2006 के बाद गंभीर हुआ गर्म हवाओं का प्रभाव, और दिखेंगे विनाशकारी परिणाम- पढ़ें IPCC की ताज़ा रिपोर्ट
बेंगलुरु। पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है और वर्ष 2100 तक इस तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में 195 देश अलग-अलग तरह से प्रयासरत हैं, लेकिन अगर यूएन से संबद्ध संस्था आईपीसीसी की मानें तो संपूर्ण मानवजाति पृथ्वी को एक बड़े और स्थाई बदलाव की ओर धकेल रही है। दरअसल ग्लोबल वॉर्मिंग का ही असर है, जो हम निरंतर जंगलों में आग, बाढ़, भूस्खलन, आदि के रूप में देख रहे हैं। पृथ्वी पर किस प्रकार के बदलाव हो रहे हैं, इस पर इंटर गवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने सोमवार को एक रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट के अनुसार 1980 के बाद से समुद्र की ओर से उठने वाली हीटवेव यानि गर्म हवाओं का सिलसिला तेज़ हो गया है, जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण मानवजाति की गतिविधियां हैं। खास तौर से 2006 के बाद से गंभीर बदलाव देखे गए हैं।

आईपीसीसी की यह छठी एसेसमेंट साइकिल है जिसके अंतर्गत वैज्ञानिकों के अलग-अलग समूह दुनिया के हर कोने में हो रहे मौसमी बदलाव का अध्ययन कर रहे हैं। आईपीसीसी के पहले समूह यानि कि वर्किंग ग्रुप-1 का अध्ययन बीती 6 अगस्त को पूरा हुआ और आज पैनल की ओर से रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में जो भी परिवर्तन जलवायु में हो रहे हैं, वो अपरिवर्तनीय हैं। वैज्ञानिकों ने 195 देशों की सरकारों को सलाह दी है कि सभी एक जुट होकर पेरिस समझौते के संकल्प को पूरा करने का प्रयास करें। वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर बिना किसी लगाम के तापमान और कार्बन उत्सर्जन बढ़ता रहा तो भविष्य में हमें इसके बहुत सारे दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे।
आईपीसीसी की लाइव प्रेसवार्ता
वैज्ञानिकों का कहना है कि 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को 50 प्रतिशत तक कम करना बेहद जरूरी है। केवल उसी दशा में ही पृथ्वी के तापमान में वृद्धि को 1.5℃ तक सीमित कर पाना संभव होगा। जाहिर है अगर ऐसा करना है तो सभी सरकारों को त्वरित योजनाएं बनानी होंगी। आपको बता दें कि ग्लासगो में आयोजित होने वाली कॉप26 के पहले आईपीसीसी एक और अहम रिपोर्ट जारी करेगा, ताकि कॉप26 की बैठक में विभिन्न देश इस पर गहनता के साथ चर्चा कर सकें।
जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी पर हुए कैसे बदलाव
वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम महासागरों और ग्लेशियरों में आसानी से देखे जा सकते हैं। 1850 के बाद से पहली बार आर्कटिक महासागर ने पिछले एक दशक में न्यूनतम स्तर देखा। वहां पर ग्लेशियर्स के टूट कर गिरने का सिलसिला निरंतर जारी है। ऐसा ही कुछ एंटार्टिक में भी देखने को मिल रहा है। इसके अलावा हम जंगलों को खत्म होते भी देख रहे हैं।
समुद्रों के वैश्विक जलस्तर में जितनी वृद्ध पिछले 3000 वर्ष में हुई थी, उतनी ही वृद्धि 1900 के बाद से यानि कि पिछले 120 वर्षों में दर्ज हुई है।

1980 के बाद से समुद्र की ओर से उठने वाली हीटवेव यानि गर्म हवाओं का सिलसिला तेज़ हो गया है, जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण मानवजाति की गतिविधियां हैं। खास तौर से 2006 के बाद से गंभीर बदलाव देखे गए हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वर्ष 2100 तक समुद्र के वैश्विक जलस्तर में 2 मीटर की वृद्धि दर्ज होगी, जबकि 2150 तक समुद्र जल का स्तर 5 मीटर तक ऊपर उठ चुका होगा।
पहाड़ों पर मौजूद ग्लेशियर जिस गति से पिघल रहे हैं, वो अपरिवर्तनीय है। वो ग्लेशियर दोबारा बनेंगे, ऐसा कहना बेईमानी होगा।
आईपीसीसी वर्किंग ग्रुप-1 की रिपोर्ट के प्रमुश अंश
- वैज्ञानिकों ने पाया कि इसमें कोई शक नहीं है कि मानवीय गतिविधियों के कारण ही पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हुई है और अब जो परिवर्तन हो रहे हैं उनमें अधिकांश पविर्तन स्थाई हैं।
- अगले एक दशक में यानि कि 2030 तक पृथ्वी के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हर कीमत में होगी और उसके बाद बहुत तेजी से तापमान में 1.6 डिग्री की वृद्ध दर्ज होगी और अगले 100 वर्षों में वृद्धि कम होकर 1.4 डिग्री तक आ जायेगी।
- कार्बन डाइऑक्साइड के अलावा भी कई अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो रहा है, जिससे निपटना बड़ी चुनौती होगा। इसलिए नीति निर्धारकों को इस बढ़ते तापमान को रोकने के लिए नेट जीरो प्लान के साथ आगे बढ़ने की आश्यकता है।
रिपोर्ट ने बताया मानव जाति ने कैसे किया जलवायु को प्रभावित
वैज्ञानिकों ने कहा कि मानवजाति ने जिस तरह से जलवायु के तापमान में वृद्ध की है उसकी वजह से पृथ्वी पर तेजी से बदलाव हुए हैं। बीते 2000 वर्षों में जो बदलाव हुए हैं, वो अभूतपूर्व हैं। 1750 के बाद से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से वृद्धि हुई है। वर्ष 2019 में वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की मात्रा अब तक की सबसे अधिक दर्ज हुई है। इतनी अधिक मात्रा बीते 20 लाख साल में भी नहीं रही होगी।
वहीं अगर अन्य ग्रीन हाउस गैस- मीथेन (CH4) और नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) की मात्रा 2019 में इतनी अधिक जितनी की पिछले 8 लाख साल में नहीं रही होगी। 1970 के बाद से पृथ्वी के गर्म होने की दर और भी बढ़ गई। जितना तापमान बीते 2000 साल में नहीं बढ़ा, उतना पिछले 50 वर्षों में बढ़ गया।
वर्किंग ग्रुप-1 की रिपोर्ट से जुड़ी खास बातें
- आज जारी हुई आईपीसीस के वर्किंग ग्रुप-1 की रिपोर्ट को 195 सरकारों और विभिन्न देशों के 234 वैज्ञानिकों ने मंजूरी दी है।
- इसका शीर्षक है, "क्लाइमेट चेंज 2021: दि फिज़िकल साइंस बेसिस"। समूह ने मानवजाति द्वारा कार्बन के उत्सर्जन और उसके प्रभावों का गहन अध्ययन किया।
- समूह की पहली रिपोर्ट पर 750 विशेषज्ञों ने 23,462 रिव्यू कमेंट दिये, और दूसरे ड्राफ्ट को 51,387 रिव्यू कमेंट सरकार से और 1,279 विशेषज्ञों से मिले।
- 47 देशों की सरकारों ने 3000 से अधिक कमेंट्स में अपनी राय व्यक्त की।
- इस रिपोर्ट को तैयार करने में 14 हजार शोधपत्रों को शामिल किया गया।
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