भारत में क्यों कहर बरपा रही है कोरोना वायरस की दूसरी लहर, कहीं ये 5 चूक तो जिम्मेदार नहीं?

मजबूत शासन देने का वादा करने वाली सरकारों के रहते हुए हेल्थ सिस्टम इस कदर ध्वस्त हुआ है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ऐसे में जानने की कोशिश करते हैं वो 5 बड़ी गलतियां, जिनकी वजह से भारत की स्थिति खराब हुई।

नई दिल्ली, मई 12: कोरोना वायरस के दूसरे लहर ने भारत को परेशान कर रखा है और हर दिन सैकड़ों लोग इस वायरस की चपेट में आकर अपनी जान से हाथ धो रहे हैं। ऐसे में दुनियाभर में भारत सरकार की किरकिरी हो रही है। दुनिया के 40 से ज्यादा देश भारत की मदद जरूर कर रहे हैं लेकिन भारत का मेडिकल सिस्टम पूरी तरह से चरमराया हुआ है। तुर्रा ये कि अभी भी सरकारें अपनी पीठ थपथपाने से बाज नहीं आ रही हैं। सांस की एक एक कतरे के लोग लोग छपछटा रहे हैं और ऑक्सीजन के एक एक सिलेंडर की व्यवस्था करना ऐसा है मानो आदमी जंग पर निकला हो। मजबूत शासन देने का वादा करने वाली सरकारों के रहते हुए मैनेजमेंट सिस्टम इस कदर ध्वस्त हुआ है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ऐसे में जानने की कोशिश करते हैं वो 5 बड़ी गलतियां, जिनकी वजह से भारत की स्थिति विकराल हुई है।

एक्सपर्ट्स की चेतावनी दरकिनार

एक्सपर्ट्स की चेतावनी दरकिनार

भारत में कोरोना वायरस के बेकाबू होने की बड़ी वजहों में से एक वजह थी एक्सपर्ट्स की चेतावनी को नहीं मानना। जबकि जिन देशों ने भी कोरोना वायरस संक्रमण पर काबू पाया है, उन्होंने मेडिकल एक्सपर्ट्स की सलाह को ही माना है। अमेरिका ने डॉ. एंथनी फाउची के नेतृत्व में कोरोना संक्रमण की रफ्तार को काबू में किया है। जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो उन्होंने मेडिकल सलाहों को मानने से इनकार कर दिया था और यही गलती इस बार भारत ने की है। कोरोना वायरस की पहली लहर को लेकर जो नरेन्द्र मोदी की सरकार काफी ज्यादा एक्टिव थी वही सरकार इस बार पूरी तरह से बेपरवाह नजर आई। भारत सरकार ने कोरोना वायरस म्यूटेशन पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। जबकि दुनिया के अलग अलग देशों में वायरस के अलग अलग वेरिएंट को पहचानने की कोशिश की जा रही थी। 21 दिसंबर को जब ब्रिटेन ने वायरस का अलग वेरिएंट पाया उसके बाद भारत में भी वेरिएंट पर काम करने के लिए केन्द्र सरकार की तरफ से फंड जारी किया गया। जबकि भारत में कोरोना वायरस का नया वेरिएंट अक्टूबर में ही मिल गया था। वहीं, भारत की स्थिति पर केन्द्र सरकार के द्वारा बनाई गई कमेटी ने दो बार भारत सरकार के सामने अलर्ट जारी किया लेकिन सरकार ने दोनों अलर्ट पर ध्यान नहीं दिया और उन अलर्ट्स का नहीं मानने का नतीजा हमारे सामने हैं।

