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INS Vikrant की पूरी कहानी, आज से करेगा भारत मां की सेवा, समुद्र का सिकंदर बनने निकले हम...

वर्तमान में केवल पांच ही ऐसे देश हैं, जिनके पास विमानवाहक पोत के निर्माण की क्षमता है और भारत भी अब इस प्रतिष्ठित क्लब में शामिल हो गया है और एयरक्राफ्ट कैरियर निर्माण परियोजना में भारत की 50 से ज्यादा निर्माता शामिल थे।

नई दिल्ली, अगस्त 25: भारत का पहला स्वदेशी युद्धपोत आईएनएस विक्रांत अब देश की सेवा के लिए तैयार है और आज वो ऐतिहासिक दिन है, जब भारत में ही निर्मित ये स्वदेशी युद्धपोत इंडियन नेवी में कमीशन कर दिया गया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आईएनएस विक्रांत को इंडियन नेवी को देश की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। पिछले महीने कोचीन शिपयार्ड ने समय से पहले ही इस एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण कर इसे इंडियन नेवी को सौंप दिया था। ऐसे में आईये जानते हैं, कि एयरक्राफ्ट कैरियर क्या होते हैं और भारत में ही इसका निर्माण एक उपलब्धि क्यों हैं? और आईएनएस विक्रांत के इंडियन नेवी में आ जाने से भारतीय नौसेना की शक्ति में ऐतिहसिक इजाफा क्यों हो गई है और अब कैसे भारत भी समुद्र का सिकंदर बनने के लिए अपने कदम आगे बढ़ा रहा है।...

आईएनएस विक्रांत की क्या है खासियत

आईएनएस विक्रांत की क्या है खासियत

आईएनएस विक्रांत की अहमियत भारत के लिए लिहाज से इतना खास इसलिए है, क्योंकि भारत ने इस युद्धपोत को अपने घर में ही तैयार किया है और अमेरिका, चीन, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन के बाद अब सिर्फ भारत ही एकमात्र देश है, जिसके पास युद्धपोत बनाने की क्षमता है। इस एयरक्राफ्ट कैरियर को पूरी तरह से भारत में ही डिजाइन और निर्माण किया गया है और ये एक विशालकाय युद्धपोत है, जिसकी क्षमता भी काफी ज्यादा है। आईएनएस विक्रांत की लंबाई की बात करें, तो इसकी लंबाई 262 मीटर है और इसकी चौड़ाई 60 मीटर है। वहीं, आईएनएस विक्रांत का वजन 45 हजार टन के करीब है। आईएनएस विक्रांत के निर्माण में चार एफिल टावर के बराबर उन्नत किस्म के लोहे का इस्तेमाल किया गया है और इस युद्धपोत में 2400 किलो केबल का इस्तेमाल किया गया है। आईएनएस विक्रांत में 1700 क्रू मेंबर्स सवार हो सकते हैं और इसमें 2300 कंपार्टमेंट्स हैं और इसकी उच्च क्षमता 28 नॉट है, वहीं इसकी क्रूजिंग स्पीड 18 नॉट है और इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है, कि ये एक बार में 7500 किलोमीटर की दूरी बिना रूके तय कर सकता है। आईएनएस विक्रांत का निर्माण आज से करीब 13 साल पहले शुरू हुआ था, जब भारत में कांग्रेस की सरकार थी।

एयरक्राफ्ट कैरियर होना आवश्यक क्यों?

एयरक्राफ्ट कैरियर होना आवश्यक क्यों?

एक विमानवाहक पोत किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे शक्तिशाली समुद्री संपत्तियों में से एक है, जो हवाई वर्चस्व संचालन करने के लिए अपने घरेलू तटों से दूर यात्रा करने के साथ साथ नौसेना की क्षमता को बढ़ाता है। कई विशेषज्ञ एक विमानवाहक पोत को "नीले पानी" वाली नौसेना के लिए अत्यंत आवश्यक मानते हैं, यानी, एक ऐसी नौसेना जो समुद्र की अनंत गहराइयों में भी एक राष्ट्र की ताकत और शक्ति को प्रोजेक्ट करने की क्षमता रखती है। एक एयरक्राफ्ट कैरियर आम तौर पर अपने लाव लश्कर के साथ गुजरता है, जिसमें कैरियर स्ट्राइक और बैटल ग्रुप शामिल होते हैं और चूंकी एयरक्राफ्ट कैरियर काफी ज्यादा महंगी होती है और कभी कभी लक्ष्य कमजोर होता है, लिहाजा इसे आमतौर पर डिस्ट्रॉयर, मिसाइल क्रूजर, फ्रिगेट, पनडुब्बी और सप्लाई जहाजों के समूह के साथ ले जाया जाता है।

भारत में निर्माण... कितनी बड़ी उपलब्धि?

भारत में निर्माण... कितनी बड़ी उपलब्धि?

