Indonesia Protest: राष्ट्रपति के एक आदेश ने इंडोनेशिया में करवा दिए दंगे, सांसदों के घर पर हुए हमले
Indonesia Protest: इंडोनेशिया में जारी हालिया अशांति अचानक नहीं भड़की है, बल्कि इसकी शुरुआत सांसदों के लिए 50 मिलियन रुपिया (लगभग 3,000 अमेरिकी डॉलर) के मासिक आवास भत्ते को मंजूरी दिए जाने के बाद हुई। यह राशि जकार्ता के न्यूनतम वेतन से लगभग दस गुना अधिक है और गरीब प्रांतों के श्रमिकों की पहुंच से बाहर है।
कम मजदूरी, बढ़ती महंगाई और बड़े पैमाने पर नौकरियों के छूटने से जूझ रहे आम इंडोनेशियाई लोगों के लिए, ये भत्ते राजनीतिक अपर क्लास के स्वयं को पुरस्कृत करने का प्रतीक बन गए, जबकि जनता को अपनी बेल्ट कसनी पड़ रही थी।
एक मौत के बाद बढ़ी हिंसा
कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर यह चर्चा "दो इंडोनेशिया" के नाम से वायरल होने लगा एक धनवान और प्रभावशाली लोगों के लिए, और दूसरा बाकी सभी के लिए। स्थिति तब और बिगड़ गई जब जकार्ता में झड़पों के दौरान 21 साल के राइड-हेलिंग ड्राइवर अफ़्फान कुर्नियावान की एक ब्रिमॉब सामरिक पुलिस वाहन की चपेट में आने से मौत हो गई। उनकी मौत का वीडियो वायरल होने के बाद देशव्यापी आक्रोश फैल गया।

सरकारी इमारतों को फूंका
कुछ ही दिनों में, विरोध प्रदर्शन योग्याकार्ता, मकासर और सुरबाया सहित प्रमुख शहरों में फैल गए। सरकारी इमारतों में आग लगा दी गई, वित्त मंत्री श्री मुल्यनी के घर पर हमला किया गया, और पुलिस स्टेशन संघर्ष के केंद्र बन गए। सितंबर की शुरुआत तक, कम से कम छह लोगों की मौत हो चुकी थी और 1,200 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इस हिंसा के बढ़ने काकारण केवल भत्ते नहीं थे; यह पुलिस की बर्बरता, असमानता और सालों से चले आ रहे असंतोष का नतीजा था।
भत्तों पर इतना गुस्सा क्यों?
सांसदों के भत्तों पर इतना गुस्सा क्यों भड़का? इंडोनेशिया के संसद सदस्यों को 50 मिलियन रुपिया, या लगभग 3,000 अमेरिकी डॉलर का मासिक आवास भत्ता मिलने के खुलासे से पहली चिंगारी निकली। वैश्विक मानकों के हिसाब से यह शायद ज़्यादा न लगे।
लेकिन यह जकार्ता के न्यूनतम वेतन का लगभग दस गुना है और ग्रामीण प्रांतों में औसत आय से कहीं अधिक है। ऐसे समय में जब आम परिवार बढ़ती खाद्य कीमतों, स्थिर मजदूरी और बढ़ती छंटनी से जूझ रहे हैं, इन भत्तों को एक थप्पड़ की तरह महसूस किया गया।
42 हजार नौकरियां गईं
ये भत्ते इस बात का प्रतीक बन गए कि राजनीतिक अपर क्लास श्रमिकों की दैनिक वास्तविकताओं से कितना दूर है। इसका समय इससे बुरा नहीं हो सकता था। 2025 की पहली छमाही में ही, इंडोनेशिया में 42,000 से अधिक नौकरियां गईं हैं। लोगों ने इसके लिए सासंद और उनकी नीतियों जवाबदेह माना।
इंडोनेशियाई इतने भीतर से क्यों नाराज़ हैं?
ये विरोध प्रदर्शन महीनों से बढ़ रहे गहरे असंतोष हैं। लगातार बढ़ रही महंगाई मजदूरी को कम करती जा रही है। जिससे शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में कमियां आती जा रही हैं। अधूरे लोकलुभावन वादे: राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के प्रमुख खाद्य और कल्याण कार्यक्रमों की आलोचना की गई है।
टैक्स से परेशान इंडोनेशियाई
वैट में वृद्धि सहित तमाम नए टैक्स ने छोटे व्यवसायों और ग्राहकों को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया, जिससे यह भावना पैदा हुई कि आम लोग अपर क्लास के आराम के लिए भुगतान कर रहे हैं। "डार्क इंडोनेशिया" आंदोलन: 2025 की शुरुआत से, नागरिक समूहों ने "इंडोनेशिया गेलप" के बैनर तले सरकार के खिलाफ रैली की है। जिसे सरकार समय रहते नहीं संभाल सकी। इसके बाद भत्ता घोटाला मामले ने आग में घी का काम किया जिसने हिंसा शुरू करा दी।
सांसद और अधिकारियों के घर पर हमले
कुछ ही दिनों में, सुरबाया, बांडुंग, योग्याकार्ता, मेदान, मकासर, सोलो, बाली और पापुआ में प्रदर्शन भड़क उठे। प्रदर्शनकारियों ने क्षेत्रीय संसदों पर धावा बोल दिया, सरकारी इमारतों में आग लगा दी और पुलिस से भिड़ गए। मरने वालों की संख्या पांच से आठ लोगों के बीच पहुंच गई, जबकि सैकड़ों अन्य घायल हुए। हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस स्टेशनों में तोड़फोड़ की गई, और कुछ क्षेत्रों में अधिकारियों के घरों पर हमला किया गया।
सरकार ने क्या कहा?
राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रदर्शनों को तत्काल शांत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने सांसदों के आवास भत्ते को रद्द करने और उनकी विदेशी यात्राओं को निलंबित करने की तुरंत घोषणा की, जिससे सार्वजनिक आक्रोश की कुछ हद तक शांत हुए। साथ ही राष्ट्रपति ने अफ़्फान की मौत की जांच का भी आदेश दिया और उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का वादा किया जिनकी वजह से तनाव बढ़ा।
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