फिलीस्तीन के साथ भारत तो इजराइल के साथ संयुक्त राष्ट्र में खड़ा हुआ अमेरिका.. UN का गणित समझिए
India-Israel-Palestine: गाजा पट्टी में चल रही लड़ाई के बीच भारत ने एक बार फिर अपने दोस्त इजराइल को हाथ झटक दिया है और इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को खत्म करने के लिए दो-राज्य समाधान के लिए अपना समर्थन दोहराया है।
भारत ने इस बात पर जोर दिया है, कि इस तरह के समाधान में फिलिस्तीनी लोगों की सुरक्षा आवश्यकताओं के संबंध में इजराइल के साथ सुरक्षित सीमाओं में रहकर एक स्वतंत्र देश में रहने की क्षमता शामिल होगी। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय दूत ने सभी पक्षों से इस मामले में जल्द से जल्द सीधी शांति वार्ता फिर से शुरू करने का भी आह्वान किया है।

भारत ने किया टू-स्टेट थ्योरी का समर्थन
संयुक्त राष्ट्र की मान्यता हासिल करने के लिए फिलिस्तीन के आवेदन को संयुक्त राज्य अमेरिका ने वीटो कर रोक दिया है, जिसके बाद बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बैठक में, संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज ने कहा, कि "भारत दो-राज्य समाधान का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है।"
भारत ने कहा, कि "फिलिस्तीनी लोग सुरक्षित सीमाओं के भीतर एक स्वतंत्र देश में स्वतंत्र रूप से रहने में सक्षम हैं, एक स्थायी समाधान पर पहुंचने के लिए, हम सभी पक्षों से शीघ्र ही सीधी शांति वार्ता फिर से शुरू करने के लिए अनुकूल परिस्थितियों को बढ़ावा देने का आग्रह करते हैं।"
कंबोज ने कहा, कि भारत को उम्मीद है कि संयुक्त राष्ट्र में फिलीस्तीन के प्रवेश के मुद्दे पर उचित समय पर पुनर्विचार किया जाएगा और संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनने के फिलिस्तीन के प्रयास को समर्थन मिलेगा। उन्होंने यह भी दोहराया, कि गाजा में बड़े पैमाने पर नागरिक जीवन की हानि और मानवीय संकट अस्वीकार्य है और सभी परिस्थितियों में सभी को अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सम्मान करना चाहिए।
उन्होंने सभी पक्षों से एक साथ आने और फिलिस्तीनी क्षेत्र में मानवीय सहायता बढ़ाने का आग्रह करते हुए कहा, कि "7 अक्टूबर को इजराइल में आतंकवादी हमले चौंकाने वाले थे, और भारत स्पष्ट तौर पर आतंकवादी हमले की निंदा करता है। आतंकवाद और बंधक बनाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता है। भारत का आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों के खिलाफ एक दीर्घकालिक और समझौता न करने वाला रुख है, और हम मांग करते हैं सभी बंधकों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई हो।"
यूएन में फिलीस्तीन की एंट्री को US ने रोका
18 अप्रैल को अमेरिका ने फिलीस्तीन को पूर्ण सदस्यता प्रदान करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पेश किए गये प्रस्ताव को वीटो करके रोक दिया, जिससे फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता का रास्ता प्रभावी रूप से ब्लॉक हो गया है। 15 देशों की सुरक्षा परिषद ने उस मसौदा प्रस्ताव पर मतदान किया था, जिसमें संयुक्त राष्ट्र महासभा को "फिलिस्तीन राज्य को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता में शामिल करने" की सिफारिश की गई थी।
फिलीस्तीन को यूएन में शामिल करने के प्रस्ताव के पक्ष में 12 वोट पड़े, जबकि वोटिंग से स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन अनुपस्थित रहे और अमेरिका ने वीटो करके प्रस्ताव को ब्लॉक कर दिया। आपको बता दें, कि यूएनएससी में किसी प्रस्ताव को पास होने के लिए 15 सदस्यों में से 9 सदस्यों की मंजूरी होने के अलावा ये भी आवश्यक है, कि अमेरिका, चीन, फ्रांस, यूके और रूस, इन पांच सदस्यों में से कोई उस प्रस्ताव को वीटो करके रोक ना दे।
अमेरिका के वीटो करने का मतलब यह है, कि फिलीस्तीन फिलहाल संयुक्त राष्ट्र में एक "गैर-सदस्य पर्यवेक्षक राज्य" बना रहेगा। उसे यह दर्जा 2012 में यूएनजीए ने दिया था।
हालांकि, संयुक्त राष्ट्र में उप अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट वुड ने कहा, कि "अमेरिका अभी भी दो राज्य समाधान का समर्थन करता है और अमेरिका के वीटो का ये मतलब नहीं है, कि वो फिलीस्तीन को यूएन में नहीं देखना चाहता है, लेकिन ये दोनों पक्षों की मंजूरी और आपसी बातचीत के बाद तय होनी चाहिए। अभी भी कई ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब अभी तक तलाशे नहीं गये हैं और ऐसे सवालों के जवाब दोनों पक्षों के बीच आपसी बातचीत से आएगा। लिहाजा, फिलहाल अनसुलक्षे सवाल ये है, कि क्या फिलीस्तीन, एक राज्य माने जाने के मानदंडों को पूरा करता है?
फिलीस्तीन का यूएन स्टेटस क्या है?
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 सदस्यों में से 140 सदस्य देश पहले ही फिलीस्तीन को एक राज्य के रूप में मान्यता दे चुके हैं। फिलीस्तीन ने पहली बार 2011 में पूर्ण संयुक्त राष्ट्र सदस्य के रूप में प्रवेश के लिए अपना अनुरोध प्रस्तुत किया था, जो नाकाम हो गया था, क्योंकि उस वक्त भी फिलीस्तीन को सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से नौ सदस्यों का न्यूनतम समर्थन नहीं मिला।
इसके बाद देश के तौर पर मान्यता हासिल करने के लिए वो संयुक्त राष्ट्र महासभा में गए और दो-तिहाई से ज्यादा बहुमत से नवंबर 2012 में अपना दर्जा संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक से गैर-सदस्य पर्यवेक्षक राज्य तक बढ़ाने में कामयाब रहे।
2 अप्रैल 2024 को फिलीस्तीन ने फिर से संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को एक पत्र भेजा, जिसमें अनुरोध किया गया था, कि संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता के लिए उसके आवेदन पर फिर से विचार किया जाए। यह इज़रायल-हमास युद्ध छिड़ने के लगभग छह महीने बाद हुआ, जब इजराइली हमले में करीब 85 प्रतिशत गाजा तबाह हो चुका है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने लंबे समय से सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर एक साथ रहने वाले दो राज्यों के दृष्टिकोण का समर्थन किया है। फिलीस्तीनी वेस्ट बैंक, पूर्वी येरुशलम और गाजा पट्टी में एक राज्य चाहते हैं, ये सभी क्षेत्र 1967 में इजराइल ने कब्जा कर लिए थे। फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने 18 अप्रैल को अमेरिकी वीटो की निंदा करते हुए इसे "अनुचित, अनैतिक और अन्यायपूर्ण" करार दिया। जबकि, अमेरिका का कहना है, कि जब तक इजराइल और फिलीस्तीन के बीच हर एक विवाद का शांतिपूर्वक समाधान नहीं हो जाता, वो एक राज्य के तौर पर यूएनएससी में फिलीस्तीन का समर्थन नहीं करेगा।












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