बॉब बालाराम पर गर्व: NASA के हेलीकॉप्टर को मंगल ग्रह पर भारतीय IIT इंजीनियर ने उड़ाया

मंगल ग्रह पर नासा के इंजीन्यूटी हेलीकॉप्टर को भारतीय मूल के इंजीनियर डॉ. बॉब बालाराम ने उड़ाया।

ह्यूस्टन, अप्रैल 20: 19 अप्रैल को वो ऐतिहासिक दिन था जब अमेरिकन स्पेस एजेंसी नासा ने मंगल ग्रह पर इंजीन्यूटी हेलीकॉप्टर को कामयाबी के साथ उड़ाया। पूरी दुनिया के स्पेस टेक्नोलॉजी और स्पेस एजेंसी के लिए ये एक ऐतिहासिक पल था क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है जब मंगलग्रह पर मौजूद हेलीकॉप्टर को धरती से कंट्रोल किया गया और धरती से उसे उड़ाया गया। लेकिन, अब नासा ने बताया है कि उसके इस ऐतिहासिक मंगल मिशन के पीछे किसका हाथ है। नासा ने कहा है कि उसकी कामयाबी के पीछे इंडियन इंजीनियर बॉब बालाराम का हाथ है, जो अब अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं। बॉब बालाराम नासा के जेट प्रोपल्शन लैब में काम करते हैं और डॉक्टर जे. जॉब बालाराम ने ही नासा के इंजीन्यूटी हेलीकॉप्टर को बनाया है। नासा के लिए तो ये गर्व की बात है ही, लेकिन भारत के लिए भी ये गर्व की बात है कि हिंदुस्तान की जमीं से निकला उसका बेटा विश्व की सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसी में ना सिर्फ काम करता है बल्कि सबसे बड़े मिशन को कामयाबी के साथ अंजाम भी देता है। (तस्वीर सौजन्य- नासा)

कौन हैं डॉ. जे. बॉब बालाराम

कौन हैं डॉ. जे. बॉब बालाराम

नासा द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. जे. बॉब बालाराम इंजीन्यूटी हेलीकॉप्टर को बनाया था और डॉ. जे. बॉब बालाराम ही नासा के मार्स हेलीकॉप्टर मिशन के चीफ इंजीनियर हैं। डॉ. जे. बॉब बालाराम दक्षिण भारत से ताल्लुक रखते हैं और नासा ने कहा है कि डॉ. जे. बॉब बालाराम बचपन से ही रॉकेट, स्पेसक्राफ्ट और स्पेस साइंस में दिलचस्पी रखते थे। रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. जे. बॉब बालाराम जब छोटे थे तो उनके चाचा ने अमेरिकन काउंसलेट को चिटठी लिखी थी, जिसमें उन्होंने नासा और स्पेस एक्सप्लोरेशन को लेकर जानकारियां मांगी थी। कुछ दिनों बाद नासा की तरफ से एक सीलबंद लिफाफे में ये जानकारियां भेज दी गईं। छोटी उम्र के डॉ. जे. बॉब बालाराम नासा की चिट्ठी पाकर बहुत खुश हुए। डॉ. जे. बॉब बालाराम ने पहली बार इंसानों के चांद पर उतरने की बात रेडियो पर सुनी थी और बचपन में ही ठान लिया था कि उन्हें स्पेस इंजीनियर बनना है।

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    चांद पर इंसान के साथ पहुंचा ख्वाब

    चांद पर इंसान के साथ पहुंचा ख्वाब

    अपने इंटरव्यू के दौरान डॉ. जे. बॉब बालाराम ने बताया कि उस वक्त टेलीविजन नहीं हुआ करता था और स्पेस की खबरें वो रेडियो पर सुना करते थे। उन्होंने कहा कि उस वक्त बिना इंटरनेट के भी अमेरिका की आवाज हर तरफ सुनाई देती थी, उसी दौरान उन्होंने सुना कि चांद पर पहली बार इंसान उतरे हैं। डॉ. जे. बॉब बालाराम उस दिन को आज तक नहीं भूले हैं। इंटरव्यू के दौरान डॉ. जे. बॉब बालाराम से पूछा गया कि आखिर मंगल ग्रह पर इंजीन्यूटी हेलीकॉप्टर सिर्फ 30 सेकेंड्स तक ही क्यों उड़ा? तो उन्होंने बताया कि मंगल ग्रह पर वायुमंडल की स्थिति ऐसी है कि वहां किसी भी चीज को उड़ाना और फिर उसे मंगल की सतह पर वापस लैंड कराना काफी मुश्किल काम है। उन्होंने कहा कि मंगल ग्रह का वायुमंडल पृथ्वी की तरफ भारी नहीं है, वो बेहद हल्का है। उन्होंने कहा कि 30 सेकेंड्स तक मंगल ग्रह पर हेलीकॉप्टर को उड़ाने में उन्होंने अपने 35 साल का एक्सप्रिएंस का इस्तेमाल करने के साथ साथ दुनियाभर के कई देशों के वैज्ञानिकों की ऊर्जा लगी है।

