्राप्त है। संभवत: जहाज यहीं के लिए आ रहा था। एक पहलू ये भी है कि इस तरह बीच रास्ते में गंतव्य बदलना नई बात नहीं है, लेकिन यह दिखाता है कि अब तेल व्यापार में पेमेंट और जोखिम का असर बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इसलिए ईरानी कंपनियां मुनाफा और कम रिस्क दोनों देख रही हैं।
पेमेंट सुलझा तो फिर भारत मुड़ेगा जहाज?
ऐसी स्थिति में अगर पेमेंट से जुड़ी समस्याएं हल हो जाती हैं, तो यह कार्गो अभी भी भारत की किसी भी रिफाइनरी तक पहुंच सकता है। सीधी बात है, जो अच्छा पैसा और एडवांस पेमेंट करेगा जहाज उसी का। वहीं भारत का तेल मंत्रालय पहले ही साफ कर चुका है कि ईरानी तेल आयात का फैसला केवल तकनीकी और व्यावसायिक आधार पर ही होगा।
भारत-ईरान तेल संबंध का इतिहास
भारत पहले ईरान का बड़ा ग्राहक रहा है। भारतीय रिफाइनर ईरान से लाइट और हेवी क्रूड खरीदते थे क्योंकि ये सस्ता और प्रोसेस करने में आसान होता था। 2018 में अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के बाद मई 2019 से भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था। इसके बाद भारत ने मिडिल ईस्ट, अमेरिका और अन्य देशों से तेल खरीदना शुरू किया।
पीक पर 11.5% था हिस्सा
एक समय पर ईरानी तेल भारत के कुल आयात का 11.5% तक था। 2018 में भारत रोज 518,000 बैरल तेल खरीदता था, जो 2019 में घटकर 268,000 बैरल रह गया। उसके बाद से आयात पूरी तरह बंद है।
समुद्र में पड़ा है 95 मिलियन बैरल तेल
एक अनुमान के मुताबिक, इस समय करीब 95 मिलियन बैरल ईरानी तेल समुद्र में मौजूद है, जिसमें से 51 मिलियन बैरल भारत को बेचा जा सकता है। बाकी तेल चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे देश उठा सकते हैं। Kpler की रिपोर्ट की मानें तो, 'पिंग शुन' में करीब 600,000 बैरल तेल है, जिसे 4 मार्च के आसपास खार्ग द्वीप से लोड किया गया था। इसका ETA 4 अप्रैल वाडीनार के लिए तय किया गया था।
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पेमेंट सिस्टम सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि अमेरिकी छूट के बावजूद, सबसे बड़ा सवाल पेमेंट प्रोसेस का है। ईरान SWIFT सिस्टम से बाहर है, जिससे अंतरराष्ट्रीय लेन-देन करना मुश्किल हो जाता है। पहले भारत ईरान से तेल खरीदने के लिए तुर्की के बैंक के जरिए यूरो में पेमेंट करता था, लेकिन अब यह ऑप्शन बंद हो गया है। लिहाजा डील होती भी है तो पेमेंट अब भी बड़ी चुनौती रहेगा।
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