मंगल पर घर बनाने के लिए ईंट की खोज, भारतीय वैज्ञानिकों को मिली बड़ी कामयाबी, क्या है ‘स्पेस ब्रिक’?
वैज्ञानिकों द्वारा 'स्पेस ब्रिक्स' बनाए जाने के बाद मंगल ग्रह पर मानव बस्तियां बनने का सपना थोड़ा थोड़ा सच होता दिखाई देने लगा है।
नई दिल्ली, मई 03: मंगल ग्रह पर इंसानी जीवन बसाने की तैयारी पिछले कई सालों से दुनियाभर के वैज्ञानिक कर रहे हैं और लगातार अलग अलग प्रयोग किए जा रहे हैं, ताकि मंगल ग्रह को जीवन बसाने लायक तैयार किया जा सके। दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क की भी योजना मंगल ग्रह पर जीवन बसाने की है, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों को मंगल ग्रह पर घर बनाने के लिए जो स्पेशल ईंट बनाने में कामयाबी मिली है।

भारतीय वैज्ञानिकों को सफलता
भारत की अग्रणी रिसर्च संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस और भारत सरकार की अंतरिक्ष एजेंसी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानि इसरो के रिसर्च वैज्ञानिकों ने आवास के लिए चंद्रमा पर ईंटें बनाने की एक प्रक्रिया विकसित की है। आपको जानकर काफी आश्चर्य होगा, कि इस ईंट को इंसानी मूत्र से बनाया गया है। इस प्रक्रिया में मिट्टी, बैक्टीरिया और ग्वार बीन्स का उपयोग करके बनाया गया है और फिर इसे ईंट जैसी कठोर संरचना में ढाला गया है। इस मिश्रण को जब कुछ दिनों के लिए छोड़ा गया, तो बैक्टीरिया ने यूरिया को कैल्शियम कार्बोनेट के क्रिस्टल में बदल दिया था।

मानव बस्ती बसा पाएगा इंसान?
मेट्रो.यूके की खबर के मुताबिक, वैज्ञानिकों द्वारा 'स्पेस ब्रिक्स' बनाए जाने के बाद मंगल ग्रह पर मानव बस्तियां बनने का सपना थोड़ा थोड़ा सच होता दिखाई देने लगा है। वैज्ञानिकों ने मुताबिक, लाल ग्रह पर धूल भरी मंगल की मिट्टी के साथ अंतरिक्ष यात्रियों के मूत्र को मिलाकर इस ईंट को बनाया जा सकता है। इस घोल को किसी भी आकार के सांचों में डाला जा सकता है और कुछ दिनों में बैक्टीरिया यूरिया को कैल्शियम कार्बोनेट क्रिस्टल में बदल देते हैं।

बैक्टीरिया करते हैं सीमेंट का काम
आपको जानकर आश्चर्य होगा, कि बैक्टीरिया से जो बायोपॉलिमर स्त्रावित होता है, वो क्रिस्टल के साथ मिलकर सीमेंट का काम करने लगता है, तो मिट्टी को काफी ठोस रखने का काम करता है। इन इंटों को भारतीय स्पेस एजेंसी इसरों द्वारा विकसित किया गया है, और अब इसरो के वैज्ञानिक इस बात को लेकर रिसर्च कर रहे हैं, कि मंगल के पर्यावरण का इन ईंटों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। आपको बता दें कि, इसरो की टीम ने ही इससे पहले चंद्रमा के लायक ईंटों का निर्माण किया था और अब मंगल के लिए ईंटों को बनाकर इसरो ने पूरे भारतवासियों को गर्व करने का मौका दिया है।

काफी मजबूत होते हैं ये ईंट
ये बैक्टीरिया, ईंटों के छिद्रों में काफी गहराई तक जाते हैं और अपने प्रोटीन का उपयोग कणों को एक साथ बांधने के लिए करते हैं, जिससे काफी कम छिद्रपूर्ण और काफी कठोर ईंटों का निर्माण होता है। हालांकि, चंद्रमा के लिए जिस तरह से ईंट का डिजाइन किया गया था और जिस विधि का इस्तेमाल किया गया था, उसके मुकाबले नई विधि अलग है। इसरो ने चंद्रमा के लिए जिन ईंटों का निर्मा किया था, उसके साथ सबसे अजीब दिक्कत ये हो गई थी, कि उस विधि से बनने वाली ईंटे बेलन के आकार की थीं, लेकिन मंगल ग्रह के लिए जिन ईंटों का निर्माण किया गया है, वो धरती पर इस्तेमाल होने वाली ईंटों की तरह ही हैं।

मंगल के अनुकूल कैसे बना बैक्टीरिया?
असल में मंगल ग्रह पर जो मिट्टी है, उसमें इतने अयस्क हैं, कि वो बैक्टीरिया को वृद्धि करने से रोक देते हैं, लिहाजा मंगल ग्रह की मिट्टी में निकेल क्लोराइड को मिलाया गया, जिसने मंगल ग्रह की मिट्टी को बैक्टीरिया के लिए अनुकूल बना दिया। अब वैज्ञानिकों का यह ग्रुप इस बात की जांच करने की योजना बना रहा है, कि मंगल ग्रह का वातावरण और कम गुरुत्वाकर्षण अंतरिक्ष की ईंटों की ताकत को कैसे प्रभावित करेगा।

अब वैज्ञानिक करेंगे ईंट की जांच
मंगल ग्रह का वातावरण पृथ्वी की तुलना में 100 गुना पतला है और 95 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड से बना है, जो बैक्टीरिया के विकास को महत्वपूर्ण रूप से रोक सकता है। ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए ये जानना काफी जरूरी है, कि मंगल ग्रह पर जब इन ईंटों से निर्माण कार्य शुरू होगा, तो उन ईंटों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसका परीक्षण करने के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने प्रयोगशाला में एनवायरोमेंट सिम्युलेटर उपकरण बनाया है, जो एक प्रयोगशाला में लाल ग्रह की वायुमंडलीय स्थितियों की तरह है, जहां इस ईंट पर रिसर्च होगा।

लैब-ऑन-ए-चिप डिवाइस
रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों की टीम ने एक लैब-ऑन-ए-चिप डिवाइस भी विकसित किया है जिसका उद्देश्य सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण स्थितियों में जीवाणु गतिविधि को मापना है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की मदद से टीम ने ऐसे उपकरणों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना बनाई है, ताकि वे बैक्टीरिया के विकास पर कम गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव का अध्ययन कर सकें।

पीएलओएस पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च
इस रिसर्च को लिखने वाले एक वरिष्ठ लेखक डॉ आलोक कुमार ने कहा कि, 'मैं बहुत उत्साहित हूं कि दुनिया भर के कई शोधकर्ता अन्य ग्रहों का उपनिवेश करने के बारे में सोच रहे हैं। यह जल्दी नहीं हो सकता है, लेकिन लोग सक्रिय रूप से इस पर काम कर रहे हैं'। उन्होंने कहा कि, 'ईंटों के निर्माण की दिशा में एक स्केलेबल कास्टिंग विधि के साथ यह जैविक दृष्टिकोण, अतिरिक्त-स्थलीय आवासों पर संरचनात्मक तत्वों के सीटू उपयोग के लिए एक आशाजनक और अत्यधिक टिकाऊ को लेकर एक संभावित रास्ता बनाता है।' आपको बता दें कि, इस रिसर्च को मशहूर विज्ञान पत्रिका पीएलओएस वन में प्रकाशित किया गया है।












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