बी.1.617 वेरिएंट को लेकर भारी लापरवाही

बी.1.617 वेरिएंट को लेकर भारी लापरवाही

बी.1.617 स्ट्रेन भारत में काफी पहले मिल गया था लेकिन भारत में कोरोना वायरस के इस स्ट्रेन को लेकर स्टडी नहीं की गई और इसके लिए भारत ने ब्रिटेन से भी सबक नहीं सिखा। ब्रिटेन में भी कोरोना वायरस का नया स्ट्रेन मिला था और स्ट्रेन के मिलते ही ब्रिटिश सरकार ने 32 मिलियन पाउंड यानि 329 करोड़ रुपये इस नये स्ट्रेन पर रिसर्च के लिए दे दिए थे लेकिन भारत में इस वेरिएंय पर रिसर्च करने के लिए दिसंबर के आखिरी हफ्ते में फंड दिया गया। लिहाजा कोरोना वायरस का भारतीय वेरिएंट कितना खतरनाक है, कितनी तेजी से ये फैलता है, शरीर के किस हिस्से पर सबसे ज्यादा असर करता है और इसे फैलने से कैसे रोका जाए, इसको लेकर अभी तक पूरी रिसर्च नहीं हो पाई है। मेडिकल साइंस अपने हिसाब से काम करती है और आप किसी वैज्ञानिक को टाइमलाइन नहीं दे सकते हैं। जब अक्टूबर में भारतीय वेरिएंट की पुष्टि हो चुकी थी तो फिर सरकार अक्टूबर महीने में ही क्यों नहीं जागी? कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि बी.1.617 वेरिएंट पिछले लहर की तुलना में काफी तेजी से संक्रमित करता है और उसी लापरवाही का अंजाम अभी भारत भुगत रहा है।

मेडिकल व्यवस्था पर ध्यान नहीं

मेडिकल व्यवस्था पर ध्यान नहीं

भारत सरकार ने पिछले साल 2 हजार करोड़ रुपये की लागत से 60 हजार वेंटिलेटर्स खरीदा था लेकिन उनमें से सिर्फ 17 हजार वेंटिलेटर्स की ही सप्लाई अस्पतालों को की गई। इंडिया टूडे की रिपोर्ट के मुताबिक जिन अस्पतालों को वेंटिलेटर्स मिले थे उन्होंने अस्पताल में वेंटिलेटर्स लगाए ही नहीं। वहीं, ज्यादातर अस्पताल स्टाफ की कमी से बुरी तरह जूझ रहे थे लेकिन अस्पतालों में वक्त रहते स्टाफ बढ़ाने की कोशिश नहीं की गई। ना तो राज्य सरकारों ने इस तरफ ध्यान दिया और ना ही केन्द्र सरकार ने। और इस वक्त स्थिति ये है कि भारत में अस्पतालों के पास ना वेंटिलेटर्स हैं, ना ऑक्सीजन की व्यवस्था, ना आईसीयू खाली हैं और ना ही जीवन रक्षक दवाएं ही अस्पतालों के पास हैं। वहीं, भारत में डॉक्टरों की भारी कमी है। नारायणा हेल्थ के एग्जक्यूटिव डायरेक्टर और चेयरमैन डॉ. देवी प्रसाद सेट्टी कहते हैं कि मरीजों का इलाज डॉक्टर करते हैं, बेड नहीं और अस्पतालों के पास डॉक्टर नहीं हैं। भारत के अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्स, मेडिकल सपोर्ट स्टाफ, टेक्निशियन की भारी कमी है। डब्ल्चूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 10 हजार लोगों पर सिर्फ 37.6 मेडिकल स्टाफ हैं।

भारत में डॉक्टरों की भारी कमी

भारत में डॉक्टरों की भारी कमी

भारत में 562 मेडिकल कॉलेज हैं, विश्व में सबसे ज्यादा और विश्व में डॉक्टरों की संख्या के मामले में भारत का स्थान दूसरा है लेकिन जब बात आती है जनसंख्या के हिसाब से डॉक्टरों के होने की तो आप खुद देखिए भारत की क्या स्थिति है। भारत में हर 10 हजार लोगों पर सिर्फ 9 डॉक्टर हैं जबकि जर्मनी में हर 10 हजार लोगों पर 42 डॉक्टर हैं। ब्रिटेन में 28 और अमेरिका में हर 10 हजार लोगों पर 26 डॉक्टर हैं। वहीं अगर चीन से तुलना करें तो चीन की आबादी एक अरब 40 करोड़ है और चीन में 36 लाख डॉक्टर हैं भारत के मुकाबले तीन गुना ज्यादा। केन्द्र सरकार ने 2014 में करीब 25 हजार करोड़ की लागत से भारत में 157 मेडिकल कॉलेज खोलने का प्लान बनाया था, जिनमें से हर साल 15 हजार 700 डॉक्टर हर साल निकलते। लेकिन, इतने बड़े प्रोजेक्ट को बनने में समय लगता है और लग भी रहा है। अभी तक 157 नये मेडिकल कॉलेज में 46 मेडिकल कॉलेजें में पढ़ाई शुरू हो चुकी है और बाकी मेडिकल कॉलेज को बनाने का काम चल रहा है। वहीं मोदी सरकार ने 22 एम्स बनाने की घोषणा की थी जिनमें से 6 एम्स अब काम कर रहे हैं।

