Iran FM in China: US के साथ चीन कर रहा बड़ा खेल, ट्रंप संग मुलाकात से पहले ईरान के साथ मीटिंग, क्या हुआ तय?
Iran FM in China: ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची चीन पहुंचे हैं, जहां वे वांग यी से मुलाकात करेंगे। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के बाद एक तनाव भरा सीजफायर चल रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" को भले ही अस्थायी रूप से रोक दिया हो, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बाहर ईरानी जहाजों की नौसैनिक नाकेबंदी अभी भी जारी है।
रूस के बाद चीन, मदद की तलाश में ईरान
चीन आने से पहले अराघची रूस का दौरा कर चुके हैं, जहां रूस ने ईरान को हर संभव मदद देने का भरोसा दिया है। इस कूटनीतिक मिशन में वे चीन के साथ मिडिल ईस्ट की मौजूदा स्थिति, अमेरिकी नाकेबंदी से पैदा हुई चुनौतियों और उनके समाधान निकालने पर फोकस करेंगे। अराघची ये बात जानते हैं कि अमेरिका को इस वक्त में कोई लाल आंख दिखा सकता है तो वो है चीन। ऐसे में चीन उन्हें वो रास्ते दिखा सकता है जहां से अमेरिका के साथ वे अपनी शर्तों के साथ जंग खत्म करने की स्थिति में पहुंच सकें।

तो क्या ट्रंप की चीन यात्रा सिर्फ दिखावा होगी?
अराघची का यह दौरा ट्रंप की 14-15 मई की बीजिंग यात्रा से ठीक पहले हो रहा है, जहां उनकी मुलाकात शी जिनपिंग से होगी। विदेश मामलों की एक्सपर्ट्स का मानना है कि करीब 40 दिन के संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान दोनों समाधान चाहते हैं। अमेरिका में बढ़ती महंगाई और ट्रंप की गिरती लोकप्रियता भी उन्हें समझौते की ओर धकेल रही है। लेकिन ट्रंप के दौरे के ठीक पहले अराघची का चीन दौरे ने बता दिया कि आखिर चीन के दिमाग में क्या चल रहा है।
चुनाव दबाव में ट्रंप, समझौते की जरूरत या मजबूरी?
अमेरिका में इसी साल नवंबर के महीने में मिड टर्म इलेक्शन होने हैं, जिसको देखते हुए डेमोक्रेट्स ट्रंप पर लगातार हमला कर रहे हैं। ऐसे में ट्रंप अपनी चीन यात्रा के दौरान खुद को मजबूत नेता के रूप में दिखाना चाहते हैं। लिहाजा ईरान के साथ समझौता उनके लिए राजनीतिक रूप से अहम बन गया है, क्योंकि बिना समाधान के वे चीन के साथ बातचीत में कमजोर पड़ सकते हैं।
ईरान की क्या मजबूरी?
दूसरी तरफ ईरान भी युद्धविराम चाहता है। अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण उसे हर दिन करीब 500 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है। जैसा कि आप सभी को पता है कि ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था तेल और गैस पर टिकी हुई है। इसी बीच खार्ग आइलैंड और बंदर अब्बास जैसे बंदरगाहों से निकलने वाले तेल-गैस के जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पार नहीं कर पा रहे है। जिससे उसका एक्सपोर्ट ठप हो गया है। जिसकी उसकी अर्थव्यवस्था और पतली होती जा रही है।
चीन क्या कर सकता है अमेरिका-ईरान के बीच?
चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और लगभग 90% तेल वहीं जाता है। बदले में चीन ईरान को आर्थिक मदद देता है। अगर सप्लाई रुकती है तो यह रिश्ता भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे में अराघची चीन से इस मुद्दे पर अहम बातचीत कर सकते हैं। हालांकि दोनों के बीच किस तरह की बातचीत होगी यह अभी तय नहीं है लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि चर्चा का मुख्य बिंदु होर्मुज और युद्ध को खत्म करना ही होगा।
चीन के जरिए अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश
ईरान चाहता है कि चीन के जरिए वह अमेरिका के साथ बेहतर शर्तों पर समझौता कर सके। चीन, ट्रंप पर दबाव डालकर ईरान के लिए राहत दिलाने में भूमिका निभा सकता है। माना जा रहा है कि दबाव में ट्रंप किसी समझौते के लिए तैयार हो सकते हैं।
ईरान और अमेरिका दोनों के लिए एक जैसी कंडीशन
अमेरिकी नाकेबंदी ने ईरान को अंदर से कमजोर कर दिया है, जिससे उसकी हताशा बढ़ रही है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका में भी तेल के दाम 50% तक बढ़ गए हैं जिससे वहां ट्रंप के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है, जिसका खामियाजा उन्हें मिड टर्म इलेक्शन में हो सकता है। साथ ही लोगों का विरोध सोशल मीडिया पर बढ़ता जा रहा है।
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