    अटकी थी सांसे

    अटकी थी सांसे

    डॉ. जे. बॉब बालाराम ने अपने इंटरव्यू के दौरान कहा कि मंगल ग्रह पर नासा के लिए हेलिकॉप्टर उड़ाना ठीक वैसा ही था जैसे धरती पर पहली बार राइट बंधुओं के द्वारा पहली बार विमान उड़ाना। उन्होंने कहा कि पहली बार राइट ब्रदर्स का विमान सिर्फ 12 सेकेंड्स के लिए उड़ा था और उसने सिर्फ 120 फीट तक ऊंचाई तक उड़ान भरी थी लेकिन आज की स्थिति अलग है। पहली बार राइट ब्रदर्स ने जो किया वो ऐतिहासिक था। उन्होंने कहा कि 30 सेकेंड्स तक इंजीन्यूटी हेलिकॉप्टर मंगल ग्रह पर उड़ाने के दौरान सभी की सांसे अटकी हुई थीं।

    डॉ. जे. बॉब बालाराम की पढ़ाई-लिखाई

    डॉ. जे. बॉब बालाराम नासा के जेपीएल में पिछले 35 सालों से काम कर रहे हैं और वो रोबोटिक्स टेक्नोलॉजी के भी एक्सपर्ट माने जाते हैं। उन्होंने दक्षिण भारत में जिड्डू कृष्णमूर्ति द्वारा स्थापित ऋषि वैली स्कूल में बचपन में पढ़ाई लिखाई की और फिर वो आईआईटी के लिए चुने गये। उन्होंने आईआईटी मद्रास से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और फिर आईआईटी मद्रास से ही उन्होंने मास्टर्स की भी डिग्री हासिल की। आईआईटी से पढ़ाई करने के बाद डॉ. जे. बॉब बालाराम न्यूयॉर्क के रेनसीलर पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट से कम्प्यूटर एंड सिस्टम इंजीनियरिंग से डिग्री हासिल की और फिर उन्होंने वहीं से पीएचडी भी की।

    दूसरे सबसे बड़े भारतवंशी इंजीनियर

    दूसरे सबसे बड़े भारतवंशी इंजीनियर

    डॉ. जे. बॉब बालाराम नासा में काम करने वाले भारतीय मूल के इंजीनियरों में दूसरे नंबर पर हैं। पहले नंबर पर स्वाति मोहन हैं, जिन्होंने कुछ दिन पहले नासा के ही मंगल मिशन पर्सिवियरेंस प्रोजेक्ट को कामयाबी के साथ अंजाम दिया था। डॉ. स्वाति मोहन की तारीफ उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने की थी और उन्हें भारत-अमेरिका का गर्व बताया था। जो बाइडेन ने उस वक्त कहा था कि नासा में भारतीय इंजीनियर काफी अच्छा काम कर रहे हैं और वो अमेरिका का नाम रोशन कर रहे हैं। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि उन्हें भारतवंशी इंजीनियरों पर गर्व है।

    नासा का हेलिकॉप्टर मिशन

    डॉ. जे. बॉब बालाराम ने कहा कि पृथ्वी पर हेलिकॉप्टर उड़ाना और मंगल ग्रह पर हेलिकॉप्टर उड़ाना काफी अलग अलग बात है। उन्होंने मिशन को लेकर कहा कि अगर आप धरती पर एक लाख फीट यानि करीब 30 हजार 500 मीटर की ऊंचाई पर हेलिकॉप्टर उड़ाते हैं तो मंगल ग्रह पर इतनी की ऊर्जा के साथ वो मंगल ग्रह पर करीब 7 गुना ज्यादा ऊंचा चला जाएगा। उन्होंने कहा कि मंगल ग्रह की सतह पर कार्बन डायऑक्साइड ज्यादा है, लिहाजा मंगल ग्रह का सतह काफी हल्का है, ऐसे में मंगल ग्रह की सतह पर हर चीज का वजन काफी कम हो जाता है, लिहाजा मंगल ग्रह पर हेलिकॉप्टर को उड़ाना काफी मुश्किल था। डॉ. जे. बॉब बालाराम ने कहा कि मंगल ग्रह पर नासा की अगली उड़ाने ज्यादा देर की होंगी।

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