भारत ने तीसरी सीक्रेट परमाणु पनडुब्बी भी समुद्र में उतारी, सैटेलाइट तस्वीरों से उड़ गई होगी ड्रैगन की नींद!
India's 3rd Nuke-Powered Submarine: चीन की आक्रामकता को काउंटर करने के लिए भारत तेजी से अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ा रहा है। और इसी के तहत भारत ने साल 2021 में अपने तीसरे स्वदेशी परमाणु-संचालित आक्रमण पनडुब्बी (SSBN) को लॉन्च की थी।
लेकिन, अब लेटेस्ट सैटेलाइट तस्वीरों में समुद्र के अंदर भारत की ये एक्सटेंडेट पनडुब्बी देखी गई है, जिसका कोडनेम S-4 है, जिससे इस संभावना पर जोर दिया गया है, कि भारत सरकार ने चुपचाप, बिना किसी शोर शराबे के इसे भारतीय नौसेना में शामिल कर लिया है।

यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, विशाखापत्तनम में स्थिति गुप्त जहाज निर्माण केंद्र (SCB) के बाहरी शुष्क डेक पर ली गई सैटेलाइट इमेजरी में एस-4 (तीसरा अरिहंत-श्रेणी एसएसबीएन) को अपने दो पूर्ववर्तियों पनडुब्बियों के साथ दिखाया गया है। इस तस्वीर में पनडुब्बी लॉंच ट्यूब दिखाई दे रही है और ये पनडुब्बी अपने साथ, पिछली पनडुब्बी की तुलना में दोगुनी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलों को ले जाने में सक्षम है।
भारत के S-4 पनडुब्बी में कितनी क्षमता
S-4 पनडुब्बी, 3500 किलोमीटर की रेंज वाली K-4 मिसाइलों को ले जाने में सक्षम है। K-4, पनडुब्बियों से लॉन्च की जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल को कहा जाता है। और S4 पनडुब्बी में K-4 मिसाइलें लगाए जाने की उम्मीद है। भारत को समुद्र में लंबी दूरी की पनडुब्बी से लॉन्च की जाने वाली मिसाइलों की जरूरत रही है, क्योंकि इंडो-पैसिफिक का तनाव अब काफी बढ़ गया है।
फिलहाल, भारत के पास जो INS अरिहंत परमाणु पनडुब्बी है, वो K-15 मिसाइल से लैस है, जिसकी मारक क्षमता सिर्फ 750 किलोमीटर ही है, यानि, इस मिसाइल से भारत, चीन के ज्यादातर रणनीतिक इलाकों को निशाना नहीं बना सकता है। यहां तक की, पाकिस्तान के साथ संघर्ष की स्थिति में भी, भारतीय पनडुब्बियां पाकिस्तान के सिर्फ दक्षिणी हिस्से को ही निशाना बना सकती हैं।
लिहाजा, तीसरे परमाणु पनडुब्बी का भारतीय नौसेना में शामिल होना और K-4 मिसाइलों को ले जाने की उसकी क्षमता ने भारतीय नेवी की ताकत को काफी बढ़ा दिया है।
दरअसल, समुद्र के अंदर किसी न्यूक्लियर डेटरेंस के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है, कि अंडरवाटर वर्टिकल लॉन्च सिस्टम काफी सोफिस्टिकेटड और जटिल हथियारों में से एक है, और इसके लिए दो माध्यमों - पानी और वायुमंडल में स्थिरता, गति और सटीकता होना निहायत ही जरूरी है।
लिहाजा, S-4 पनडुब्बी के भारतीय नौसेना में शामिल होने से भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को जबरदस्त इजाफा हुआ है। भारत के पास अभी भी कम से कम तीन ऑपरेशनल पनडुब्बियों की कमी है, जिसका मतलब है, कि पनडुब्बियां मुख्य रूप से निरंतर परमाणु निरोध बनाए रखे बिना, बंदरगाह के अंदर और बाहर होती हैं। फिलहाल अब तक, भारत के पास दो परमाणु-संचालित बैलिस्टिक पनडुब्बियां (SSBN) हैं, जिन्हें एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल्स (एटीवी) कहा जाता था। इन दोनों में से पहला है S2 (INS अरिहंत) और S3 (INS अरिघाट) हैं।

