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Explained: चीन पर कनफ्यूज्ड भारत की विदेश नीति! क्या ताइवान और 'वन चायना पॉलिसी' पर नई नीति बनाने का वक्त आया?

India One China Policy: ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते का भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जीत की बधाई देना चीन को आगबबूला कर गया और चीनी ग्लोबल टाइम्स के एक संपादक ने भारत को अंजाम भुगतने की धमकी दी है। जाहिर है, ग्लोबल टाइम्स की धमकी, चीन की 'वुल्फ वॉरियर डिप्लोमेसी' का हिस्सा है, लेकिन, सवाल ये है.. कि क्या वक्त आ गया है, जब ताइवान और 'एक चीन नीति' को लेकर भारत अपनी नीति में बदलाव करे?

'एक चीन नीति', चीन की विदेश नीति का सबसे अहम हिस्सा है, जिसके तहत चीन, विदेशी देशों के साथ डिप्लोमेटिक संबंध इसी आधार पर बनाता है, कि वो ताइवान को चीन का ही हिस्सा माने, और दुनिया में सिर्फ एक ही चीन है, इस सिद्धांत का पालन करे।

India One China Policy

भारत की विदेश नीति भी 2010 तक 'एक चीन नीति' को ही मानती थी, लेकिन अब जबकि भारत को समझ में आ चुका है, कि सिर्फ बातचीत से चीन के साथ संबंध अच्छे नहीं हो सकते और सिर्फ बातचीत से चीन के साथ सीमा विवाद का हल नहीं हो सकता, तो चीन के साथ होन वाली बैठकों में भारत की सरकारों ने 'एक चीन नीति' को अपने बयानों में शामिल करना बंद कर दिया। लेकिन, क्या मोदी सरकार को अपने तीसरे कार्यकाल में 'एक चीन नीति' से आगे बढ़कर कुछ और सोचना चाहिए?

चीन को लेकर कनफ्यूजन से निकले भारत!

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भारत ने चीन को लेकर करीब करीब वही विदेश नीति को फॉलो किया, जैसी नीति पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपनाई थी और दोनों ही नेताओं के पीठ पर चीन ने खंजर ही घोंपा है। नेहरू की तरह नरेन्द्र मोदी की भी यही सोच रही, कि 'शांति का कबूतर' चीन की अटारी पर बैठेगा और दोनों देश प्यारे पड़ोसी बनकर साथ साथ रहेंगे।

लेकिन, नेहरू के कार्यकाल में चीन ने भारत पर हमला किया, तो मोदी के पहले कार्यकाल में चीन ने भूटान के डोकलाम को छीनकर पूर्वोत्तर भारत पर ही नजर डालने की कोशिश की, जबकि नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में गलवान घाटी हिंसा को भला कौन भूल सकता है।

नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान चीन का दौरा किया और फिर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का चेन्नई में शाही स्वागत किया, लेकिन भारत की तरह चीन की विदेश नीति कनफ्यूजन का शिकार नहीं थी, लिहाजा वो अपने मकसद के साथ आगे बढ़ता रहा, जिसमें भारत से लगती सीमा पर खटाखट निर्माण कार्य होना शामिल है।

तो क्या वक्त रहते चीन के अहंकार को तोड़ने के लिए भारत को खुलकर नहीं खेलना चाहिए? क्योंकि अब इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, कि अगर चीन कभी ताइवान पर कब्जा करता है, तो उसका अगला टारगेट भारत ही होगा और निश्चित तौर पर वो दोनों देशों को युद्ध की दिशा में ले जाएगा.. तो फिर क्यों ना दुश्मन के साथ दोस्ती की आदत को किनारे रखा जाए और किसी भी कनफ्यूजन को ठिकाने लगाते हुए चीन को लेकर पुख्ता विदेश नीति तैयार की जाए!

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भारत की 'एक चीन नीति' क्या रही है?

