Iran Israel Conflict: अपनों ने ही क्यों छोड़ दिया ईरान का साथ? चीन और रूस की बेरुखी से तेहरान रह गया अकेला!
Iran Israel Conflict: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच ईरान इन दिनों अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और इजरायल की ओर से हमले जारी हैं और ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई भी हो रही है। हालांकि, ईरान के करीबी माने जाने वाले रूस और चीन अब तक खुलकर युद्ध में नहीं उतरे हैं। ईरान के करीबी मित्रों ने इन हमलों की आलोचना जरूर की है, लेकिन पुतिन या शी जिनपिंग की ओर से सैन्य मदद का ऐलान नहीं हुआ है।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या ईरान पूरी तरह से अलग-थलग और अकेला पड़ गया है? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके पीछे कई रणनीतिक और कूटनीतिक कारण हैं। चीन और रूस दोनों अपने कुछ मोर्चे पर संघर्ष कर रहे हैं। व्लादिमीर पुतिन अपना पूरा फोकस यूक्रेन पर रखे हुए हैं, जबकि चीन साउथ चाइना सी और दक्षिण एशिया में अपने रणनीतिक हितों को साधने में जुटा है।

Iran Israel Conflict: इन कारणों से ईरान रह गया अकेला
Russia Iran Relation: रूस सीधे युद्ध में उतरने से बच रहा
रूस और ईरान के बीच संबंध काफी मजबूत माने जाते हैं। दोनों देशों ने 2025 में एक रणनीतिक साझेदारी समझौता भी किया था। हालांकि, यह समझौता औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं है। ऐसे में रूस पर ईरान की रक्षा के लिए सीधे युद्ध में शामिल होने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। रूस फिलहाल इस संघर्ष में सीधे कूदने के बजाय खुद को संभावित मध्यस्थ के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है।
चीन अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना चाहता है
चीन ईरान से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है, लेकिन उसके खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों जैसे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ भी बड़े व्यापारिक संबंध हैं। यही कारण है कि चीन किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़ा होने से बच रहा है, ताकि उसके व्यापक आर्थिक हित प्रभावित न हों।
पश्चिम एशिया में संतुलन बनाए रखने की रणनीति
रूस और चीन दोनों ही पश्चिम एशिया में संतुलन की नीति अपनाते रहे हैं। वे ईरान के साथ रिश्ते बनाए रखने के साथ-साथ क्षेत्र के अन्य देशों से भी सहयोग बनाए रखना चाहते हैं। यदि वे खुले तौर पर ईरान का समर्थन करते हैं, तो इससे उनके दूसरे साझेदार देशों के साथ संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
अमेरिका से सीधा टकराव टालना
अगर रूस या चीन ईरान को खुलकर सैन्य मदद देते हैं, तो इससे अमेरिका के साथ बड़ा वैश्विक टकराव हो सकता है। यही वजह है कि फिलहाल दोनों देश कूटनीतिक बयान और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विरोध दर्ज कराने तक ही सीमित हैं।
रूस का बयान: ईरान ने हथियार नहीं मांगे
रूस ने यह भी स्पष्ट किया है कि ईरान की ओर से अभी तक हथियारों की कोई आधिकारिक मांग नहीं की गई है। क्रेमलिन के प्रवक्ता के अनुसार इस मामले में ईरान ने रूस से सैन्य सहायता का अनुरोध नहीं किया है। रूस का आरोप है कि अमेरिका और इजरायल क्षेत्रीय देशों को भी इस संघर्ष में खींचने की कोशिश कर रहे हैं। रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि हालिया हमलों के बाद भी तनाव कम होने के संकेत नहीं दिख रहे हैं।
ड्रोन को लेकर यूक्रेन की पेशकश
इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने कहा है कि अमेरिका और पश्चिम एशिया के कुछ सहयोगी देश ईरान के ड्रोन हमलों से निपटने के लिए यूक्रेन के अनुभव में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई देशों के साथ इस विषय पर बातचीत हुई है, लेकिन यूक्रेन तभी सहयोग करेगा जब उसकी अपनी सुरक्षा प्रभावित न हो।
चीनी विशेषज्ञ का आकलन
चीन की विदेश नीति विशेषज्ञ युन सुन का कहना है कि ईरान में हमलों के बाद यदि नेतृत्व में बदलाव होता है, तो भी चीन नई सरकार के साथ काम करने को तैयार रहेगा। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि तेल आपूर्ति और साझा आर्थिक हित सुरक्षित रहें। यदि लंबे समय तक संघर्ष चलता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति बाधित होती है, तब चीन को अपनी मौजूदा रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है।
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