भारत के कहने पर ही गलवान हिंसा के लिए नहीं की चीन की आलोचना, पूर्व अमेरिकी राजदूत का बड़ा दावा

पूर्व अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर ने ये दावा एक भारतीय न्यूज चैनल से बात करते हुए कहा है, जिसमें उनसे पूछा गया था, कि गलवान घाटी हिंसा की आखिर अमेरिका ने क्यों आलोचना नहीं की थी?

नई दिल्ली/वॉशिंगटन, अप्रैल 04: क्या जून 2020 में गलवान घाटी में चीन के साथ हिंसक झड़प के बाद भारत ने अमेरिका से चुप रहने और भारत और चीन के बीच में नहीं बोलने के लिए कहा था? ये सनसनीखेज दावा किया है, तत्कालीन अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर ने, जो उस वक्त भारत में अमेरिकी राजदूत थे। पूर्व अमेरिकी राजदूत ने दावा किया है कि, दिल्ली नहीं चाहता था कि वाशिंगटन अपने बयानों में चीन की सीमा पर आक्रमण का उल्लेख करे।

पूर्व अमेरिकी राजदूत का दावा

पूर्व अमेरिकी राजदूत का दावा

पूर्व अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर ने ये दावा एक भारतीय न्यूज चैनल से बात करते हुए कहा है, जिसमें उनसे पूछा गया था, कि गलवान घाटी हिंसा की आखिर अमेरिका ने क्यों आलोचना नहीं की थी। टाइम्स नाउ के एक शो में जस्टर ने कहा कि, "किसी भी यूएस-इंडिया कम्युनिकेशन या किसी भी क्वाड कम्युनिकेशन में चीन का उल्लेख करने में संयम भारत की ओर से आता है, ताकि भारत चीन की नजरों में ना चुभे'। पूर्व अमेरिकी राजदूत का ये दावा काफी सनसनीखेज है, क्योंकि भारत में लगातार सवाल पूछे जा रहे हैं, कि जिस अमेरिका ने गलवान घाटी हिंसा पर चीन की आलोचना नहीं की थी, वो भला किस मुंह से यूक्रेन जंग के लिए भारत पर रूस की आलोचना करने का दवाब बना रहा है।

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    अमेरिकी राजदूत ने क्या कहा?

    अमेरिकी राजदूत ने क्या कहा?

    न्यूज एंकर और टाइम्स नाउ के प्रधान संपादक राहुल शिवशंकर के सवालों के जवाब में पूर्व अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर का ये बयान सामने आया है, कि क्या अमेरिका ने बीजिंग की आक्रामकता के बारे में कोई बयान दिया था? आपको बता दें कि, भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में 5 जून 2020 के बीच काफी हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें भारत के 20 जवान शहीद हुए थे और चीन का दावा है कि, उसके चार सैनिक मारे गये थे। वहीं, गलवान घाटी हिंसा के बीच दो एशियाई परमाणु ताकतों के बीच संबंध काफी खराब हो गये थे। हालांकि, उसके बाद लगातार सैन्य कमांडर स्तर पर बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रण में करने और तनाव को सामान्य करने की कोशिश की जा रही है। पिछले महीने ही चीन के राजदूत वांग यी ने भी भारत का दौरा किया था, जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री को चीन आमंत्रित करने की कोशिश की गई थी।

    कौन हैं केनेथ जस्टर?

    केनेथ जस्टर साल 2017 से 2021 के बीच भारत में अमेरिकी राजदूत थे और उन्होने जनवरी 2021 में कहा था, कि बीजिंग के साथ गतिरोध के बीच वाशिंगटन ने दिल्ली के साथ निकटता से समन्वय किया, लेकिन भारत को किस तरह की अमेरिकी मदद चाहिए, ये भारत को ही तय करना था। वहीं, टीवी शो के दौरान रक्षा विश्लेषक डेरेक ग्रॉसमैन ने दावा किया, कि मास्को भारत का "मित्र" नहीं है, क्योंकि, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने चीनी समकक्ष शी जिनपिंग से बीजिंग ओलंपिक में मुलाकात की थी। ग्रॉसमैन ने न्यूज डिबेट में बताया कि, पुतिन और शी ने तब कहा था कि उनकी दोस्ती की "कोई सीमा नहीं है"। उन्होंने दावा किया कि चीन के खिलाफ रूस का फायदा उठाने की भारत की रणनीति का कोई असर नहीं पड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि, "वास्तव में, रूस-चीन संबंध केवल मजबूत हुए हैं।"

    ‘भारत नहीं चाहता था, हम मदद करें’

    ‘भारत नहीं चाहता था, हम मदद करें’

    न्यूज डिबेट के दौरान जब शिवशंकर ने अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ से पूछा कि, भारत और रूस के संबंधों पर कोई भी फैसला सुनाने से पहले उन्हें यह पूछना चाहिए, कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पर चीन की आक्रामकता की निंदा की थी या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संयुक्त बयान में बीजिंग का जिक्र किया था? इस सवाल पर प्रतिक्रिया देते हुए ग्रॉसमैन ने कहा कि, "मेरी समझ से, अमेरिका ने भारत से पूछा है कि क्या वह चाहता है कि हम एलएसी पर कुछ करें, लेकिन भारत ने ना में जवाब दिया और भारत ने कहा था, कि यह कुछ ऐसा है जिसे भारत अपने दम पर संभाल सकता है।" वहीं, पूर्व अमेरिकी राजदूत जस्टर ने तब ग्रॉसमैन के तर्क का समर्थन किया।

    भारत पर प्रेशर बनाने की कोशिश

    आपको बता दें कि, पश्चिमी देशों की तरफ से भारत पर रूस की निंदा करने के लिए भारी दवाब बनाया जा रहा है और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने यहां तक कहा है, कि क्वाड में जापान और ऑस्ट्रेलिया पुतिन के आक्रमणकारी रवैये के खिलाफ काफी सख्त रहे हैं। लेकिन भारत एक अपवाद है जिसका इस मामले में रुख कुछ हद तक ढुलमुल रहा है। बता दें कि यूक्रेन पर हमला करने के बाद से रूस के खिलाफ अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देशों कई सख्त कदम उठाए और आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। तमाम बड़ी कंपनियों ने रूस में अपना बिजनेस बंद कर दिया है। यूएन में भी इन देशों ने रूस को घेरने की कोशिश की और उसके खिलाफ वोट तक किया लेकिन भारत ने इस मामले में तटस्थता की नीति अपनाई है।

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