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UK के साथ विवाद में 'छोटे भाई' के साथ खुलकर खड़ा हुआ भारत, जानिए बड़े डिप्लोमेटिक फैसले के मायने?

UK-Mauritius Claims: मॉरीशस और यूनाइटेड किंगडम के बीच चल रहे चागोस द्वीप समूह को लेकर विवाद में भारत ने खुलकर मॉरीशस का पक्ष ले लिया है और भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस द्वीप समूह पर मॉरीशस के दावे का समर्थन कर दिया है।

मॉरीशस की यात्रा पर गये भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, कि "मैं आज आपको फिर से आश्वस्त करना चाहता हूं, कि चागोस के मुद्दे पर, भारत मॉरीशस को लगातार अपना समर्थन देना जारी रखेगा, जो कि उपनिवेशवाद को खत्म करने और राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए समर्थन पर आधारित है।"

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इस बयान के साथ, भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार (16 जुलाई) को हिंद महासागर में चागोस द्वीपसमूह पर यूनाइटेड किंगडम के साथ संप्रभुता विवाद में मॉरीशस के लिए भारत के समर्थन की पुष्टि कर दी है।

भारतीय विदेश मंत्री दो दिवसीय दौरे पर मॉरीशस में हैं और पिछले महीने विदेश मंत्रालय का दोबारा कार्यभार संभालने के बाद से यह उनका पहला द्विपक्षीय दौरा है। हालांकि, चागोस द्वीप विवाद वास्तव में किस बारे में है? इसमें ब्रिटेन की क्या भूमिका है? आइये हम इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

चागोस द्वीप समूह के बारे में जानिए

चागोस द्वीप या चागोस द्वीपसमूह, मालदीव से करीब 500 किलोमीटर दक्षिण में हिंद महासागर में 60 से ज्यादा छोटे द्वीपों से मिलकर बने सात एटोल का एक समूह है। चागोस द्वीपसमूह 250,000 वर्ग मील में फैला हुआ है, जो अमेरिका के टेक्सास के आकार का क्षेत्र है और कुल मिलाकर, द्वीपों का भूभाग मैनहट्टन के आकार का है।

अटलांटिक की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली नाविकों ने इन द्वीपों पर संयोग से कब्ज़ा कर लिया था। उन्होंने द्वीपों का नक्शा बनाया और उनमें से कुछ को ऐसे नाम दिए, जो आज भी उनके नाम हैं। इसके बाद डच आए लेकिन वो इस द्वीप समूह पर नहीं रूके।

बाद में, यह फ्रांस के साथ-साथ मॉरीशस और रीयूनियन के कब्जे में आ गया। फ्रांसीसियों ने और भी द्वीपों को अलग अलग नाम दिए। उन्होंने मेडागास्कर और मोजाम्बिक से गुलाम बनाए गए श्रमिकों को आयात किया, और बाद में नारियल के बागानों में काम करने के लिए दक्षिणी भारत से श्रमिकों को लाया। नेपोलियन की हार के बाद, ग्रेट ब्रिटेन ने चागोस और मॉरीशस पर कब्जा कर लिया।

1971 के बाद से, केवल डिएगो गार्सिया के एटोल पर ही लोग रहते हैं और यह अमेरिका के लिए एक सैन्य अड्डे के रूप में काम करता है और इसमें 2,500 अमेरिकी-सैन्य कर्मी और अस्थायी विदेशी कर्मचारी रहते हैं, जिनमें से ज्यादातर फिलीपींस के हैं।

ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच चागोस विवाद क्या है?

मॉरीशस ने दशकों से इस द्वीपसमूह पर संप्रभुता का दावा किया है और हमेशा से यह तर्क दिया है, कि यह कम से कम 18वीं शताब्दी से उसके क्षेत्र का हिस्सा रहा है, जब तक कि यूनाइटेड किंगडम ने 1965 में मॉरीशस से इस द्वीपसमूह को अलग नहीं कर दिया और इस क्षेत्र में सेशेल्स से अल्दाबरा, फ़ार्कुहर और डेसरोचेस के द्वीपों को ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र बनाने के लिए अलग नहीं कर दिया।

जून 1976 में, सेशेल्स को यूनाइटेड किंगडम से स्वतंत्रता मिलने के बाद, अल्दाबरा, फ़ार्कुहर और डेसरोचेस के द्वीपों को ब्रिटेन ने वापस कर दिए।

यह इस समय के दौरान था, जब ब्रिटेन ने हजारों चागोसवासियों को जबरन उनके देश से निकाल दिया और उन्हें 1,600 किमी (1,000 मील) से ज्यादा दूर मॉरीशस और सेशेल्स भेज दिया, जहां उन्हें अत्यधिक गरीबी और भेदभाव का सामना करना पड़ा।

1968 में मॉरीशस को यूके से स्वतंत्रता मिल गई लेकिन यूके ने चागोस द्वीप को मॉरीशस को लौटाने से इनकार कर दिया और उसने यह दावा कर डाला, कि उसका मकसद द्वीप को "रक्षा उद्देश्यों के लिए हिंद महासागर में कुछ द्वीपों का उपयोग करने की संयुक्त राज्य अमेरिका की इच्छा को पूरा करने" के लिए जरूरी है।

