Iran US Ceasefire: सीजफायर नहीं, तो बर्बाद हो जाता पाकिस्तान! शहबाज शरीफ के 'नापाक' प्लान का हुआ पर्दाफाश
Pakistan Role in US Iran Ceasefire: अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी जंग पर फिलहाल ब्रेक लग गया है, लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और ही है। दुनिया को लग रहा है कि पाकिस्तान ने शांति दूत बनकर दोनों देशों में सुलह कराई है, मगर हकीकत यह है कि यह पाकिस्तान की मजबूरी थी।
अगर यह युद्ध न रुकता, तो कंगाली की कगार पर खड़ा पाकिस्तान पूरी तरह तबाह हो जाता। अपनी डूबती अर्थव्यवस्था और संभावित बर्बादी को भांपते हुए शहबाज शरीफ ने बीच-बचाव का नाटक रचा, ताकि खुद को और अपनी सत्ता को सुरक्षित रखा जा सके।

US-Iran Ceasefire 2026: पड़ोसी होने की सबसे बड़ी मार
पाकिस्तान और ईरान की सीमाएं एक-दूसरे से मिलती हैं। अगर अमेरिका ईरान पर भीषण हमला करता, तो उसका सीधा असर पाकिस्तान पर पड़ता। युद्ध के कारण ईरान से लाखों शरणार्थी जान बचाने के लिए पाकिस्तान में घुसने लगते। पहले से ही दाने-दाने को मोहताज पाकिस्तान के लिए इन शरणार्थियों के रहने और खाने का इंतजाम करना नामुमकिन होता। शहबाज शरीफ जानते थे कि अगर सीमा पर भगदड़ मची, तो पाकिस्तान का ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
अरबों डॉलर के 'रेमिटेंस' पर संकट और बेरोजगारी का डर
मिडिल ईस्ट में चल रही जंग पाकिस्तान के लिए केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि एक गहरी आर्थिक मुसीबत भी थी। खाड़ी देशों (UAE, सऊदी अरब, कतर) में लाखों पाकिस्तानी काम करते हैं, जो हर साल अरबों डॉलर पाकिस्तान भेजते हैं। इसे 'रेमिटेंस' कहते हैं, जो पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन का काम करता है।
अगर युद्ध लंबा खिंचता, तो इन कामगारों को अपनी जान बचाकर वापस लौटना पड़ता। इससे पाकिस्तान के सामने दोहरा संकट खड़ा हो जाता: पहला, विदेशी मुद्रा का आना बंद हो जाता, और दूसरा, लाखों बेरोजगारों की भीड़ देश में बढ़ जाती। पहले से ही तंगहाली झेल रहे पाकिस्तान के पास इन लोगों को रोजगार देने का कोई जरिया नहीं था, जिससे वहां गृहयुद्ध जैसे हालात बन सकते थे।
Pakistan economic crisis: 500 के पार पहुंचा डीजल, थम गई रफ्तार
जंग की वजह से पाकिस्तान की माली हालत पहले ही पतली हो चुकी है। तेल की सप्लाई प्रभावित होने से वहां डीजल की कीमतें 500 पाकिस्तानी रुपए के पार निकल गई हैं। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। हालात इतने खराब हैं कि सरकार को स्कूल बंद करने पड़े हैं और कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम पर भेज दिया गया है। अगर सीजफायर नहीं होता, तो पाकिस्तान में ईंधन और बिजली पूरी तरह गुल हो जाती और पूरा देश अंधेरे में डूब जाता।
ये भी पढे़ं: North Korea Missile Launch: ईरान-अमेरिका में सीजफायर, इधर किम जोंग ने दागी मिसाइल, जापान में अफरा-तफरी
Middle East war impact on Pakistan: सऊदी अरब के साथ डिफेंस पैक्ट की मजबूरी
ईरान पर हमला होने का मतलब था कि खाड़ी के दूसरे देश जैसे सऊदी अरब और यूएई भी इसकी चपेट में आते। ईरान जवाबी कार्रवाई में इन देशों को निशाना बनाता। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक 'डिफेंस पैक्ट' साइन कर रखा है, जिसके तहत सऊदी पर हमला होने पर पाकिस्तान को उसकी मदद के लिए सेना भेजनी पड़ती। पहले से कमजोर पाकिस्तान किसी भी कीमत पर सीधी जंग में शामिल होने का जोखिम नहीं उठा सकता था, इसलिए उसने सुलह का रास्ता चुना।
रात 8 बजे बाजार बंद, सड़कों पर सन्नाटा
पाकिस्तान में आर्थिक संकट इस कदर गहरा गया है कि सरकार ने ऊर्जा बचाने के लिए दुकानों और बाजारों को रात 8 बजे तक बंद करने का फरमान जारी कर दिया है। अर्थव्यवस्था पूरी तरह रुक चुकी है। युद्ध लंबा खिंचने पर पाकिस्तान को विदेशी मदद मिलना भी बंद हो सकती थी। शहबाज शरीफ का सीजफायर में दखल देना कोई भलाई का काम नहीं था, बल्कि अपनी गिरती हुई साख और चरमराई हुई व्यवस्था को बचाने की एक आखिरी कोशिश थी।
ये भी पढ़ें: Iran War Timeline: 28 फरवरी से 8 अप्रैल तक US-ईरान के बीच कब-क्या हुआ? एक क्लिक में देखिए पूरी टाइमलाइन
शांति दूत का मुखौटा और असली चेहरा
दुनिया के सामने पाकिस्तान खुद को शांति मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है और अमेरिका-ईरान को इस्लामाबाद बुला रहा है। लेकिन इस 'शांति' के पीछे असल डर अपनी बर्बादी का है। शहबाज शरीफ जानते हैं कि अगर शुक्रवार, 10 अप्रैल की बैठक नाकाम रही, तो पाकिस्तान का बचना मुश्किल है। यह सीजफायर क्षेत्र की शांति के लिए नहीं, बल्कि पाकिस्तान को वैश्विक मानचित्र पर पूरी तरह कंगाल और बर्बाद होने से बचाने के लिए किया गया एक रणनीतिक समझौता है।












Click it and Unblock the Notifications