'हिंद महासागर देशों की भलाई के लिए भारत प्रतिबद्ध', बोले विदेश मंत्री एस जयशंकर
ढाका में छठे हिंद महासागर सम्मेलन को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने हिंद महासागर के सभी देशों की भलाई और प्रगति के लिए भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में शुक्रवार को विदेश मंत्री एस यशंकर छठे हिंद महासागर सम्मेलन में शामिल हुए। सम्मेलन में उन्होंने कहा कि भारत का यह मानना है कि इंडो-पैसिफिक एक बड़े बदलाव और सामूहिक लाभ की दृष्टि से है। उन्होंने भारत की हिंद महासागर देशों की भलाई की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि हिंद महासागर रिम एसोसिएशन या हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी जैसे समर्पित निकाय बेहद अहम हैं।
ढाका में छठे हिंद महासागर सम्मेलन को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने अपने इंडो-पैसिफिक के दृष्टिकोण बनाए रखने की अपील की। इसके लिए स्पष्ट सोच के साथ कई देशों के इस संगठन में शामिल होने के लिए बांग्लादेश की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि इंडो-पैसिफिक वैश्वीकरण की एक वास्तविक छवि है।
जयशंकर ने कहा, "हिंद महासागर के सभी देशों की भलाई और प्रगति के लिए भारत की प्रतिबद्धता है। हमारे पास हिंद महासागर रिम एसोसिएशन या हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी जैसे समर्पित निकाय हैं जिनकी अपनी लोकप्रियता है।" उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी, सागर आउटलुक और विस्तारित पड़ोस के लिए हमारे दृष्टिकोण के माध्यम से उस विश्वास पर विस्तार किया है।
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विदेश मंत्री ने कहा कि भारत का यह भी मानना था कि इंडो-पैसिफिक में एक निर्बाध परिवर्तन सामूहिक लाभ के लिए है। UNCLOS का सम्मान किया जाना चाहिए। बांग्लादेश एक "सफल विकासशील अर्थव्यवस्था" है।
सम्मेलन में विदेश मंत्री यह भी कहा कि सभी देशों के लिए कनेक्टिविटी एक विशेष रूप से महत्वपूर्ण मुद्दा है और ऐसा इसलिए है क्योंकि साम्राज्यवाद के युग ने महाद्वीप के प्राकृतिक संबंधों को बाधित कर दिया। अपने स्वयं के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्षेत्रीय साइलो का निर्माण किया।
कार्यक्रम में जयशंकर ने किसी देश का नाम लिए बगैर कहा कि जब देश अपने कानूनी दायित्वों की अवहेलना करता है या लंबे समय से चले आ रहे समझौतों का उल्लंघन करता है, तो "विश्वास और भरोसे" को भारी नुकसान होता है।
हिंद महासागर सम्मेलन में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने "अस्थिर ऋण" के बारे में भी बात की। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि पिछले दो दशकों से ऐसे सबक हैं जिन्हें हम अपने जोखिम पर अनदेखा करते हैं। अगह उद्यमों को प्रोत्साहित किया जाय तो अर्थव्यवस्था जल्द सुधर सकती है।
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