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पापुआ न्यू गिनी कहां है, जहां पहली बार होगा किसी भारतीय PM का दौरा.. इस देश से भारत को क्यों हैं इतनी उम्मीदें

प्रशांत क्षेत्र को लेकर भारत हमेशा से उदासीन रहा है। पूर्व प्रधानंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 में पहली बार प्रशांत क्षेत्र स्थिति फिजी देश का दौरा किया था और उसके बाद 2014 में पीएम मोदी फिर से फिजी गये थे।

PM Modi Papua New Guinea Visit

PM Modi Papua New Guinea Visit: साल 1981 में किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने पहली बार किसी प्रशांत द्वीप देश का दौरा किया था, जब इंदिरा गांधी फिजी की यात्रा पर गईं थीं।

और इंदिरा गांधी की उस ऐतिहासिक यात्रा के 33 सालों के बाद पीएम मोदी ने फिर से साल 2014 में फिजी का दौरा किया था, और दोनों यात्राओं के बीच हुई की 33 सालों का फासला बताता है, कि प्रशांत देशों के साथ रिश्ते बनाने में किस तरह से भारत उदासीन रहा है।

लेकिन, अब भारत ने नये सिरे से प्रशांत देशों के साथ मिलने की पहल शुरू की है और प्रधानमंत्री मोदी ने 22 मई को पापुआ न्यू गिनी की यात्रा पर जाएंगे, जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली पापुआ न्यू गिनी की यात्रा होगी।

लिहाजा माना जा रहा है, पीएम मोदी की इस यात्रा के साथ भारत ने पापुआ न्यू गिनी और प्रशांत महासागर क्षेत्र में भारत ने रणनीतिक धक्का देना शुरू किया है।

PM Modi Papua New Guinea Visit

भारत का ध्यान प्रशांत क्षेत्र पर क्यों गया है?

किसी भारतीय प्रधान मंत्री की पहली बार इस प्रशांत द्वीप देश का दौरा, बीजिंग के साथ नई दिल्ली की शत्रुता के कारण हुई है। चीन से बढ़ती दुश्मनी ने भारत को, भारत-प्रशांत क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ ज्यादा नजदीक होकर काम करने के लिए प्रेरित किया है।

22 मई को, पीएम मोदी और पापुआ न्यू गिनी के प्रधान मंत्री जेम्स मारपे, भारत-प्रशांत द्वीप समूह सहयोग, भारत और 14 प्रशांत द्वीप देशों के समूह के फोरम के तीसरे शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेंगे।

ये शिखर सम्मेलन पिछली बार मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान 2015 में आयोजित किया गया था और अब उसठे आठ सालों के बाद प्रशांत द्वीप देशों में अपनी उपस्थिति स्थापित करने के लिए नई दिल्ली नये सिरे से जोर दे रहा है।

भारत ने 2014 में प्रशांत क्षेत्र में अपनी पहुंच का विस्तार करना शुरू किया था, लेकिन ये रफ्तार काफी धीमी रही थी।

वीओए की एक रिपोर्ट में भारत के रिटायर्ड नौसेना प्रमुख अरुण प्रकाश ने कहा, कि "यदि आप नौसैनिक आधार या एक दोस्ताना बंदरगाह या दोस्ताना हवाई पट्टी बनाना चाहते हैं, तो वे स्थान बहुत रणनीतिक हैं और उनके पास विशाल महासागर संसाधन भी हैं।"

उन्होंने कहा, कि "पश्चिमी देशों और भारत के लिए मुख्य चिंता यह है, कि इनमें से कई देश खाली हैं, और चीन ऐसे खाली देशों को भरने के लिए काफी तेजी से कोशिश कर रहा है।"

कौन-कौन देश शिखर सम्मेलन में होंगे?

पोर्ट मोरेस्बी शिखर सम्मेलन में भाग लेने वाले 14 देशों में फिजी, पापुआ न्यू गिनी और सोलोमन द्वीप जैसे बड़े द्वीपों से लेकर टोंगा और तुवालु जैसे छोटे द्वीप भी शामिल हैं। वहीं, अन्य देशों में किरिबाती, समोआ, वानुअतु, नीयू, माइक्रोनेशिया, मार्शल आइलैंड्स, कुक आइलैंड्स, पलाऊ और नाउरू हैं।

पापुआ न्यू गिनी भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। करीब 95 लाख की आबादी वाला ये देश, प्रशांत द्वीप देशों में सबसे बड़ा है और उन कुछ देशों में से एक है, जिनके साथ भारत के पुराने व्यापारिक संबंध रहे हैं। इस देश में करीब 3 हजार भारतीय समुदाय के लोग भी रहते हैं।

मोदी और मारापे सोमवार को मिलेंगे और दोनों पक्षों की तरफ से कई समझौतों पर हस्ताक्षर करने की उम्मीद है, जिसमें वीजा जारी करने और एमएसएमई समझौते भी शामिल होंगे।

वीओए की एक रिपोर्ट में नई दिल्ली में सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी के एक सहयोगी साथी स्वाति प्रभु ने बताया, कि "पापुआ न्यू गिनी का कई अहम चुनौतियों का सामना करता है, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन और अनुकूलन है। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जहां भारत सौर ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सस्ती साझेदारी की पेशकश करके एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।"

इसके साथ ही पापुआ न्यू गिनी के पास प्राकृतिक गैस और खनिज हैं, लिहाजा वो इन उत्पादों के जरिए भी अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर बना सकता है।

PM Modi Papua New Guinea Visit

प्रशांत क्षेत्र में चीन का खतरा

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साल 2018 में पापुआ न्यू गिनी का दौरा किया था, लिहाजा इस क्षेत्र में चीन के आर्थिक और सैन्य प्रभाव बढ़ने की संभावना है।

वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को भी 22 मई को पापुआ न्यू गिनी का दौरा करना था, लेकिन वाशिंगटन में कर्ज सीमा वार्ता विवाद की वजह से बाइडेन को अपना दौरा रद्द करना पड़ा।

वहीं, चीन ने अपनी बेल्ट एंड रोड पहल के साथ प्रशांत द्वीप देशों में पैठ बनाना शुरू कर दिया है। पिछले साल बीजिंग ने सोलोमन द्वीप समूह के साथ एक सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किया था और मार्च में उसने सोलोमन द्वीप समूह क राजधानी होनियारा में बंदरगाह के पुनर्विकास के लिए भी करार किया है।

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    लिहाजा, चीन को काउंटर करने की भी जरूरत है। हालांकि, कुछ लोग प्रशांत द्वीप देशों तक भारत की पहुंच को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में देखे जाने की अपनी महत्वाकांक्षाओं के हिस्से के रूप में देखते हैं।

    लेकिन, विश्लेषकों का कहना है, कि प्रशांत द्वीप देशों में प्रभाव बनाने की भारत की कोशिश एक महत्वाकांक्षी शुरुआत है, जिसकी इसकी अपनी सीमाएं हैं। क्योंकि भारत, चीन के संसाधनों से मेल नहीं कर सकता है और नई दिल्ली का प्राथमिक ध्यान दक्षिण एशिया और हिंद महासागर में अपने तत्काल पड़ोस पर ही रखना होगा।

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