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चीन के खिलाफ चल गया भारत का 'तिब्बत कार्ड', मोदी 3.0 के दूसरे हफ्ते ही जिनपिंग के खिलाफ इक्के का इस्तेमाल

India China Tibet: मोदी सरकार 3.0 में भारत की चीन को लेकर विदेश नीति कैसे होगी, इसको लेकर अलग अलग कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन शपथ ग्रहण के पहले हफ्ते में ही मोदी सरकार ने चीन के खिलाफ इक्के का इस्तेमाल कर दिया है।

इस हफ्ते अमेरिकी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने तिब्बती धर्मगुरू और नेता दलाई लामा से मिलने के लिए इस हफ्ते हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला का दौरा किया। इस संसद प्रतिनिधिमंडल में नैंसी पेलोसी भी शामिल थीं, जिनसे चीन खुन्नस खाता है, क्योंकि जब नैंसी पेलोसी अमेरिकी संसद की स्पीकर थीं, उस वक्त उन्होंने चीनी धमकियों को नजरअंदाज करते हुए ताइवान का दौरा किया था।

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नैंसी पेलोसी के साथ अमेरिका के हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के चेयरमैन माइकल मैककॉल भी मौजूद थे, जिन्होंने तिब्बत की निर्वासित सरकार से बातचीत की।

दलाई लामा से मिला अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल

जाहिर तौर पर, नैंसी पेलोसी का दलाई लामा से मिलना चीन को रास नहीं आया, लेकिन मोदी सरकार ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को धर्मशाला आने और दलाई लामा से मिलने की इजाजत देकर चीन को साफ साफ शब्दों में संदेश भेज दिया है, कि चीन को लेकर उसकी नीति पिछले दोनों कार्यकाल से अलग होने वाले हैं।

मोदी सरकार के तिब्बत कार्ड ने अपना जबरदस्त असर दिखाया है। और इस मुलाकात के फौरन बाद भारत में मौजूद चीन के राजदूत ने संयुक्त राज्य अमेरिका को "गलत संकेत न भेजने" की चेतावनी जारी कर दी।

भारत में मौजूद अमेरिकी मिशन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा, कि "हम अमेरिका से एंटी-चीनी तत्वों और अलगाववादी प्रकृति वाले तत्व दलाई ग्रुप को पहचानने, शिजांग से संबंधित मुद्दों पर अमेरिका द्वारा चीन से की गई प्रतिबद्धताओं का सम्मान करने और दुनिया को गलत संकेत भेजना बंद करने का आग्रह करते हैं।"

चीनी पोस्ट में तिब्बत का नाम 'शिजांग' इस्तेमाल किया है। चीन ने तिब्बत का नाम बदलकर शिजांग कर दिया है, जो चीन में अल्पसंख्यक आबादी वाले क्षेत्रों के नाम बदलने की उसकी प्रोपेगेंडा का एक हिस्सा रहा है, जिसका मकसद उस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान और संस्कृति को कमजोर करना है।

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चीन के लिए सिरदर्द हैं दलाई लामा

तिब्बत पर चीन के आक्रमण के बाद दलाई लामा 1959 में अपने कई अनुयायियों के साथ भारत आ गए थे। क्षेत्र में चीनी दमन के खिलाफ विद्रोह की नाकामी के बाद वे तिब्बत की राजधानी ल्हासा से अपनी जान बचाने के लिए भाग गए थे। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) की सेनाओं ने 1949-50 में तिब्बत पर आक्रमण करके उस पर कब्ज़ा कर लिया था। दलाई लामा के आगमन के बाद से, चीन ने लगातार भारत में उनकी उपस्थिति की निंदा की है और लगातार उनके और उनके साथियों की तरफ से चलाए जा रहे निर्वासित सरकार और उनके आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की है।

धर्मशाला में दलाई लामा से मुलाकात करने के बाद अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से नई दिल्ली में मुलाकात की। इस दौरान भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और भारत के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजीत डोभाल से भी मुलाकात की।

इस मुलाकात से इस बात को लेकर सभी शक दूर हो गए, कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को इस यात्रा को लेकर नई दिल्ली की मंजूरी मिली थी या नहीं।

भारत ने चीन को क्या संकेत दिया?

भारत और अमेरिका का एक साथ आना, चीन को यह संदेश देने का एक हिस्सा है, कि अगर आप हमारी संवेदनाओं का सम्मान नहीं करेंगे, तो हम आपकी संवेदनाओं का सम्मान नहीं करेंगे।

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का यह दौरा अचानक नहीं हुआ है, बल्कि 2020 से ही इसके संयोग बनने लगे थे, जब चीन ने भारत के साथ लद्दाख में टकराव बढ़ाकर द्विपक्षीय संबंधों को 1962 के बाद से सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। उससे काफी पहले से चीन की मंशा को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे थे।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में चीनी मामलों के जानकार तेज प्रताप सिंह का कहना है, कि भारत-चीन संबंधों में शुरू से ही आपसी सम्मान का अभाव रहा है।

