Opinoin: मतलब की बुनियाद पर बन रहे हैं भारत और अमेरिका के संबंध, जियो-पॉलिटिक्स में अब वैल्यूज नहीं बचे...
PM Modi US Visit: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगले हफ्ते अमेरिका के दौरे पर जाने वाले हैं और 9 सालों के उनके शासनकाल में ये पहली बार हो रहा है, जब प्रधानमंत्री मोदी, अमेरिका के राजकीय मेहमान होंगे। प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका दौरे को भारत के लिए गेमचेंजर बताया जा रहा, लेकिन दोनों देशों के बीच जिस नये संबंध का आगाज हो रहा है, उसका आधार क्या है?
दशकों से अमेरिकी नेता जब भारत आते हैं, या फिर भारतीय नेताओं से मुलाकात करते हैं, तो वे भारतीय राजनीति की सुंदरता, देश की विविधता, और कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों के शब्दों में, "दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र" और "दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र" कहकर इसकी सुंदरता का बखान किया जाता है।

लेकिन, क्या ये सिर्फ लफ्जों की लफ्फाजी नहीं है? क्योंकि भारत तो हमेशा से विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश रहा है और आजादी के बाद से इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद, भारत में चुनावों के बाद जिस तरह से सत्ता परिवर्तन हुआ है, वो दुनिया के लिए एक मिसाल है, तो फिर क्या आज तक अमेरिका इसे भूला क्यों था?
तो फिर भारत और अमेरिका के बीच, जिस नये संबंधों की इमारत खड़ी करने की कोशिश की जा रही है, उसके नींव में क्या है?
अमेरिकी नीति निर्माताओं के विचार में, सामान्य लोकतांत्रिक सिद्धांत एक व्यापक रणनीतिक महत्व वाले स्थायी अमेरिकी-भारतीय संबंध की नींव होंगे। दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र, वे कहते हैं, मदद नहीं कर सकते हैं लेकिन समान विश्वदृष्टि और रुचि रखते हैं।
भारत-यूएस संबंधों की नींव क्या है?
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता मोहनदास करमचंद गांधी को लिखा था, कि "लोकतंत्र और धार्मिकता में हमारी आम रुचि आपके देशवासियों और मेरे देशवासियों को एक आम दुश्मन के खिलाफ, एक आम कारण बनाने में सक्षम बनाती है।"
शीत युद्ध के दौरान, एक के बाद एक कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने नई दिल्ली को मॉस्को के खिलाफ यह तर्क खड़ा करने की कोशिश की, कि लोकतंत्र के तौर पर भारत, सोवियत संघ का स्वाभाविक दुश्मन है। जब राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 2005 में भारत के साथ एक सफल असैन्य परमाणु समझौता किया, तो उन्होंने घोषणा की थी, कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का मतलब है, कि दोनों राज्य "प्राकृतिक साझेदार" हैं जो "मूल्यों" के आधार पर एक हैं।
लेकिन, भारत ने बार बार अमेरिका की चालाकियों को पकड़ा है और भारत, कभी भी अमेरिका की जाल में नहीं फंसा, जिससे अमेरिका बार बार निराश हुआ है।
उदाहरण के लिए, महात्मा गांधी ने शाही जापान और नाजी जर्मनी के खिलाफ युद्ध को लेकर ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्रता के लिए, भारत के संघर्ष को प्राथमिकता देकर रूजवेल्ट को निराश किया।
वहीं, शीत युद्ध के दौरान नई दिल्ली ने न केवल वाशिंगटन के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया, बल्कि इसके बजाय इसने मास्को के साथ मधुर संबंध बनाए।
शीत युद्ध समाप्त होने और भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना शुरू भले ही कर दिया, लेकिन नई दिल्ली ने क्रेमलिन के साथ मजबूत संबंध बनाए रखा। भारत ने ईरान पर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ काम करने से इनकार कर दिया, और भारत ने म्यांमार के सैन्य शासन के खिलाफ भी अमेरिका का साथ नहीं दिया। हाल ही में, भारत ने यूक्रेन पर रूस के आक्रमण की निंदा करने से भी इनकार कर दिया।