इसमें कोई शक नहीं है, कि भारत ने साल 2010 से ही 'वन चायना पॉलिसी' से दूरी बनाना शुरू कर दिया था और 2010 में पीएम मनमोहन सिंह ने चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जायबाओ की भारत यात्रा के दौरान 'वन चायना पॉलिसी' का जिक्र अपने बयान से हटा दिया था।

फिर साल 2014 में जब नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने ताइवान के राजदूत चुंग क्वांग टीएन और केन्द्रीय तिब्बत प्रशासन के अध्यक्ष लोबसंग सांगे को अपनी शपथ ग्रहण में आमंत्रित किया था, और चीन को साफ संदेश देने की कोशिश की गई थी, कि मोदी सरकार की नीति ताइवान को लेकर क्या रहने वाली है, लेकिन उसके ठीक बाद मोदी सरकार ने चीन के साथ फिर से नजदीकी संबंध बनाने शुरू कर दिए।

गलवान संघर्ष से पहले तक, भारतीय पीएम नरेन्द्र मोदी जिस गर्मजोशी से चीन के राष्ट्रपति से मिलते थे, उससे लगता ही नहीं था, कि दोनों दुश्मन देश हैं। लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अब समय आ गया है, कि नई दिल्ली ताइवान के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करे और राजनयिक संबंध बढ़ाए।

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भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है ताइवान?

कोविड महामारी के बाद से जैसे-जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है, वैसे वैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मांग में इजाफा होते देखा जा रहा है और इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर में प्रोडक्शन के लिए ताइवान, दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण देश है।

ताइवान अकेले दुनिया की जरूरत का 65 प्रतिशत सेमीकंडक्टर का निर्माण करता है और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और विनिर्माण के अन्य संबंधित क्षेत्रों के लिए कई इलेक्ट्रॉनिक स्पेयर पार्ट्स अभी भी ताइवान की उत्पादन सुविधाओं पर बहुत अधिक निर्भर हैं।

स्थिति ये है, कि चीन का मैन्यूफैक्चरिंग गुड्स इंडस्ट्री भी इलेक्ट्रॉनिक सामानों के लिए ताइवान पर पूरी तरह से निर्भर है, लिहाजा ताइवान पर अगर चीन का कब्जा होता है, तो वो दुनिया की इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्री को एक दिन में धूल चटा सकतचा है। ताइवान के लिए सबसे अच्छी बात ये है, कि ताइवान के पास उसकी जीडीपी का 280 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार है, जो चीन के साथ युद्ध की स्थिति में देश को भूख से बचाएगा। लेकिन, सवाल ये हैं, कि क्या अब भारत को खुलकर ताइवान के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए। क्योंकि इतिहास गवाह है, कि चीन जिन भारतीय क्षेत्रों पर नजर रखता है, वो अपने मकसद से पीछे नहीं हटेगा।

नवंबर 2023 में विल्टन पार्क में पत्रकार लियोनेल बार्बर के साथ बातचीत के दौरान भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ताइवान के साथ आर्थिक संबंधों को लेकर भारत के नजरिए को रेखांकित किया था। जयशंकर ने गतिशीलता समझौते जैसे सहयोगात्मक प्रयासों पर जोर देते हुए भारत और ताइवान के बीच बढ़ती आर्थिक और तकनीकी साझेदारी पर प्रकाश डाला था। उनकी टिप्पणियों ने दोनों देशों के बीच जुड़ाव की गहराई को रेखांकित किया, जो बढ़ते सहयोग की बदलती गतिशीलता को दर्शाता है।

लेकिन, क्या 'एक चीन नीति' को लेकर भारत को चीन को स्पष्ट संदेश नहीं देना चाहिए, कि भारत चीन के किसी
'वुल्फ वॉरियर डिप्लोमेसी' से डरने वाला नहीं है। खासकर क्या मोदी सरकार को अपने तीसरे कार्यकाल के दौरान चीन को लेकर जो कनफ्यूज्ड विदेश नीति दिखती है, जिसमें एस. जयशंकर बार बार कहते हैं, कि चीन और भारत के संबंध तनावपूर्ण है, जबकि दूसरी तरफ दोनों देशों का कारोबार 100 अरब डॉलर को भी पार कर गया है, क्या उसपर सोच विचार की जरूरत नहीं है?

और इसके लिए भारत को घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को प्रोत्साहित करने, इंडस्ट्री सेटअप के सामने आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने, टैक्स कानूनों को उदार बनाने और आपूर्ति श्रृंखला तंत्र को मजबूत करने के लिए ताइवान के साथ अधिक आर्थिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है, ताकि चीन को एक सख्त संदेश देने के साथ साथ विश्व व्यवस्था में नेतृत्व का निर्धारण किया जाए।

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