बीएचयू में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ते प्रताप सिंह कहते हैं, कि "1954 में भारत और चीन ने पंचशील संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बावजूद चीन ने 1962 में भारत पर हमला किया। फिर भारत ने 1976 में राजदूत स्तर के संबंधों को बहाल करके एकतरफा तरीके से संबंधों को पुनर्जीवित किया और फिर राजीव गांधी ने 1988 में चीन की ऐतिहासिक यात्रा की। 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी ने 'वन चाइना पॉलिसी' को औपचारिक रूप दिया। इन सभी वर्षों में भारत की ओर से तमाम रियायतों के बावजूद, चीन ने कभी कोई पारस्परिकता की पेशकश नहीं की। चीन ने न तो सीमा का समाधान किया और न ही ऐतिहासिक समझौतों को स्वीकार किया। इसके बजाय, उसने सिक्किम में एक नया मोर्चा खोला और कश्मीर मुद्दे को और उलझा दिया।"

मोदी सरकार ने चीन के कान में तिब्बत का तार उस वक्त बजाया है, जब जुलाई महीने के पहले हफ्ते में ही शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है, जिसमें नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग दोनों मौजूद होंगे। फिलहाल हमारे पास ये जानकारी नहीं है, कि दोनों नेताओं में मुलाकात या कोई द्विपक्षीय बातचीत होगी या नहीं?

तिब्बत कार्ड से लद्दाख का मुकाबला

भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने साल 2014 में अपने चीनी समकक्ष वांग यी से कहा था, कि जिस तरह भारत ने 'एक चीन नीति' को स्वीकार किया है, उसी तरह भारत को उम्मीद है, कि चीन भी 'एक भारत नीति' का पालन करेगा, और चीनी धोखे के बावजूद मोदी सरकार ने वर्षों तक चीनी चिंताओं को ध्यान में रखा।

2020 तक मोदी सरकार ने चीन के साथ संबंधों को संभालने में बहुत ज्यादा निवेश किया। भारत ने ताइवान या तिब्बतियों के साथ खुलकर बातचीत नहीं की। 2014 में दलाई लामा के साथ मोदी की मुलाकात बहुत कम चर्चा में रही और 2018-19 में तिब्बतियों के एक कार्यक्रम को नई दिल्ली से धर्मशाला में ट्रांसफर कर दिया गया था। क्योंकि, उस दौरान नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच बातचीत चल रही थी। उस दौरान चीन के वुहान शहर और तमिलनाडु के मामल्लापुरम में दो शिखर सम्मेलन आयोजित किए गए। 'वुहान स्पिरिट' ने काफी सुर्खियां बटोरी थी।

लेकिन, इस दौरान चीन लगातार भारत को धोखा दे रहा था।

जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2014 में पहली बार भारत का दौरा किया, तो उस समय लद्दाख में चीनी सैनिक घुसपैठ की कोशिश कर रहे थे। फिर, 2017 में, चीन ने भारत-चीन-भूटान ट्राइजंक्शन पर डोकलाम में गतिरोध किया। चीन ने सिक्किम सीमा पर एक नया फ्लैशपॉइंट भी खोला, जिसे उससे पहले सुलझा हुआ मुद्दा माना जाता था।

यहां तक ​​कि इससे भी भारत बहुत आक्रामक नहीं हुआ। लेकिन, 15 जून 2020 को चीन ने सारी हदें पार कर कर दी और लद्दाख के पूर्व में गलवान घाटी में घुसने की कोशिस की, इस दौरान हुए झड़प में कम से कम 20 भारतीय सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

और इसके साथ ही मोदी सरकार की सब्र का बांध भी टूट गया।

लद्दाख संघर्ष के बाद, मोदी सरकार ने हुवावे जैसी चीनी दूरसंचार कंपनियों को देश में 5G नेटवर्क शुरू करने से रोक दिया। इसके अलावा, चीनी निवेश, विलय और अधिग्रहण को रोक दिया और देश में काम कर रही चीनी कंपनियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। इसके बाद मोदी सरकार ने चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया गया, लोन ऐप्स पर नजर रखनी शुरू कर दी गई। वीवो और ओप्पो जैसी चीनी कंपनियों मजबूर किया गया, कि वो अपनी ज्यादातर हिस्सेदारी भारतीय कंपनियों को बेचे।

और इसी के बाद पहली बार भारत ने स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (SFF) के अस्तित्व को स्वीकार किया है, जिसे भारत ने अभी तक गुप्त तौर पर रखा हुआ था, जिसमें बड़ी संख्या में निर्वासित तिब्बती नागरिक शामिल हैं। लद्दाख गतिरोध के बाद तिब्बतियों के साथ भारत ने आधिकारिक जुड़ाव शुरू कर दिया।

साल 2021 में वो पहली बार था, जब नरेन्द्र मोदी ने सार्वजनिक तौर पर दलाई लामा को शुभकामनाएं दीं और उसके बाद से वो हर साल ऐसा कर रहे हैं। इसके बाद भारतीय सेना ने दलाई लामा की लद्दाख यात्रा की सुविधा प्रदान की है और उन्हें सैन्य हेलीकॉप्टरों में उस क्षेत्र में ले जाया है, जिस पर चीन का दावा है, और जो तिब्बत की सीमा से सटा हुआ है।

