Iran War Impact: 'आपकी जॉब खा जाएगा ये युद्ध, 2008 की मंदी जैसा हो सकता है हाल’, एक्सपर्ट ने चेताया
Iran War Impact: अमेरिका-ईरान जंग का असर सिर्फ गैस और तेल नहीं बल्कि अब आपकी जॉब पर भी पड़ रहा है। एक्सपर्ट की मानें तो ये युद्ध साल 2008 की मंदी जैसे हालात पैदा कर सकता है जब दुनियाभर में करोड़ों जॉब्स चली गई थीं। जिसका असर भारत पर भी भार तादाद में पड़ा था। आइए जानते हैं किन सेक्टर्स के ऊपर सबसे ज्यादा खतरा है और कौन से क्षेत्र सुरक्षित कहे जा सकते हैं।
किसने दे चेतावनी?
दरअसल, यूरोपीय संसद में बोलते हुए बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर एंड्रयू बेली ने चेतावनी दी है कि ईरान पर चल रही अमेरिका-इजरायल जंग के कारण 3 ट्रिलियन डॉलर का प्राइवेट क्रेडिट मार्केट खतरे में आ सकता है। उन्होंने कहा कि अगर हालात बिगड़े तो यह 2008 जैसा बड़ा वित्तीय संकट पैदा कर सकता है, जो आम आदमी की जॉब तक छीन सकता है।

क्या होता है प्राइवेट क्रेडिट मार्केट?
प्राइवेट क्रेडिट मार्केट वह क्षेत्र है जहां बैंक नहीं बल्कि हेज फंड, प्राइवेट इक्विटी फर्म और अन्य एसेट मैनेजर कंपनियों को लोन देते हैं। बैंकिंग सिस्टम की तुलना में यह सेक्टर कम नियमों के तहत चलता है, इसलिए यहां लोन मिलना आसान होता है। लेकिन इसी वजह से यह काफी अपारदर्शी (opaque) भी है। मतलब साफ नहीं होता कि कौन कितना जोखिम ले रहा है।
कमजोर कंपनियों को मिलता है ज्यादा लोन
इस मार्केट में अक्सर उन कंपनियों को पैसा दिया जाता है जो पहले से कर्ज में डूबी होती हैं या जिन्हें बैंक लोन देने से मना कर देते हैं। यानी जोखिम ज्यादा होता है। एंड्रयू बेली ने इसे एक अपारदर्शी दुनिया बताया, जो फिलहाल तो स्थिर दिख रही है, लेकिन अंदर ही अंदर तनाव के संकेत दिखने लगे हैं।
तेजी से बढ़ता मार्केट और बढ़ती चिंता
अभी प्राइवेट क्रेडिट मार्केट का साइज 3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है, जबकि 2020 में यह सिर्फ 2 ट्रिलियन डॉलर था। यानी कुछ ही सालों में इसमें तेज़ ग्रोथ हुई है। लेकिन हाल ही में ट्राइकलर ऑटो और फर्स्ट ब्रांड्स जैसी बड़ी कंपनियों के गिरने से इस सेक्टर को लेकर चिंता बढ़ गई है। इन मामलों में हाई रिस्क, अपारदर्शी फंडिंग और धोखाधड़ी के आरोप भी सामने आए।
पारदर्शिता की कमी सबसे बड़ा खतरा
बेली ने खास तौर पर इस सेक्टर में पारदर्शिता की कमी को सबसे बड़ा जोखिम बताया। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि इस मार्केट में साफ जानकारी उपलब्ध हो कि पैसा कहां जा रहा है और कितना जोखिम लिया जा रहा है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अचानक बड़ा संकट आ सकता है।
'डबल व्हैमी' का खतरा क्या है?
बेली ने एक डबल व्हैमी यानी दोहरे झटके की बात भी कही। इसका मतलब है एक तरफ बाजार पहले से अस्थिर हो और दूसरी तरफ प्राइवेट क्रेडिट सेक्टर में अचानक निवेशकों का भरोसा टूट जाए। अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर पूरी इकॉनोमिक सिस्टम पर पड़ सकता है।
अगर इन्वेस्टर्स का भरोसा टूट गया तो क्या होगा?
बेली ने सवाल उठाया कि अगर निवेशक और यूजर्स इस मार्केट से भरोसा खो देते हैं, तो क्या होगा? उनका कहना है कि इससे बड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिलेगी, जिसका असर पूरी वित्तीय स्थिरता पर पड़ेगा। इससे चीजों के दाम या तो अचानक बढ़ने लगेंगे या फिर अचानक घटने लगेगें। इसलिए इस जोखिम को गंभीरता से समझना जरूरी है।
डर और मार्केट से पैसे खींचना
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल की पहली तिमाही में निवेशकों ने प्राइवेट मार्केट फंड से 20 अरब डॉलर से ज्यादा निकालने की कोशिश की है। यह संकेत देता है कि निवेशकों का भरोसा धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है।
ईरान युद्ध कैसे बिगाड़ सकता है हालात?
अब सबसे बड़ा सवाल है कि ईरान युद्ध इस संकट को कैसे बढ़ा सकता है। जियो-पॉलिटिकल तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लंबे समय तक बंद रह सकता है। इसके अलावा, वेस्ट एशिया में तेल और गैस उत्पादन भी रुक सकता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा जाएगा।
तेल और गैस सप्लाई पर बड़ा असर
मौजूदा हालात में, इस क्षेत्र में हमलों के कारण दुनिया की लगभग 20-25% तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हुई है। वहीं करीब 10% उत्पादन पूरी तरह बंद हो चुका है। इसका सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
महंगाई से लेकर डिफॉल्ट तक पूरी चेन
आर्थिक एक्सपर्ट्स के मुताबि, इसकी एक पूरी चेन रिएक्शन होती है:
• तेल की कीमत बढ़ती है
• महंगाई बढ़ती है
• ब्याज दरें बढ़ती हैं
• लोन महंगे हो जाते हैं
इसके बाद लोग कम खर्च करते हैं, कंपनियों की कमाई घटती है और आखिर में कंपनियों के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाता है। इससे डिफॉल्ट का खतरा बढ़ जाता है।
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डूब सकते हैं बैंक?
हालांकि प्राइवेट क्रेडिट मार्केट सीधे बैंकिंग सिस्टम का हिस्सा नहीं है, लेकिन यह उससे पूरी तरह अलग भी नहीं है। कई तरह की साझेदारियों और निवेश के जरिए यह बैंकिंग सिस्टम से जुड़ा हुआ है। इसलिए अगर इस सेक्टर में संकट आता है, तो उसका असर बैंकों तक भी पहुंच सकता है। कुल मिलाकर, प्राइवेट क्रेडिट मार्केट अभी बाहर से स्थिर दिख रहा है, लेकिन अंदर जोखिम बढ़ रहे हैं। अगर युद्ध जारी रहा तो 2008 जैसी मंदी आ सकती है।
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