तो फिर भारत और अमेरिका के संबंधों की नींव क्या है?
क्योंकि, यदि लोकतांत्रिक मूल्यों को ही माना जाए, तो अमेरिका-भारतीय संबंधों की आधारशिला लोकतंत्र का बनना हमेशा एक संदिग्ध रणनीति रही है। नौ साल पहले जब से नरेंद्र मोदी भारतीय प्रधानमंत्री बने हैं, लोकतंत्र को लेकर भारत पर हमेशा से सवाल उठे हैं।
वहीं, बाइडेन प्रशासन, जिसने खुद को लोकतांत्रिक आदर्शों के मुखर चैंपियन के रूप में पेश किया है, वो भारत को अब लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर सवाल नहीं पूछ पाता है।
और इसमें भी कोई शक नहीं, कि अमेरिका कमजोर हो रहा है और बाइडेन प्रशासन, वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में मजबूर नजर आया है और चीन की बढ़ती ताकत ने अमेरिका को भारत के पीछे चक्कर काटने वाला देश बना दिया है।
भारत ने हमेशा से भारत के खिलाफ पाकिस्तान को आगे बढ़ाया और अमेरिकी डॉलर्स पर पाकिस्तान ने भारत में आतंकवाद को बढ़ावा दिया और भारत इस बात को भूल नहीं सकता है। भारत भूल नही सकता है, कि अगर 1971 की जंग में उसे रूस का साथ नहीं मिलता, तो भारत काफी मुश्किल में पड़ जाता, क्योंकि इसी अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद में अपने सातवें बेड़े को हिंद महासागर में भेज दिया था। इसके साथ ही, भारत ये भी भूल नहीं सकता है, कि जब तक ट्विन टावर पर ओसामा बिन लादेन ने हमला नहीं किया, भारत को आतंकवाद पर अमेरिका का साथ नहीं मिला।
मतलब, दोनों देशों के संबंध का आधार कम से कम वैल्यूज तो नहीं है। क्योंकि ना तो भारत आज से लोकतांत्रिक देश है और ना ही अमेरिका ने आज इस बात को जाना है।
...तो फिर संबंध का आधार क्या है?
भारत और अमेरिका के बीच बनने वाले इस संबंध का आधार है, वक्त की जरूरत... आपसी हित। मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत ने कम से कम इतना तो साफ कर दिया, कि गुटनिरपेक्ष नीति मौजूदा जियो पॉलिटिक्स के लिए पुराना हो चुका है और अब भारत अपने हितों को सबसे आगे रखता है।
जाहिर है, भारत के हित एक कमजोर रूस के मुकाबले अमेरिका से ज्यादा पूर्ति होंगे।
पीएम मोदी के वॉशिंगटन यात्रा से भारत को अमेरिका से भारत में जेट इंजन बनाने की मंजूरी मिलेगी, वो भी टेक्नोलॉजी के साथ। भारत को ड्रोन हथियार मिलेंगे, वो भी टेक्नोलॉजी के साथ।
इसी साल जनवरी में, व्हाइट हाउस ने घोषणा की है, कि दोनों राज्यों की संयुक्त प्रौद्योगिकी पहल "हमारे साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और सार्वभौमिक मानवाधिकारों के प्रति सम्मान से आकार लेती हैं।" दोनों देशों ने टेक्नोलॉजी, हथियार निर्माण और स्पेस टेक्नोलॉजी को लेकर कई ऐसे समझौते किए हैं, जो आश्चर्यजनक हैं, क्योंकि एक मजबूत अमेरिका, भारत के साथ टेक्नोलॉजी को लेकर ऐसे समझौते कभी नहीं करता।

दुश्मन का दुश्मन, दोस्त होता है
नई दिल्ली, अब वाशिंगटन के लिए एक अमूल्य भागीदार बन चुका है, क्योंकि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। चीन, भारत का भी दुश्मन है और अमेरिका का भी.. और चीन के साथ भारत सीमा साझा करता है, लिहाजा भारत अब अमेरिका के लिए जितना महत्वपूर्ण है, उतना कोई नहीं है।
लेकिन, ये भारत, पाकिस्तान नहीं है, जिसने अफगानिस्तान युद्ध लिए खुद को भाड़े के सैनिकों की तरह पेश किया। भारत, अमेरिका को पहचानता है, इसीलिए भारत जानता है, कि उसे चीन से मुकाबले के लिए खुद खड़ा होना होगा, इसीलिए भारत आत्मनिर्भर बन रहा है। इसीलिए भारत, अब सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी को लेकर समझौते करता है। जहां टेक्नोलॉजी नहीं मिलती, वहां समझौता खत्म कर रहा है।
भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और कुछ सालों में भारत तीसरे स्थान पर पहुंच जाएगा, ये सब जानते हैं। वहीं, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना भारत के पास है। भारत के पास दुनिया में सबसे ज्यादा इंजीनियर हैं और भारत के पास अपना परमाणु जखीरा है।
और संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह, भारत भी चीन के बारे में गहराई से चिंतित है, जिसे वह क्षेत्रीय और वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने के इरादे से एक खतरनाक शक्ति के रूप में देखता है। लिहाजा, अब अमेरिका के लिए भारत के साथ सहयोग करने का सबसे अच्छा क्षण हो सकता है। लेकिन, सवाल यह है कि वाशिंगटन को लेकर, दिल्ली को कितनी दूर जाना चाहिए?












Click it and Unblock the Notifications