वहीं, भारत के सबसे बड़े दुश्मन चीन के पास ही एसएसबीएन टेक्नोलॉजी वाली 12 परमाणु पनडुब्बियां है। जिन्हें अतीत में अफ्रीका के पूर्वी तट पर "काउंटर-पाइरेसी गश्ती" के लिए तैनात किया गया था। हालांकि, चीनी पनडुब्बी रोधी युद्ध अभी शुरुआती चरण में है।
भारत के लिए खतरे के आकलन को देखते हुए, SSBN न्यूक्लियर रिस्पॉंस एक्शन न्यूक्लियर एक्शन की गारंटी देते हैं और ये बेहतरीन स्ट्राइक क्षमता के साथ इनके पास काफी लंबे वक्त तक समुद्र के अंदर छिपे रहने की भी क्षमता होती है।
भारतीय सेना के एक अधिकारी के मुताबिक, परमाणु प्रतिरोध के लिए एक पनडुब्बी को हमेशा गश्त पर रहना होगा और अगर अरिहंत ही अकेला बंदरगाह पर आता जाता रहेगा, तो इसका मतलब ये हुआ, कि हमेशा परमाणु प्रतिरोध करने में फेल हो रहे हैं। यूरेशियन टाइम्स से बात करते हुए भारतीय अधिकारी ने कहा, कि "हमें अभी 3-4 SSBN की और जरूरत है, ताकि हम एक को गश्त पर रख सकें, जबकि एक बंदरगाह पर स्टैंट बाय में मौजूद हो और एक गश्त के लिए जा रहा हो, तो एक गश्त खत्म कर वापस लौट रहा हो।"
साल 2021 में, भारत ने चुपचाप S-4 SSBN पनडुब्बी लॉन्च किया था। ब्रिटिश डिफेंस अखबार जेन्स ने 29 दिसंबर 2021 को रिपोर्ट दी थी, कि S4 को 23 नवंबर को लॉन्च किया गया था और इसे 'फिटिंग-आउट घाट' के पास 'ट्रांसफर' कर दिया गया था, जिस पर वर्तमान में दूसरी ऐसी परमाणु-सशस्त्र मिसाइल पनडुब्बी आईएनएस अरिघाट का कब्जा था। भारत का ये पनडुब्बी लॉंच इसलिए सीक्रेट है, क्योंकि अभी तक इसका नाम नहीं रखा गया है और इसे S-4 पनडुब्बी की कहा जाता है।
S-4 पनडुब्बी को लेकर क्या जानकारियां हैं?
ब्रिटिश प्रकाशन जेन्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया है, कि सैटेलाइट इमेजरी ने पुष्टि की है, एस-4 पनडुब्बी की क्षमता 7 हजार टन है और ये INS अरिहंत, जिसकी क्षमता 6 हजार टन है, उससे थोड़ा बड़ा है। INS अरिहंत की लंबाई 111.6 मीटर है, जबकि S-4 की लंबाई 125.4 मीटर मापी गई है।
भारत की पहली स्वदेशी पनडुब्बी, आईएनएस अरिहंत, एक 6,000 टन का जहाज है, जो समृद्ध यूरेनियम से ईंधन वाले 83 मेगावाट दबावयुक्त प्रकाश जल रिएक्टर (पीडब्ल्यूआर) द्वारा संचालित है। यह 11 मीटर चौड़े बीम के साथ 110 मीटर लंबा है और पानी के भीतर 24 समुद्री मील की रफ्तार से यात्रा कर सकता है।
आईएनएस अरिहंत को 2009 में लॉन्च किया गया था और 2016 में इंडियन नेवी में कमीशन किया गया था। नवंबर 2019 में, आईएनएस अरिहंत ने अपना पहला निवारक गश्त पूरा किया था। इसके लॉंच के साथ भारत सरकार ने भारत के "जीवित परमाणु ट्रायड" की स्थापना की घोषणा की थी, जिसका मतलब ये होता है, कि अब भारत के साथ जमीन से, आकाश से और पानी के अंदर से भी किसी देश पर परमाणु बम दागने की क्षमता आ गई है।
