Analysis: कनाडा को आगे कर 'डबल गेम' खेलता अमेरिका, भारत को रूस-चीन खेमे में कैसे धकेल रहा US?

India-US Relation: भारत और चीन की तरफ से पूर्वी लद्दाख में 54 महीने से चले आ रहे सैन्य गतिरोध को खत्म करने और नियंत्रण रेखा पर संयुक्त गश्त शुरू करने का फैसला, क्षेत्र में शांति और स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

यह समझौता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने रूस में 16वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत, चीन और रूस के नेताओं के बीच त्रिपक्षीय बैठक के लिए मंच तैयार किया है। शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति को लेकर बहुत उत्सुकता थी, जिससे रूस के साथ विशेष रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा मिलने का रास्ता खोल दिया है।

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इसके अलावा, इसने गतिरोध का समाधान करते हुए मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत का रास्ता भी खोल दिया, जिससे कूटनीतिक जुड़ाव का यह नया चरण और मजबूत होगा। हालांकि, चीन को लेकर भारत को ज्यादा उम्मीदें नहीं लगानी चाहिए, क्योंकि LAC पर चीन ने जो निर्माण किए हैं, इसकी उम्मीद ना के बराबर है, कि वो उन सैन्य निर्माणों को हटाएगा, साथ ही चीन, भूटान से भी डोकलाम छीनने के लिए लगातार दबाव बना रहा है। लेकिन, ये भी याद रखना चाहिए, कि जियो-पॉलिटिक्स में कोई किसी का स्थाई दुश्मन या दोस्त नहीं होता है और यहां सिर्फ एक ही चीज का ख्याल रखा जाता है, वो है अपना हित।

अमेरिका को भारत दे रहा सूक्ष्म संदेश?

भारत-चीन में सीमा गतिरोध को लेकर फिलहाल हुए समझौते का दूरगामी अंजाम क्या होगा, ये तो भविष्य बताएगा, लेकिन मौजूदा स्थिति में गतिरोध के समाधान से न सिर्फ कूटनीतिक बातचीत के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं, बल्कि इससे अमेरिका को एक सूक्ष्म संदेश भी मिलता है, जो वाशिंगटन के साथ अपने बढ़ते संबंधों के भारत के संभावित पुनर्मूल्यांकन की ओर इशारा करता है।

यह पुनर्मूल्यांकन खालिस्तानी आतंकवादियों के प्रति अमेरिका के 'उकसाने वाली कार्रवाई' और प्रधानमंत्री मोदी के तहत भारत के शासन की आलोचनाओं के बीच हुआ है, जिसने भारत-अमेरिका संबंधों पर छाया डाली है।

भारत और अमेरिका के बीच उतार-चढ़ाव वाले रणनीतिक संबंधों का ऐतिहासिक बैकग्राउंड, विशेष रूप से शीत युद्ध के दौर के दौरान और उसके बाद, एक ज्यादा भरोसेमंद गठबंधन की भारत की लगातार खोज को दर्शाती है, जो उसे बार बार वाशिंगटन के बजाय मास्को की तरफ ले जाता है।

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अमेरिका और रूस के साथ भारत के जटिल कूटनीतिक संबंध ऐतिहासिक घटनाओं की एक श्रृंखला से प्रभावित हैं, जिसमें अमेरिका का पाकिस्तान के पक्ष में अपने एयरक्राफ्ट कैरियर को भारतीय सेना पर हमला करने के लिए भेजने से लेकर बाद में बोकारो स्टील प्लांट जैसी परियोजनाओं से पीछे हटना शामिल है, जिसे आखिरकार तत्कालीन सोवियत संघ के समर्थन से सफल किया गया।

हालांकि, शीत युद्ध के बाद की दुनिया ने भारत-अमेरिका संबंधों में सुधार देखा, विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग में इजाफा और अमेरिका में भारतीय प्रवासियों की प्रभावशाली भूमिका को भी महसूस किया है, लेकिन लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर अमेरिका के 'चौधरी' बनने की कोशिश और खालिस्तानी अलगाववादियों को उसके समर्थन ने बार बार भारत में एक बहस को जन्म दिया है, कि क्या भारत, अमेरिका पर उस तरह से विश्वास कर सकता है, जैसा विश्वास रूस पर करता है।

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कनाडा के कंधे से गोली चलाता अमेरिका!

खालिस्तान के मुद्दे ने न सिर्फ भारत-अमेरिका संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया है, बल्कि कनाडा की तरफ से भारतीय राजनयिकों को निष्कासित करने जैसी घटनाओं को भी जन्म दिया है, जिससे खालिस्तानी आंदोलन से जुड़े आरोपों के कारण संबंध को जटिल बना दिया है। इस तरह के घटनाक्रम भारत और अमेरिका और कनाडा जैसे देशों के बीच बढ़ते तनाव को रेखांकित करते हैं, जिससे भारत रणनीतिक सहयोगी के रूप में रूस और चीन के करीब पहुंच रहा है।

राजनीति और विदेश नीति में विशेषज्ञता रखने वाले अनुभवी लेखक और पत्रकार प्रकाश नंदा इन भू-राजनीतिक बदलावों को रूस और चीन के साथ संबंधों को गहरा करने के भारत के झुकाव के संकेत के रूप में व्याख्या करते हैं।

यह रणनीतिक झुकाव, संभवतः संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा जैसे पारंपरिक सहयोगियों के साथ अपने संबंधों की कीमत पर आ सकता है, जिनके बारे में नंदा का सुझाव है, कि उन्होंने भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने के बजाय विवादास्पद तत्वों का पक्ष लिया है।

भारत और चीन के बीच सैन्य गतिरोध का समाधान न सिर्फ उनके द्विपक्षीय संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत करता है, बल्कि भारत के व्यापक रणनीतिक पुनर्गठन को भी दर्शाता है।

जैसे-जैसे भारत रूस और संभावित रूप से चीन के साथ अपने संबंधों को मजबूत करता है, संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य पश्चिमी सहयोगियों के साथ उसके संबंधों पर पड़ने वाले असर को अभी भी देखे जाने बाकी है। हालांकि, गतिरोध को समाप्त करने और संयुक्त गश्त को फिर से शुरू करने का फैसला शांति और सहयोग की दिशा में एक स्पष्ट कदम है, जो क्षेत्र के भू-राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव का संकेत देता है, लेकिन चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है, और कनाडा को आगे कर अमेरिका जो खेल अब खेल रहा है, वो भारत को इसकी याद जरूर दिलाता है, कि भारत, अमेरिका का भले ही पार्टनर है, लेकिन 'सहयोगी' तो कनाडा ही है और अंत में अमेरिका, कनाडा की तरफ ही खड़ा रहेगा।

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