वर्तमान में केवल पांच ही ऐसे देश हैं, जिनके पास विमानवाहक पोत के निर्माण की क्षमता है और भारत भी अब इस प्रतिष्ठित क्लब में शामिल हो गया है। विशेषज्ञों और नौसेना के अधिकारियों ने कहा कि, भारत ने दुनिया के सबसे उन्नत और जटिल युद्धपोतों में से एक माने जाने वाले निर्माण टेक्नोलॉजी की क्षमता हासिल करने के साथ ही आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन किया है। हालांकि, भारत के पास पहले भी एयरक्राफ्ट कैरियर थे, लेकिन उनका निर्माण या तो ब्रिटेन ने या फिर रूस ने किया था। भारत के पास मौजूदा एयरक्राफ्ट कैरियर 'आईएनएस विक्रमादित्य', जिसे 2013 में कमीशन किया गया था और जो वर्तमान में नौसेना का एकमात्र विमानवाहक पोत है, उसे तत्कालीन सोवियत संघ ने बनाया था,और उसका शुरूआती नाम 'एडमिरल गोर्शकोव' हुआ करता था।

पहले ब्रिटेन और रूस पर निर्भर था भारत

पहले ब्रिटेन और रूस पर निर्भर था भारत

आजादी के बाद के शुरूआती दो दशकों में एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए भारत ब्रिटेन पर निर्भर था और भारत के पास उस समय मौजूद दो एयरक्राफ्ट कैरियर 'आईएनएस विक्रांत' और 'आईएनएस विराट' मूल रूप से ब्रिटिश निर्मित 'एचएमएस हरक्यूलिस' और 'एचएमएस हर्मीस' थे। इन दोनों युद्धपोतों को क्रमश: 1961 और 1987 में नौसेना में शामिल किया गया था। नौसेना के अनुसार, IAC-1 (नया विक्रांत) के निर्माण में 76 प्रतिशत से ज्यादा सामग्री और उपकरण स्वदेशी हैं। इसमें 23,000 टन स्टील, 2,500 किमी इलेक्ट्रिक केबल, 150 किमी पाइप, और 2,000 वाल्व, और कठोर पतवार वाली नावों, गैली उपकरण, एयरकंडीशनिंग और रेफ्रिजरेशन प्लांट और स्टीयरिंग गियर सहित तैयार उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला भी शामिल है, जिनका निर्माण भारत में ही किया गया है। इसीलिए ये भारत के लिए एक उपलब्धि है और बताता है, कि आने वाले वक्त में नौसना की शक्ति की असीमित करने के लिए भारत और भी एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण करेगा।

कैसे हुआ भारत में विक्रांत का निर्माण?

कैसे हुआ भारत में विक्रांत का निर्माण?

भारतीय नौसेना ने पहले बताया था कि, एयरक्राफ्ट कैरियर निर्माण परियोजना में भारत की 50 से ज्यादा निर्माता शामिल थे और लगभग 2,000 भारतीयों को प्रतिदिन IAC-1 बोर्ड पर प्रत्यक्ष रोजगार मिला। वहीं, 40,000 से ज्यादा लोग अप्रत्यक्ष रूप से कार्यरत थे। नौसेना के मुताबिक, लगभग 23,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना का लगभग 80-85 प्रतिशत पैसा वापस भारतीय अर्थव्यवस्था में ही वापस आ गया है।

INS विक्रांत क्यों होगा नाम?

INS विक्रांत क्यों होगा नाम?

IAC-1, ये वर्तमान में भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोत का कोड नाम है और भारतीय नौसेना के नौसेना डिजाइन निदेशालय (DND) ने इसका डिजाइन तैयार किया है और कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL), जो शिपिंग मंत्रालय के तहत आता है, उसने एक सार्वजनिक क्षेत्र के शिपयार्ड में इस एयरक्राफ्ट कैरियर को बनाया गया है और नौसेना में कमीशन होने के बाद इसे 'आईएनएस विक्रांत' कहा जाएगा, यह नाम मूल रूप से भारत के सबसे पसंदीदा पहले विमान वाहक का था, जो 1997 में रिटायर्ड होने से पहले कई दशकों की भारतीय नौसेना के लिए अपार राष्ट्रीय गौरव का स्रोत था।