इस घटना के भारत के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों ने दलाई लामा से मुलाकात करनी शुरू कर कर दी और भारतीय नेताओं ने चीन के साथ सीमा को भारत-तिब्बत सीमा कहना शुरू कर दिया, जिसे पहले भारत-चीन सीमा कहा जाता था।

सिर्फ तिब्बत के साथ ही नहीं, उस घटना के बाद से भारत ने ताइवान के साथ भी नजदीकी बढ़ानी शुरू कर दी, जिसे चीन अपना हिस्सा मानता है।

तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में चीनी मुद्दों के जानकार और स्मोकलेस वॉर: चाइनाज क्वेस्ट फॉर ग्लोबल प्राइमेसी नामक पुस्तक के लेखक मनोज केवलरमानी कहते हैं, कि 2020 से, इस वास्तविकता को मान्यता मिली है, कि भारत के पास कुछ ऐसे लीवर हैं, जिनका उपयोग वह चीन के संबंध में यह संकेत देने के लिए कर सकता है, कि संवेदनशीलता का सम्मान एकतरफा नहीं हो सकता।

केवलरमानी कहते हैं, कि "दलाई लामा के साथ अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की बैठक भी चीन को यह संकेत देने का एक हिस्सा है, कि यदि आप विवादों को बढ़ाकर रिश्ते खराब करते हैं, तो हम उन मुद्दों को भी उठा सकते हैं जिन्हें आपने ने सुलझा हुआ मान लिया था। इसमें विदेशी सरकारों को तिब्बती 'अलगाववादी' आंदोलन से जुड़ने के लिए एक मंच देना शामिल हो सकता है।"

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क्या भारत फिर कर रहा है तिब्बत कार्ड का इस्तेमाल?

भारत की तरफ से साल 2009 के बाद 'वन चायना पॉलिसी' का जिक्र नहीं किया गया है और वर्तमान में साफ संकेत दे दिए गये हैं, कि भारत इसका प्रयोग तभी करेगा, जब चीन 'वन इंडिया' का जिक्र करेगा।

तिब्बत, भारत-चीन संबंधों में केंद्रीय मुद्दों में से एक है और केवलरामी कहते हैं, कि यह नई दिल्ली के लिए एक घुंडी है जिसे वह स्थिति के अनुसार बढ़ा या घटा सकता है।

तक्षशिला संस्थान में चीनी अध्ययन फेलो और इंडो-पैसिफिक अध्ययन कार्यक्रम के अध्यक्ष केवलरामानी कहते हैं कि "असली सवाल यह नहीं है, कि भारत 'तिब्बत कार्ड' खेल रहा है या नहीं। सवाल यह है, कि अब घुंडी को बढ़ाने से क्या नतीजा निकलेगा। क्या नई दिल्ली को लगता है, कि तिब्बत मुद्दे से उसे पर्याप्त लाभ मिलेगा? ऐसा लगता नहीं है। लेकिन, अब घुंडी को बढ़ाने से निश्चित रूप से चीनी झुंझलाहट और घर्षण पैदा हो सकता है और तिब्बतियों के संबंध में कदम सार्थक हो सकते हैं।"

इस बार भारत अकेले यह कार्ड नहीं खेल रहा है। इसमें अमेरिका भी शामिल है। भले ही तिब्बत में अमेरिका की दिलचस्पी अचानक दिख रही हो और अमेरिकी विदेश नीति के संदेहवादी रवैया रहा हो, लेकिन फिलहाल अमेरिका को इसमें शामिल माना जा सकता है।

1950 के दशक से ही अमेरिका और भारत, तिब्बत के मुद्दे पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। शुरुआत में अमेरिका ने तिब्बत के सवाल पर एकजुट प्रतिक्रिया देने के लिए भारत को शामिल करने की कोशिश की। अमेरिका ने बीजिंग की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ तिब्बती गुरिल्लाओं का भी समर्थन किया और 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत को एसएफएफ में तिब्बतियों को भर्ती करने में मदद की और भारत को सैन्य सहायता दी।

और अब जब पीएम मोदी और जयशंकर ने अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की है, तो साफ हो गया है, कि मोदी 3.0 में चीन को लेकर कुछ और सोचा गया है।

अभी तक भले ही भारत 2020 से चीन के बारे में अपनी नीतियों में बदलाव कर रहा है, लेकिन उसने ऐसा बहुत सावधानी से किया है। भारत शिनजियांग के बारे में बात नहीं करता है। भारत ताइवान के बारे में बहुत सतर्क है और हाल के वर्षों में बहुत ही सावधानी से और कम बयान जारी किए हैं। इसलिए, चीन के साथ भारत की कार्रवाई बहुत सोची-समझी है। हालांकि, तिब्बत के बारे में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ ये कदम एक उच्च जोखिम वाला माना जा रहा है, लेकिन भारत अब इस स्थिति में है, कि वो प्रतिक्रिया दे रहा है और चीन को बैकफुट पर धकेलने के लिए उसके सामने अड़ना ही एकमात्र उपाय है।

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