विदेशों की स्थिति से सबक नहीं

विदेशों की स्थिति से सबक नहीं

भारत में कोरोना वायरस से दूसरे लहर ने अप्रैल महीने के दूसरे हफ्ते से स्थिति खराब करनी शुरू की लेकिन विश्व के कई देश उससे पहले से ही कोरोना के दूसरे लहर से काफी ज्यादा जूझ रहे थे। बावजूद इसके भारत में पहले से तैयारी नहीं की गई। जनवरी महीने में ब्राजील से रिपोर्ट आ रही थी कि वहां कोरोनों वायरस का दूसरा लहर काफी ज्यादा खतरनाक स्थर पर लोगों की जान ले रहा है और ब्राजील से ये भी रिपोर्ट आ रही थी कि इस बार ये वायरस जवान लोगों की जिंदगी ज्यादा छीन रहा है लेकिन हमारे यहां तैयारियां नहीं की गई। ब्राजील, इंग्लैंड और इटली में ऑक्सीजन की किल्लत हो रही थी और अगर उस वक्त अगर उन देशों को देखते हुए हमारे यहां इमरजेंसी हालातों के लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था करके रखी गई होती तो शायद हजारों मरीजों की जान बचाई जा सकती थी।

वैक्सीनेशन पर झूठ और लापरवाही

वैक्सीनेशन पर झूठ और लापरवाही

भारत में टीकाकरण अभियान काफी तेजी के साथ शुरू किया गया था लेकिन भारत की विपक्षी पार्टियों को लगा कि सरकार वैक्सीन पर पूरा क्रेडिट ले लेगी, लिहाजा भारत में वैक्सीन पर लोगों को डराने का काम शुरू हो गया। भारत के कई बड़े नेताओं ने वैक्सीन को लेकर बिना किसी जानकारी के झूठ बोला। भारत की स्वदेशी वैक्सीन को बीजेपी का वैक्सीन बताया गया जबकि भारत में बनी स्वदेशी वैक्सीन को-वैक्सीन कोरोना वायरस से जिंदगी बचाने के लिए काफी ज्यादा कारगर है। भारत सरकार ने पहले चरण में 60 साल की उम्र से ज्यादा लोगों को वैक्सीन लगाने का लक्ष्य रखा लेकिन डर की वजह से लोग वैक्सीन लेने अस्पताल नहीं पहुंच रहे थे। भारत के अलग अलग राज्यों में वैक्सीन की 42 लाख से ज्यादा खुराक बर्बाद हो गई। भारत सरकार ने भी वैक्सीन डिप्लोमेसी पर ज्यादा ध्यान दिया और भारतीय विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने दुनिया के 80 से ज्यादा देशों को साढ़े 6 करोड़ वैक्सीन की खुराक दी। यानि, देश के कुछ नेताओं का झूठ लोगों की जान लेने की पर्याप्त वजह बन गया। वहीं, अमेरिका, इजरायल, यूरोप जैसे देशों ने व्यापक पैमाने पर वैक्सीनेशन कार्यक्रम चलाया और उसी का नतीजा है कि अमेरिका और इजरायल अब कोरोना से मुक्त हो रहे हैं जबकि करीब 10 महीने के बाद इंग्लैंड में कोरोना वायरस से एक भी मौत नहीं हुई है। वहीं, भारत में अब जब लोग वैक्सीन लेने की कोशिश कर रहे हैं तो अब भारत के पास वैक्सीन का काफी ज्यादा अभाव है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+