समुद्र में भारत का बाहुबल होगा विक्रांत

समुद्र में भारत का बाहुबल होगा विक्रांत

भारत के नये एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत की अगर भारत के मौजूदा एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य से तुलना की जाए, तो ये 44,500 टन का युद्धपोत है और लड़ाकू जेट और हेलीकॉप्टर समेत एक साथ में 34 विमान को अपनी पीठ पर लेकर चल सकता है। नौसेना ने पहले कहा था कि, एक बार कमीशन होने के बाद, IAC-1 "सबसे शक्तिशाली समुद्र-आधारित संपत्ति" होगी, जो रूसी निर्मित मिग-29K लड़ाकू विमान और कामोव-31 एयर अर्ली वार्निंग हेलीकॉप्टरों का संचालन करेगी और भारत के पास ये दोनों हथियार पहले से ही हैं और 'विक्रमादित्य' पर इनका इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं, नया 'विक्रांत' अमेरिकी एयरोस्पेस और रक्षा कंपनी लॉकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित MH-60R सीहॉक मल्टीरोल हेलीकॉप्टर और बेंगलुरु स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) का भी संचालन करेगा। इंडियन नेवी के मुताबिक, नये आईएनएस विक्रांत के पास काफी लंबी दूरी तक अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की क्षमता है और इसे एयर इंटरडिक्शन, एंटी-सरफेस वारफेयर, अटैक एंड डिफेंस काउंटर-एयर, एयरबोर्न एंटी-सबमरीन वारफेयर और एयरबोर्न अर्ली वार्निंग इसे और भी ज्यादा शक्तिशाली बनाते हैं।

क्या और एयरक्राफ्ट भी बनाएगा भारत?

क्या और एयरक्राफ्ट भी बनाएगा भारत?

इंडियन नेवी साल 2015 से ही देश के लिए तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर बनाने की मंजूरी मांग रही है और अगर उसे मंजूरी मिल जाती है, तो यह भारत का दूसरा स्वदेशी विमान वाहक (IAC-2) बन जाएगा। इस प्रस्तावित वाहक का नाम 'आईएनएस विशाल' रखा गया है, जिसका उद्देश्य 65,000 टन का विशाल पोत बनाना है, जो आईएसी-1 और 'आईएनएस विक्रमादित्य' दोनों से काफी बड़ा होगा। भारतीय नौसेना लगातार सरकार को तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर होने की जरूरत के बारे में समझाने की कोशिश कर रही है। वहीं, पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल करमबीर सिंह ने कहा था कि नौसेना एक "बंधी हुई सेना" नहीं रह सकती है। नौसेना के अधिकारियों ने तर्क दिया है कि, शक्ति को प्रोजेक्ट करने के लिए, यह आवश्यक है कि भारत महासागरों पर दूर तक अपनी क्षमता दिखाने में सक्षम हो, जो एक विमान वाहक के साथ ही सबसे अच्छे तरीके से किया जा सकता है। हालांकि, भारत सरकार की तरफ से अभी तक तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर को बनाने की मंजूरी नहीं मिली है।

तीसरे युद्धपोत की मंजूरी क्यों नहीं?

तीसरे युद्धपोत की मंजूरी क्यों नहीं?

नौसेना के सूत्रों ने पहले इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि, सरकार को IAC-2 की आवश्यकता के बारे में आश्वस्त होने के लिए, "मानसिकता में बदलाव" की आवश्यकता है। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने एक अन्य विमानवाहक पोत में निवेश के खिलाफ बात की थी, और सरकार को सुझाव दिया था, कि लक्षद्वीप और अंडमान और निकोबार द्वीपों को एयरक्राफ्ट कैरियर देने के बजाय "अकल्पनीय" नौसैनिक संपत्ति के रूप में विकसित किया जा सकता है। लेकिन, नौसेना के अधिकारियों ने कहा है कि, विशाल हिंद महासागर क्षेत्र की रक्षा के लिए दिन-रात लगातार वायु शक्ति की आवश्यकता होती है। एक तीसरा वाहक नौसेना को वृद्धि क्षमता प्रदान करेगा, जो भविष्य में आवश्यक होगा। साथ ही, यह भी तर्क दिया जाता है कि, अब जबकि भारत ने ऐसे जहाजों को बनाने की क्षमता विकसित कर ली है, तो फिर इसका निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि भारत के पास इसे बनाने की क्षमता बनी रही और "समुद्री उड्डयन की कला" जिसे पिछले 60 वर्षों में विकसित की गई है, उसकी विशेषज्ञता को भी बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।

किसके पास कितने युद्धपोत?

किसके पास कितने युद्धपोत?

यूनाइटेड स्टेट्स नेवी के पास फिलहाल 11 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं और दूसरे नंबर पर चीन है, जो काफी आक्रामक तरीके से एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोग्राम पर बढ़ रहा है। पिछले महीने तक चीन के पास सिर्फ 2 ही एयरक्राफ्ट कैरियर थे, लेकिन पिछले महीने चीन की नौसेना में तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात किया गया और रिपोर्ट के मुताबिक, चीन काफी तेजी के साथ तीन और एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण कर रहा है, जिनमें से दो एयरक्राफ्ट कैरियर अगले पांच सालों के अंदर चीन की नौसेना में शामिल हो जाएंगे। वहीं, भारतीय नौसेना के अधिकारी बताते हैं कि, भले ही भारत IAC-2 परियोजना को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन ये सोचने की बात है, कि एक युद्धपोत को चालू होने में 10 साल से अधिक का समय लगेगा।

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