भारतीय नौसेना में स्थायी कमीशन की लड़ाई लड़तीं महिला अधिकारी

नई दिल्ली, 25 जनवरी। भारतीय नौसेना में काम करने वाली दर्जन भर से अधिक महिला अधिकारी स्थायी कमीशन के लिए लंबे अर्से से लड़ाई लड़ रही हैं. उनकी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट पर टिकी है, जो अगले कुछ दिनों में उनके भविष्य को लेकर फैसला सुना सकता है. 3 जनवरी 2022 को सशस्त्र बल अधिकरण (एएफटी) ने महिला अधिकारियों के खिलाफ फैसला सुनाते हुए उन्हें झटका दिया था. हालांकि एएफटी का यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के उलट आया जहां सेना की सभी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया गया था जिन्होंने लैंगिक भेदभाव के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी थी.
नौसेना में कमांडर के पद पर तैनात एक महिला अफसर ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि वह नौसेना में अपनी और सेवा देना चाहती हैं और देश की सेवा आगे भी इसी तरह से करना जारी रखना चाहती हैं.
हालांकि उनकी भर्ती शॉर्ट सर्विस कमीशन पर हुई थीं. और उन्हें 3 जनवरी को एएफटी के आदेश के बाद सर्विस से रिलीज कर दिया गया. उन्होंने एएफटी से कुछ राहत मांगी और एएफटी के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.
महिला कमांडर के मुताबिक, "हमारे जो पुरुष साथी थे, खास तौर से जो टेक्निकल विभाग के थे, उन्हें स्थायी कमीशन का विकल्प दिया गया था, हालांकि नौसेना ने उन्हीं शाखा को चुना जहां महिला अफसर नहीं थीं. 2008 में नौसेना की एक नई नीति आई जिसमें यह कहा गया कि कानून, शिक्षा और नेवल कंस्ट्रक्चर ब्रांच में स्थायी कमीशन दिया जाएगा, जो भी 2008 के बाद भर्ती हुए होंगे."
वे आगे कहती हैं, "अगर हम 2008 में नौसेना में भर्ती हुए तो यह हमारी गलती नहीं है." महिला कमांडर कहती हैं कि नौसेना ब्रांच विशिष्ट नहीं हो सकती है. उनका कहना है अगर नौसेना को समानता बनाई रखनी है तो सभी ब्रांच में एक नियम का पालन करना होगा.
पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने एएफटी की प्रधान पीठ से कहा था कि वह स्थायी कमीशन के लिए दावा खारिज करने के फैसले को चुनौती देने वाले नौसैन्य अधिकारियों की याचिकाओं पर फैसला करे और पेंशन लाभ उपलब्ध कराए. कोर्ट ने कहा था, "हमें एक राष्ट्रीय संस्थान के रूप में कानून के अनुक्रम का पालन करना होगा."
कोर्ट ने कहा था महिला अधिकारियों को सेना और नौसेना में स्थायी कमीशन प्रदान करने के लिए उसके द्वारा तय किए गए कानून का सिद्धांत समान रूप से पुरुष अधिकारियों के मामले में भी लागू होगा और कोई भेदभाव नहीं होगा.
कोर्ट ने माना था लैंगिक भेदभाव हो रहा
17 मार्च 2020 को अपने एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने नौसेना में पुरुष अधिकारियों की तरह महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का आदेश दिया था. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अजय रस्तोगी की बेंच ने अपने इस फैसले में कहा था कि स्थायी कमीशन देने में पुरुष और महिलाओं के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए.
महिलाओं को स्थायी कमीशन नहीं देने पर कोर्ट ने कहा था कि यह 'लैंगिक भेदभाव' है. साथ ही बेंच ने अपने आदेश में कहा था, "महिलाओं को सेवा से वंचित रखना सीधे तौर पर भेदभाव है. महिला अधिकारी भी उसी क्षमता के साथ काम कर सकती हैं जैसे कि पुरुष अधिकारी और इसमें कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए."
सुप्रीम कोर्ट में महिला अधिकारियों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील एसएस पांडे कहते हैं मार्च 2020 को जो आदेश आया उसको नौसेना ने लागू करने में नौ महीने लगा दिए. वे कहते हैं, "नौसेना ने पुरुष अधिकारियों को स्थायी कमीशन तो दे दिया लेकिन जो लोग कोर्ट में लड़ाई कर रहे थे उन्हें स्थायी कमीशन नहीं दिया. इनमें महिला अधिकारी भी शामिल हैं जो कोर्ट में अपना केस लड़ रही हैं."
अदालत में कानून लड़ाई लड़ने वाली 17 महिला अधिकारियों में से इस कमांडर का कहना है कि वह सर्विस में रहना चाहती हैं और हर रोज यूनिफॉर्म पहनना चाहती हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट में इस महिला कमांडर के पक्ष में फैसला नहीं आता है तो वह इसी साल फरवरी के महीने में अपने पद से रिटायर हो जाएंगी. हालांकि उन्हें पेंशन लाभ के अलावा अन्य सभी लाभ मिलते रहेंगे.
नेवी का पक्ष
एएफटी में नेवी ने सुनवाई के दौरान कहा था उसने जिसे भी स्थायी कमीशन दिया है वह मेरिट के आधार पर है. इन महिला अधिकारियों पर भी इसी आधार पर विचार किया गया है. नेवी ने कहा है कि रिक्त पद पर ही कमीशन दिया गया और इसके अलावा रिक्त पद हैं ही नहीं तो स्थायी कमीशन कहां से दिया जाएगा.
इससे पहले महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन देने के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2020 में ऐतिहासिक फैसला दिया था. इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन न देना उन्हें उनके हक से वंचित करने जैसा है. कोर्ट ने कहा था कि महिला अधिकारी भी पुरुषों की तरह स्थायी कमीशन की हकदार हैं. अब देखना होगा कि इन 17 नौसेना अधिकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट कैसा फैसला सुनाता है.
Source: DW
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