World’s largest population: दुनिया की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश बना भारत, मुसीबत या मौका?
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, अप्रैल महीने में भारत चीन को छोड़कर सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन गया है। सबसे अच्छी बात ये है, कि भारत की जनसंख्या में युवा कार्यबल पूरी दुनिया के मुकाबले सबसे ज्यादा है।

World's largest population: संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक तौर पर ऐलान कर दिया है, कि चीन को छोड़कर भारत दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन गया है। यूनाइटेड नेशंस के मुताबिक, अब भारत की आबादी 142 करोड़ 86 लाख हो गई है। यानि, चीन के मुकाबले भारत की आबादी करीब 29 लाख ज्यादा हो गई है। लिहाजा, अब दुनिया की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश होने के नाते, अब इस बात पर विचार करना ज्यादा जरूरी हो गया है, कि सबसे ज्यादा आबादी होना, भारत के लिए वरदान है या अभिशाप।
भारत में सरकार, दशकों से सीमित संसाधनों के बीच अपनी जनसंख्या वृद्धि को रोकने के उद्देश्य से परिवार नियोजन कार्यक्रम चला रही है, जिसका सीमित असर देखने को मिला है।
हालांकि, 1990 के दशक में जब भारत उदारीकरण के रास्ते पर आया और भारतीय अर्थव्यवस्था ने उड़ान भरनी शुरू की, तो देश के नीति निर्माताओं ने भी जनसंख्या को लेकर अपने रास्ते को थोड़ा सा बदला।
भारत की विशाल आबादी, जिसमें युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा है, उसे भारत में 'जनसांख्यिकीय लाभांश' बताया गया, यानि बहुत बड़ा फायदा बताया गया, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा साबित होगा।
इसका मतलब ये था, कि भारत में युवाओं का एक विशाल आबादी है, जो उदारीकरण को पंख लगाएगा। एक विशाल श्रमिक वर्ग होगा, जो कारखानों को उड़ान देगा और निश्चित तौर पर, भारत को इसका जबरदस्त फायदा भी मिला।
लेकिन, अब उस वादे की ऐसी परीक्षा होनी है, जैसी पहले कभी नहीं हुई थी। क्योंकि, संयुक्त राष्ट्र ने अब कह दिया है, कि भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन गया है और चीन हमसे पीछे छूट गया है।
सबसे ज्यादा आबादी वाला देश
हालांकि, भारत की जन्म दर हाल के वर्षों में धीमी हो गई है, लेकिन फिर भी दुनिया की किसी भी अर्थव्यवस्था से अगर तुलना की जाए, तो भारत के पास सबसे ज्यादा कामकाजी जनसंख्या है। भारत में अभी 1.1 अरब लोग, यानि कुल आबादी की 75 प्रतिशत जनसंख्या कामकाज से जुड़ा हुआ है और ये एक विशालकाय आंकड़ा है।
इस बीच, चीन बूढ़ा हो रहा है और पिछले 60 सालों में पहली बार ऐसा हुआ है, जब चीन की जनसंख्या घट गई है। चीन, जिसका आर्थिक विकास 1978 के बाद से करीब 10 प्रतिशत प्रति वर्ष की औसत से आसमान छूता चला गया, उसमें अब गिरावट आ गई है और ये गिरावट तेजी से हो रही है।
चीन में जवान खून की कमी हो गई है और चीन का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2022 में सिर्फ 3 प्रतिशत बढ़ा है और चीन ने इस वित्तीय वर्ष में खुद के विकास दर का जो अनुमान लगाया है, वो भी सिर्फ 5 प्रतिशत ही है। यानि, 10 प्रतिशत की रफ्तार से विकास करने वाले चीन का अधिकतम विकास दर 5 प्रतिशत पर गिर गया है।
हालांकि, इसमें निश्चित तौर पर कई और वजहें हैं, जिनमें कोविड-19, अमेरिका और पश्चिमी देशों से बढ़ता जियो पॉलिटिकल तनाव, निवेशकों की संख्या में कमी, आपूर्ति श्रृंखला में ब्रेकडाउन शामिल हैं।
लेकिन, भारत के लिहाज से विचार करें, तो क्या भारत की विशालकाय जनसंख्या और विशालकाय कामकाजी आबादी, भारत को भी अगली बड़ी आर्थिक कहानी लिखने लायक बना सकती है?