आईएनएस अरिहंत को भारतीय स्वदेशीकरण कार्यक्रम के लिए एक उपलब्धि माना जाता है। जब 2017 में एटीवी दुर्घटना का शिकार हुई थी, तब भारत के पास कोई परमाणु ट्रायड नहीं था।
पानी के अंदर भारत की परमाणु पनडुब्बी ताकत समझिए
पानी के अंदर परमाणु युद्ध होने पर दुश्मन के परमाणु हथियार को बीच में ही मार गिराने के लिए आपके पास न्यूक्लियर पनडुब्बी होना जरूरी है। वहीं, वो पनडुब्बी बैलिस्टिक मिसाइल लॉंन्च करने के साथ साथ उसके पास पर्याप्त दूरी तक मार करने कती क्षमता से भी लैस होना जरूरी होता है। वहीं, जबसे पनडुब्बियों से लॉन्च की जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें अस्तित्व में आई हैं, तबसे परमाणु पनडुब्बियों को सबसे विश्वसनीय न्यूक्लियर डेटरेंट हथियार माना जाता है, क्योंकि समुद्र की लड़ाई काफी ज्यादा मुश्किलों से भरी होती है।
जैसे की अमेरिका की पोलारिस पनडुब्बी के बारे में दुनिया को पता था, कि उसे मारा नहीं जा सकता है। लिहाजा, रूस ये जानता था, कि अगर उसने पहला हमला किया, तो पोलारिस पनडुब्बी उसे छोड़ेगा नहीं।
एक विश्वसनीय परमाणु डेटरेंट देश बनाने की भारतीय परियोजना अपनी शुरुआत से ही गोपनीयता में डूबी हुई है। जैसे ही भारत ने रूसी सहायता की मदद से SSBN परमाणु पनडुब्बी चलाने की क्षमता हासिल की, ठीक वैसे ही भारत ने रूस से पनडुब्बी किराए पर ले लिया। वहीं, अब अपनी परमाणु क्षमता को विस्तार देने के लिए भारत ज्यादा रेंज वाले एसएसबीएन और एसएलबीएम हासिल करने की दिशा में काम कर रहा है।
भारत के पास अभी जो दो SSBN पनडुब्बियां INS अरिहंत और INS अरिघाट हैं, वो अपेक्षाकृत कम दूरी तक मार करने वाली L-15 पनडुब्बी-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलों (SLBMs) को ले जाने में ही सक्षम रहे हैं, हालांकि दावा किया गया था, कि वो लंबी दूरी तक मार करने वाली K-4 बैलिस्टिक मिसाइलें ले जाने में भी सक्षम हैं।
लेकिन, K-15 मिसाइल की मारक क्षमता सिर्फ 750 किलोमीटर है, जो बंगाल की खाड़ी से चीन को निशाना बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
2023 में भारत ने 3,500 किमी की मारक क्षमता वाली अपनी परमाणु-सक्षम K-4 पनडुब्बी-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइल का एक ही हफ्ते में दो बार परीक्षण किया था। मिसाइल का परीक्षण आंध्र प्रदेश के तट से दूर एक पनडुब्बी पोंटून के आकार के समुद्र के नीचे के मंच से किया गया था। परीक्षण ने मिसाइल की पानी के नीचे से निकलने और अपने परवलयिक प्रक्षेप पथ पर चलने की क्षमता का प्रदर्शन किया।
एक बार K-4 मिसाइलें पनडुब्बियों में शामिल हो जाने के बाद, इंडियन नेवी भारत को चीन के साथ अंतर को काफी कम कर देगी। चीन के पास फिलहाल 5,000 किलोमीटर से ज्यादा की रेंज वाली एसएलबीएम हैं। K-4 मिसाइलों के साथ साथ भारत 5,000-6,000 किलोमीटर की रेंज में K-5 और K-6 मिसाइलों को भी बनाने के काफी करीब पहुंच चुका है।
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