ईरान में अबकी बार उदारवादी नहीं, कट्टरपंथी सरकार, इब्राहिम रायसी होंगे अगले राष्ट्रपति!

इब्राहिम रायसी ने लोगों से बड़ी संख्या में मतदान करने की अपील की थी, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। फारस न्यूज एजेंसी के मुताबिक शुक्रवार शाम साढ़े सात बजे तक सिर्फ 37 फीसदी लोगों ने ही वोट डाला था।

तेहरान, जून 19: ईरान में शुक्रवार को हुए राष्ट्रपति चुनाव में लाखों मतदाताओं ने हिस्सा लिया, लेकिन चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि इस बार ईरान में हुआ आम चुनाव फीका रहा है। और चुनाव में काफी कम तादात में मतदाताओं ने हिस्सा लिया है। चुनाव खत्म होने के बाद अब अनुमान लगाया जा रहा है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के कट्टर समर्थक इब्राहिम रायसी चुनाव जीत सकते हैं। न्यायपालिका प्रमुख इब्राहिम रायसी देश के कट्टरपंथी गुट से आते हैं और अमेरिका ने उनके खिलाफ प्रतिबंध लगा रखा है।

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    कट्टरपथी नेता हैं इब्राहिम रायसी

    कट्टरपथी नेता हैं इब्राहिम रायसी

    इब्राहिम रायसी ने लोगों से बड़ी संख्या में मतदान करने की अपील की थी, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। फारस न्यूज एजेंसी के मुताबिक शुक्रवार शाम साढ़े सात बजे तक सिर्फ 37 फीसदी लोगों ने ही वोट डाला था। ईरान में कुल 2 करोड़ 20 लाख मतदाता हैं। दूसरी तरफ, ईरान के गृह मंत्रालय ने कुल मतदान प्रतिशत की घोषणा भी नहीं की है। ओपिनियन पोल और सरकार से जुड़े विश्लेषकों ने राष्ट्रपति पद के लिए चल रहे चार उम्मीदवारों में कट्टरपंथी इब्राहिम रायसी को सबसे मजबूत बताया है। अगर रायसी चुनाव में जीतते हैं, तो वह अगस्त में ईरान के आठवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगे।

    अमेरिका ने लगा रखा है प्रतिबंध

    अमेरिका ने लगा रखा है प्रतिबंध

    इब्राहिम रायसी ने 2017 में भी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था, लेकिन उदारवादी नेता रूहानी ने उन्हें भारी अंतर से हरा दिया था। रायसी को 38 फीसदी वोट मिले थे, जबकि रूहानी को 57 फीसदी वोट हासिल हुआ था। सेंट्रल बैंक के पूर्व प्रमुख अब्दुलनासिर हेममती भी एक उदारवादी उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें निवर्तमान राष्ट्रपति हसन रूहानी का समर्थन हासिल नहीं है। अगर इब्राहिम रायसी चुनाव जीतते हैं तो वो पहले ईरान के पहले राष्ट्रपति होंगे, जिनपर अमेरिका ने पहले ही प्रतिबंध लगा रखा होगा। इब्राहिम रायसी पर राजनीतिक कैदियों की सामूहिक हत्या का इल्जाम है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी कट्टरपंथी छवि के लिए काफी आलोचना की जाती है। ईरानी न्यायपालिका के प्रमुख के रूप में उन्हें 1988 में प्रतिबंधित कर दिया गया था।

    ईरान में और मजबूत होंगे कट्टरपंथी

    ईरान में और मजबूत होंगे कट्टरपंथी

    अगर इब्राहिम रायसी जीत जाते हैं, तो यह ईरानी सरकार पर कट्टरपंथियों की पकड़ को और मजबूत करेगा। वो भी उस समय में जब ईरान के पटरी से उतरे परमाणु समझौते को बचाने के लिए वियना में अमेरिका समेत विश्व की बड़ी शक्तियों के साथ बातचीत जारी है। ईरान ने हालिया समय में यूरेनियम को परमाणु हथियार बनाने के लिए बहुत करीब स्तर तक समृद्ध कर रहा है। इससे अमेरिका और इस्राइल के साथ उसके तनाव काफी बढ़ गए हैं। माना जाता है कि दोनों देशों ने ईरानी परमाणु ठिकानों पर कई हमले भी किए और दशकों पहले ईरान में परमाणु कार्यक्रम को संभाल रहे परमाणु वैज्ञानिक को भी मार डाला था।

    चुनाव को लेकर जनता उदासीन

    चुनाव को लेकर जनता उदासीन

    रिपोर्ट के मुताबिक, मतदान स्थानीय समय के मुताबिक सुबह 7 बजे शुरू हुई थी।, लेकिन खामेनेई के नेतृत्व में गठित एक समिति के सुधारवादियों और रूहानी से जुड़े सैकड़ों उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के बाद जनता इस चुनाव को लेकर काफी ज्यादा उदासीन हो गई थी। ईरान की जनता एक उदार सरकार को चुनना चाहती है, लेकिन ईरान में राष्ट्रपति का चुनाव कौन लड़ सकता है, ये तय एक कमेटी करता है। ये कमेटी उदार छवियों वाले नेताओं को राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की इजाजत ही नहीं देता है। खमेनेई में तेहरान में औपचारिक रूप से मतदान किया और लोगों से मतदान में भाग लेने का आग्रह भी किया था। खामेनेई ने कहा कि, "लोगों की भागीदारी से देश और इस्लामी शासन को अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में एक महान स्थान दिलाएगा, लेकिन इसका फायदा सबसे पहले ईरान और ईरान में रहने वाले लोगों को ही होगा''

    सिर्फ 42 प्रतिशत वोटिंग का अनुमान

    सिर्फ 42 प्रतिशत वोटिंग का अनुमान

    ईरान में 8 करोड़ लोगों में से 5 करोड़ 90 लाख लोगों को वोट देने का अधिकार हासिल है। भारत की तरह ईरान में भी 18 साल की उम्र से ज्यादा उम्र वाले ही वोट डाल सकते हैं। हालांकि, राज्य द्वारा संचालित ईरानी छात्र मतदान एजेंसी ने कुल 42 प्रतिशत मतदान का अनुमान लगाया है, जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से सबसे कम है। ईरान इस समय कोविड-19 महामारी, वैश्विक अलगाव, व्यापक अमेरिकी प्रतिबंधों और बढ़ती महंगाई जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, इसलिए चुनाव को लेकर मतदाताओं में उत्साह कम है।

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