चीन जिन आर्थिक संघर्षों में उलझा है, उसका फायदा भारत उठा सकता है? या फिर क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए उसकी विशालकाय जनसंख्या दुखती रग साबित होगी, जो आर्थिक महाशक्ति बनने के सपनों को पटरी से उतार सकती है?
इसे समझने के लिए कई अहम मुद्दों पर विचार करने की जरूरत होगी।
भारत के लिए दोधारी तलवार
भारत की विशालकाय युवा आबादी दोधारी तलवार की तरह है। यानि, युवाओं से लाभ हासिल करने के लिए, उनकी शक्ति का सही इस्तेमाल करने के लिए उनके हाथों में लगातार रोजगार उपलब्ध करवाना सबसे ज्यादा जरूरी बात है।
यानि, सरकार को हर साल करोड़ों लोगों के लिए नौकरी की व्यवस्था करनी होगी। और ये एक ऐसी चुनौती है, जिसमें सरकार को लगातार नाकामयाबी मिली है। लिहाजा, भारत को लगातार निवेश को आकर्षित करने की जरूरत है, और जब तक भारत तेजी से आगे नहीं बढ़ता, इसका जनसांख्यिकीय लाभांश आसानी से एक बेरोजगारी दुःस्वप्न में बदल सकता है।
सबसे बड़ी आबादी: वरदान या अभिशाप?
आजादी के तुरंत बाद, भारत, जिसकी उस समय इसकी आबादी लगभग 35 करोड़ के आसपास थी, उसने 1952 में दुनिया का पहला राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम अपनाया था। उस समय परिवारों को दो बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया था।
लेकिन 1960 के दशक तक, पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के तहत भारत सरकार ने जन्म दर को नियंत्रित करने के लिए और अधिक आक्रामक, यहां तक कि दमनकारी उपायों को भी लागू किया। उस वक्त प्रति महिला 6 बच्चे पैदा हो रहे थे।
उस समय देश की आर्थिक वृद्धि काफी धीमी थी। 1950 के दशक से लेकर 1990 के दशक की शुरुआत तक यह औसतन 4 प्रतिशत थी। अलजजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई स्थित डेटा रिसर्च फर्म सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी महेश व्यास ने कहा, कि भारत में बढ़ती आबादी को हमेशा से एक समस्या के रूप में देखा गया है।
उन्होंने कहा, कि "भारत के स्वास्थ्य और परिवार नियोजन मंत्री एस चंद्रशेखर ने 1967 में कहा था, कि "समग्र आर्थिक विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा जनसंख्या वृद्धि की खतरनाक दर है।" विश्व बैंक ने नसबंदी कार्यक्रमों के लिए भारत को 66 मिलियन डॉलर का ऋण दिया था, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका ने जनसंख्या नियंत्रण पहल में देश की सफलता के लिए भारत की गरीब आबादी को अपनी खाद्य सहायता कार्यक्रम से जोड़ा था।
1970 के दशक में, भारत में लाखों पुरुषों की जबरन नसबंदी की गई, जिनमें से हजारों की मौत गलत सर्जरी की वजह से हो गई।
फिर, 1980 और 1990 के दशक में, भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को निजी क्षेत्र के लिए खोलना शुरू किया। देश की विकास दर 1990 के दशक के दौरान पहली बार 5.5 प्रतिशत और फिर 2000 के दशक के अंत से औसतन 7 प्रतिशत से ज्यादा हो गई।
और ऐसा पहली बार हुआ, जब देश के नीति निर्माताओं ने युवा आबादी को एक मौके के तौर पर देखना शुरू किया। भारत की कामकाजी आबादी (15 से 64 साल) को आर्थिक विकास के इंजन के तौर पर देखा जाने लगा। कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि ज्यादातर बार अगर भारत आर्थिक संकटों से बच जाता है, तो उसकी सबसे बड़ी वजह भारत की जनसंख्या है।
भारत की आबादी में खपत इतनी ज्यादा है, कि भारत आर्थिक संकटों की भरपाई काफी आसानी से कर लेता है और सप्लाई चेन इंजन चालू रहता है।
