उम्र बदला, नाम बदला, फिर बदला देश, जानिए भारत की पहली रोहिंग्या ग्रेजुएट युवती तस्मिदा के संघर्ष की दास्तान
तस्मिदा ने बताया कि म्यांमार में रोहिंग्या लोगों को सरकारी कार्यालयों में नौकरी नहीं दी जाती है। यहां तक की मतदान से भी वंचित रखा जाता है। उसने कहा, म्यांमार के लोगों के लिए रोहिंग्या का अस्तित्व ही नहीं होना चाहिए।

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भारत की पहली रोहिंग्या ग्रेजुएट युवती तस्मिदा जौहर अपनी उपलब्धियों को लेकर जितनी प्रसन्न हैं उतनी ही उन्हें इसके बारे में सोच कर दुख होता है। वह कहती हैं कि इस सफलता को हासिल करने वाली वह पहली युवती हैं जबकि कई ऐसी युवतियां थीं जिन्हें ये उपलब्धि पहले ही हासिल कर हो जानी चाहिए थी, लेकिन उन्हें यह अवसर नहीं मिल पाया। तस्मिदा ने डीयू (DU) से राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन की पढ़ाई की है। वह दिसंबर 2022 में भारत की पहली रोहिंग्या ग्रेजुएट महिला बनीं।
अलजजीरा से बात करते हुए तस्मिदा ने कहा कि वह वास्तव में 24 साल की हैं, लेकिन UNHCR कार्ड के हिसाब से उनकी उम्र 26 साल है। रोहिंग्या माता-पिता आमतौर लड़की की उम्र को दो साल बढ़ा देते हैं, ताकि उनकी जल्दी शादी हो सके। तस्मिदा ने कहा कि उन्हें जीवन में दो बार विस्थापन का सामना करना पड़ा है। तस्मीन फातिमा के रूप में म्यांमार में जन्मी, उसके माता-पिता को जल्द ही उसका नाम बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा। अपने नाम को लेकर उन्होंने बताया कि उनका असली नाम तस्मीन फातिमा है, लेकिन म्यांमार में उसका नाम बदलना मजबूरी थी क्योंकि मुस्लिम नाम रखने पर वहां किसी स्कूल में दाखिला नहीं मिलता था। यदि किसी किसी को शिक्षा हासिल करना हो तो उसके लिए एक बौद्ध नाम रखना अनिवार्य होता है।
तस्मिदा ने कहा कि यदि आप मुस्लिम हैं और भले ही आपका नाम बौद्ध जैसा हो लेकिन स्कूलों में प्रथम स्थान प्राप्त करने के बाद भी आपको पुरस्कार नहीं दिया जाएगा। वहां पहले स्थान पर किसी बौद्ध बच्चे को रखा जाता था इसके बाद ही बाकियों का नंबर आता था। स्कूलों में होने वाले भेदभाव के बारे में तस्मिदा ने कहा कि मुस्लिम लोगों को वहां जोर से बोलने की इजाजत नहीं थी, गैर बौद्ध बच्चों को हमेशा क्लास में सबसे पीछे बैठना पड़ता था। हमें स्कूलों में स्कार्फ (हिजाब) पहनने की मनाही थी। तस्मीदा ने बताया कि जैसे-जैसे उत्पीड़न बढ़ता गया, उनके परिवार ने 2005 में म्यांमार छोड़ दिया।
तस्मिदा का परिवार भागकर बांग्लादेश आ गए और यहां कॉक्स बाजार में रहने लगे। यहां उनके पिता ने दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करना शुरू किया, जबकि उनकी मां ने एक स्थानीय कारखाने में काम करना शुरू किया। भले ही तस्मिदा ने म्यांमार में तीसरी कक्षा तक पढ़ाई की थी, लेकिन उन्हें फिर से पहली कक्षा से शुरुआत करनी पड़ी। यहां तस्मिदा ने रोहिंग्या और बर्मी के अलावा बंगाली, उर्दू और अंग्रेजी सीखना शुरू कर दिया। साल 2012 में बांग्लादेश में रोहिंग्या समुदाय को टारगेटेड हिंसा का सामना करना पड़ा। जौहर के पिता को भी कुछ समय के लिए गिरफ्तार किया गया था।
इसके बाद तस्मिदा के पिता ने भारत जाने का फैसला किया। वे भागकर सबसे पहले हरियाणा पहुंचे, लेकिन यहां उन्हें उचित शिक्षा तक पहुंच नहीं मिल पाई। इसके बाद तस्मिदा का परिवार भागकर राजधानी दिल्ली आ गया। यहां आकर रोहिंग्या परिवार दक्षिण-पूर्व दिल्ली के कालिंदी कुंज शिविर में बस गया। जौहर ने कहा कि जब वह भारत आईं तो उनके मन में कई तरह की हिचकिचाहट थी। वह डरी हुई थी क्योंकि वह रोहिंग्या थी। उन्हें हिंदी भी नहीं आती थी। तस्मिदा ने कहा कि भारत में भी उसे कुछ परेशानी हुई मगर वह उनके सामने कुछ भी नहीं था जिसका सामना वह पहले कर चुकी थी।
तस्मिदा ने भारत में अपने समुदाय को होनी वाली चिंताओं से अवगत कराया। भारत में मौजूद रोहिंग्या शरणार्थियों को लगता है कि अगर वे अपनी लड़कियों को पढ़ने के लिए बाहर भेजते हैं, तो क्या होगा अगर सरकार उन्हें उठा लेगी? क्या होगा अगर उनका अपहरण, बलात्कार या बेचा जाता है? तस्मिदा ने कहा कि ऐसा भारत में नहीं होता मगर वे म्यांमार में ऐसा भोग चुके हैं ऐसे में किसी अनिष्ट को लेकर उनका डर बना रहता है। उन्हें हर वक्त अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता होती रहती है। तस्मिदा ने कहा कि अक्सर पड़ोसी उसके माता-पिता से पूछते थे, "आप इसे पढ़ाकर क्या करेंगे? अगर इसे कुछ हो गया तो क्या होगा?"
जौहर ने कहा कि इस तरह की बातें आम हैं, लेकिन जब उनके पड़ोसियों ने उसे अपनी पढ़ाई में सफल होते देखा तो उनका रवैया बदला है। तस्मीदा ने कहा, "उनकी मानसिकता में थोड़ा बदलाव आया है और अचानक उनकी टिप्पणियां बदल गई हैं जैसे कि 'हमें पता था कि वह ऐसा कर सकती है' और 'हमारी बेटी भी आपकी तरह बन जाएगी'। जोहर उन 25 शरणार्थी छात्रों में शामिल हैं जिन्हें यूएनएचसीआर-डुओलिंगो कार्यक्रम द्वारा वंचित और अकादमिक रूप से उज्ज्वल व्यक्तियों को उच्च अध्ययन करने में मदद करने के लिए चुना गया है। वह कनाडा में विल्फ्रेड लॉयर यूनिवर्सिटी से कंफर्मेशन लेटर का इंतजार कर रही हैं। तस्मिदा की इच्छा भविष्य में मानवाधिकार कार्यकर्ता बनने की है।












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