ईरान वाली भूल नहीं करेगा भारत, देगा रूस का साथ, पिछली बार अमेरिका का साथ देकर हुई थी बड़ी गलती
भारत की तेल कंपनियों ने पश्चिमी देशों के बैन के बाद से पहले की तुलना में कई गुना अधिक तेल खरीदना शुरू कर दिया है। भारत इस बार ईरान वाली गलती नहीं दोहराने जा रहा है
नई दिल्ली, 11 जुलाईः यूक्रेन पर रूस के आक्रमण करने के बाद से ही अमेरिका सहित पश्चिमी देश लगातार दूसरे देशों पर पुतिन के देश से तेल ना खरीदने का दबाव बना रहे हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों का मानना है कि इससे रूस को आर्थिक चोट पहुंचाई जा सकती है। लेकिन भारत की तेल कंपनियों ने पश्चिमी देशों के बैन के बाद से पहले की तुलना में कई गुना अधिक तेल खरीदना शुरू कर दिया है। भारत इस बार ईरान वाली गलती नहीं दोहराने जा रहा है जब अमेरिका के निर्देश पर देश ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था।

कई गुणा बढ़ा रूसी तेल का आयात
भारतीय तेल कंपनियां अधिक से अधिक मात्रा में रूसी तेल खरीद रही हैं वहीं, भारत सरकार घरेलू तेल कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचाने के तरीके खोजने में जुटी है। 24 फरवरी को रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले के बाद भारत ने मई महीने तक प्रतिदिन औसतन 819,000 बैरल तेल खरीदा जबकि अप्रैल में यह दर 277,000 बैरल प्रतिदिन थी। वहीं अगर ठीक एक साल पहले की बात की जाए तो मई 2021 में यह आंकड़ा 33,000 बैरल मात्र था। आश्चर्य नहीं है कि रूस, भारत में तेल का निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर बन गया है। रूस ने सऊदी अरब को ढकेलते हुए यह मुकाम हासिल किया है। वहीं, इस मामले में इराक टॉप पर है।

रूस से मिलने वाली छूट हुई कम
भारत के एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि भारत की योजना है कि वह रूस से कम छूट पर तेल खरीदना जारी रखेगा। हालांकि, अब तेल पर मिलने वाली यह छूट कम होती जा रही है। उन्होंने कहा, अगर भारत, रूस से तेल खरीदना बंद कर देता है तो पूरी दुनिया में तेल की मांग बढ़ेगी और इसके साथ तेल की कीमतों में भी इजाफा होगा। सरकार और तेल रिफाइनरी कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि रूस का कच्चा तेल खरीदने का भारत का मुख्य कारण व्यावसायिक है।

चीन खरीद सकता है, तो भारत क्यों नहीं?
चीन के बाद भारत सबसे अधिक मात्रा में रूस का तेल खरीद रहा है, जिससे रूस के तेल पर लगे प्रतिबंधों की वजह से मांग में कमी की भरपाई हुई है। दरअसल पश्चिमी देशों ने यूक्रेन पर हमले को लेकर रूस को अलग-थलग करने के प्रयास किए और उस पर भारी प्रतिबंध लगा दिए। इस मामले पर कमार एनर्जी में एनर्जी कंसल्टेंसी के चीफ एग्जिक्यूटिव रॉबिन मिल्स ने रॉयटर्स से कहा, भारत का मानना है कि अगर चीन, रूस का तेल खरीद रहा है तो हम क्यों नहीं खरीद सकते?

दोबारा गलती नहीं दोहराना चाहता भारत
भारत दोबारा ईरान के मामले में हुई गलती को नहीं दोहराना चाहता है। कुछ वर्ष पहले जब ईरान पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए तो उसने भारत समेत दूसरे देशों पर भी इन प्रतिबंधों का पालन करने की हिदायत दी। हालांकि, चीन ने तमाम प्रतिबंधों के बावजूद ईरान का तेल खरीदना जारी रखा था लेकिन भारत ने अमेरिका से अपने हितों का ध्यान रखते हुए ईरान से तेल खरीदना लगभग बंद कर दिया। ईरान ने उस वक्त ये शिकायत भी की थी कि भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए अमेरिकी दबाव के सामने और ज्यादा मजबूती से सामने आना चाहिए था।

भारत का पुराना मित्र है रूस
भारतीय अधिकारियों का कहना है कि देश की घरेलू जरूरतें पहले आती हैं और ऊर्जा सहयोग के मामले में रूस भारत का अमेरिका से बेहतर दोस्त रहा है। इसके पीछे आर्थिक जरूरतें भी हैं। भारत की तेल रिफाइनरियों ने काफी कम कीमत पर रूस का तेल खरीदा है लेकिन अब यह छूट कम होती जा रही है। भारत आमतौर पर ओपेक की तेल उत्पादन की रणनीतियों पर चुटकी लेता रहता है। भारत के ऊर्जा मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि तेल की बढ़ी कीमतें तेल उत्पादकों और उपभोक्ताओं के लिए ठीक नहीं हैं।

कई यूरोपीय देश रूस से खरीद रहे तेल
पुरी ने पिछले महीने कहा था, हमें अपने हितों का खुद ध्यान रखना पड़ता है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने यूक्रेन संकट के संदर्भ में भारत की ऊर्जा नीति को कुछ हद तक अस्थिर बताया था। इस पर भारतीय अधिकारियों का कहना है कि भारत की तेल कंपनियां कानूनी तरीके से तेल खरीद रही हैं। उन्होंने इसके लिए कुछ यूरोपीय देशों का उदाहरण भी दिया जो अभी भी रूस का तेल और गैस खरीद रहे हैं।

एस जयशंकर ने भी दिया दो टूक जवाब
सरकारी और निजी तेल कंपनियों का कहना है कि उन्हें नहीं लगता कि भारत रूस के कच्चे तेल की खरीद को कम करेगा। पिछले महीने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि रूस से तेल खरीद पर भारत के खर्च को यूक्रेन में युद्ध की फंडिंग के तौर पर क्यों देखा जा रहा है जबकि यूरोप के भी कई देश रूस से गैस खरीद रहे हैं।

रिएक्टर्स निर्माण में रूस ने की मदद
रूस ने ऊर्जा के अन्य क्षेत्रों में भारत की मदद भी की है। जब भारत में परमाणु संयंत्रों के निर्माण के पश्चिमी देशों के प्रयास सफल नहीं हो पाए, तब रूस की मदद से दो रिएक्टर्स का भारत में निर्माण किया गया। ये दोनों रिएक्टर कुडनकुलम में 2014 और 2017 से संचालित हैं। इसके बाद 2017 में इस तरह के दो और रिएक्टर्स का निर्माण शुरू हुआ था। इसके बाद मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 2018 में इस तरह के छह और रिएक्टर के निर्माण पर सहमति जताई थी। रूस ने कश्मीर सहित कई पेचीदा मामलों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का समर्थन किया है।












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