द प्रिंट की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि यूके ने मॉरीशस को धमकी दी थी, कि वह उसे स्वतंत्रता नहीं देगा, अगर वो चागोस को लेकर यूके की शर्तों को स्वीकार नहीं करता है। और ऐसा लगता है, कि मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री सीवूसागर रामगुलाम ने इसे स्वीकार कर लिया था, ताकि देश को आजादी मिल सके।

लेकिन 1980 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री के रूप में रामगुलाम ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस द्वीप पर फिर से मॉरीशस का दावा कर दिया।

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सालों से चल रहा विवाद

दोनों देशों के बीच का ये विवाद दशकों से चल रहा है। हालांकि, 2015 में मॉरीशस ने नीदरलैंड के हेग में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय में यूनाइटेड किंगडम के खिलाफ इन मामलों में कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी।

2015 के मामले में, स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने यूके के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए कहा, कि लंदन ने "मॉरीशस के अधिकारों को उचित सम्मान देने में नाकाम रहा" और उसने घोषित किया, कि यूके ने (समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन) के तहत अपने दायित्वों का उल्लंघन किया है।" फैसले में 2010 में चागोस द्वीप समूह के आसपास के पानी में जानबूझकर समुद्री संरक्षित क्षेत्र बनाने के लिए भी यूके को दोषी ठहराया।

हालांकि, कोर्ट में मुकदमा जीतने के बाद भी मॉरीशस की सरकारों ने यूके की सरकारों के साथ डिप्लोमेटिक स्तर पर बातचीत जारी रखी और इसके साथ-साथ ही कानूनी रास्ते भी अपनाए। 2019 में, यह मामला यू.एन. के सर्वोच्च न्यायालय - अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में पहुंचा। जिसमें मॉरीशसन ने तर्क दिया था, कि यूके ने जबरदस्ती उससे द्वीप पर दावा छोड़ने के लिए मजबूर किया था और चूंकी वो एक उपनिवेश था, इसलिए वो कुछ नहीं कर सकता था। मॉरीशस ने कहा, कि यूके का ये कदम 1960 में पारित यू.एन. प्रस्ताव 1514 का उल्लंघन था।

इसके बाद ICJ ने मॉरीशस के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसमें यूके को चागोस द्वीपों को "जितनी जल्दी हो सके" मॉरीशस को वापस करने का आदेश दिया।

लेकिन यूनाइटेड किंगडम के विदेश कार्यालय ने कहा, कि ICJ का फैसला "एक सलाहकार राय थी, कोई फैसला नहीं और दावा किया, कि "ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र में रक्षा सुविधाएं ब्रिटेन और दुनिया भर में लोगों को आतंकवादी खतरों, संगठित अपराध और समुद्री डकैती से बचाने में मदद करती हैं।" नवंबर 2019 में, जब ब्रिटेन चागोस को सौंपने की छह महीने की समय सीमा से चूक गया, तो मॉरीशस के प्रधान मंत्री प्रविंद जगन्नाथ ने कहा, कि ब्रिटेन अब एक अवैध औपनिवेशिक कब्जाधारी है।

उन्होंने इसके बाद कहा, कि यूके और यूएस दूसरे देशों को "मानवाधिकारों का सम्मान करने के लिए उपदेश देते हैं, लेकिन वे दोहरी बातें करने के चैंपियन हैं।"

उन्होंने कहा था, कि "वे (UK-UK) पाखंडी हैं। जब वे मानवाधिकारों और सम्मान के बारे में बात करते हैं, तो उन्हें शर्म आनी चाहिए।"

उसी वर्ष, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी ब्रिटेन के चागोस द्वीप समूह पर कब्जे की निंदा करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। जबकि यूएस, हंगरी, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया और मालदीव ने मतदान में यूके का समर्थन किया और फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, पुर्तगाल, पोलैंड और रोमानिया सहित 56 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया। वहीं, ऑस्ट्रिया, ग्रीस, आयरलैंड, स्पेन, स्वीडन और स्विट्जरलैंड सहित अन्य यूरोपीय सहयोगियों ने यूके को संप्रभुता त्यागने के लिए मतदान किया।

अपने कब्जे का समर्थन करता रहा है यूके

ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह पर अपने कब्जे का लगातार बचाव किया है, और तर्क दिया है, कि "मॉरीशस ने कभी भी द्वीपसमूह पर संप्रभुता नहीं रखी है और हम उसके दावे को मान्यता नहीं देते हैं।"

इस साल जनवरी में ही ब्रिटेन के विदेश सचिव डेविड कैमरन ने चागोस द्वीप समूह के पूर्व निवासियों के पुनर्वास की संभावना को खारिज कर दिया। उन्होंने सुझाव दिया, कि 1960 और 1970 के दशक में ब्रिटिश सरकार द्वारा जबरन विस्थापित किए गए चागोसवासियों के लिए अब द्वीपों पर वापस लौटना "संभव नहीं" है। लिहाजा अब यह देखना बाकी है, कि कीर स्टारमर के नेतृत्व वाली नव-निर्वाचित लेबर पार्टी इन द्वीपों पर अपना रुख बदलती है या नहीं!

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