महेश व्यास के मुताबिक, "1990 के दशक में, भारत, लोगों को खेतों से निकालकर कारखानों तक ले जाने में काफी कामयाब रहा।" उन्होंने कहा, कि "यह एक सांस्कृतिक परिवर्तन था, जो नीतिगत हस्तक्षेपों के कारण हुआ और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों से इसमें मदद मिली।"
लेकिन, फिर भी उस युवा कार्यबल को अच्छी तरह से कमाने और बचाने के लिए, उसे आधुनिक अर्थव्यवस्था की सेवा के लिए पर्याप्त भुगतान वाली नौकरियों की आवश्यकता है। यह तेजी से भारत के लिए संघर्ष साबित हो रहा है।
बेरोजगारी दर बहुत बड़ी चुनौती
यकीनन, कार्यबल किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए इंजन है, लेकिन ये बहुत बड़ी चुनौती भी साबित हो सकती है।
अलजजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत का आधिकारिक बेरोजगारी स्तर 2017-18 में 45 साल के उच्च स्तर 6.1 प्रतिशत पर पहुंच गया, जो 2011-12 के पिछले अनुमान से 2.7 प्रतिशत ज्यादा था। सरकार के वार्षिक नौकरियों के आंकड़ों से पता चलता है, कि 2021-22 में बेरोजगारी का स्तर सुधर कर 4.1 प्रतिशत हो गया है।
लेकिन कुछ अन्य आंकड़े बताते हैं, कि भारत में बेरोजगारों की संख्या सरकारी आंकड़ों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। सीएमआईई के अनुसार, मार्च में भारत की बेरोजगारी दर 7.8 प्रतिशत थी, और शहरी भारत में इससे भी अधिक (8.5 प्रतिशत) थी, जहां बेहतर भुगतान वाली गैर-कृषि नौकरियां मिलती हैं।
आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक, भारत में हर साल करीब 50 लाख लोग लेबर फोर्स मार्केट में शामिल होते हैं। जबकि, भारत सरकार की खुद चयनित क्षेत्रों के लिए सरकार की अपनी उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना से, पांच सालों में करीब 50 से 60 लाख नई नौकरियां आने की उम्मीद है। जाहिर है, ये काफी कम नौकरियों का सृजन है।
नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हिमांशु ने कहा,कि "पिछले दो दशकों में बेरोजगारी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रही है और इसमें सुधार के संकेत नहीं दिख रहे हैं।"
चीन के खिलाफ माहौल, फायदा उठा पाएगा भारत?
नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस में विजिटिंग प्रोफेसर राधिका कपूर ने कहा, कि चूंकि कंपनियां चीन से बाहर अपने कारोबार और निवेश में विविधता लाने पर विचार कर रही हैं, इसलिए भारत लाभ लेने के लिए अच्छी स्थिति में है।
चीन इतनी तेजी से बूढ़ा हो रहा है, कि 60 साल से ज्यादा आयु की आबादी का हिस्सा वर्तमान में 2035 तक 20 प्रतिशत से बढ़कर 30 प्रतिशत हो जाएगा।
वहीं, वियतनाम, जो हाल के वर्षों में एक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरा है, वह भी तेजी से बूढ़ा हो रहा है। वहीं, फिलीपींस, जिसे चीन के विनिर्माण पाई के एक संभावित दावेदार के रूप में देखा जाता है, वहां प्रतिशत के हिसाब से भारत से थोड़ा ज्यादा युवा कार्यबल है, लेकिन कुल आबादी के हिसाब से काफी कम।
लिहाजा, एक बड़ी कामकाजी उम्र की आबादी न केवल श्रम बाजार के नजरिए से भारत को आकर्षक बनाती है, बल्कि खपत के लिहाज से भी भारत एक विशालकाय बाजार है।
लेकिन, इसके लिए भारत को कुशल कार्यबल का निर्माण करना होगा। कई सालों से भारत में कुशल कार्यबल को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं, लिहाजा सरकार को मानव पूंजी में काफी निवेश करनी होगी, ताकि कुशल लेबर फोर्स का निर्माण हो सके और अर्थशास्त्रियों ने चेताया है, कि यह विफलता जल्द ही भारत को परेशान कर सकती है।
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