USA and Coup: 120 साल, 35 देशों में तख्तापलट, पाकिस्तान-बांग्लादेश भी बने शिकार, अमेरिका कैसे देता है अंजाम?
America and Coup: जब भी अमेरिका किसी देश में सत्ता बदलने के नाम पर सैन्य ताकत का इस्तेमाल करता है, तो इतिहास खुद को दोहराता हुआ दिखाई देता है। अफगानिस्तान, इराक और अब वेनेजुएला-ये तीनों उदाहरण बताते हैं कि तात्कालिक जीत अक्सर लंबे समय की अस्थिरता में बदल जाती है।
2001: कुछ हफ्तों में तालिबान की छुट्टी
साल 2001 के अंत में अमेरिकी समर्थित सेनाएं अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में दाखिल हुईं। कुछ ही हफ्तों में तालिबान सरकार गिरा दी गई। अमेरिका ने इसे आतंक के खिलाफ बड़ी जीत बताया और हामिद करज़ई को नया नेता बनाया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने कहा कि मध्य एशिया में लोकतंत्र की जड़ें जमेंगी।

दो दशक बाद वही तालिबान फिर सत्ता में
लेकिन इतिहास ने अलग मोड़ लिया। लगभग 20 साल बाद, 2021 में तालिबान उतनी ही तेजी से सत्ता में लौट आया, जितनी तेजी से उसे हटाया गया था। अमेरिका द्वारा बनाई गई सरकार कुछ ही दिनों में ढह गई। यह सवाल उठने लगा-क्या इतने साल की जंग, पैसा और जानें बेकार गईं?
2003: इराक में लोकतंत्र के नाम पर सद्दाम की बलि
इराक में भी कहानी कुछ अलग नहीं रही। 2003 में अमेरिकी सैनिकों ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया। वाशिंगटन ने वादा किया था कि इराक में लोकतंत्र आएगा, स्थिरता होगी और जीवन बेहतर होगा। हकीकत यह रही कि इराक में लंबे समय तक विद्रोह चला, सांप्रदायिक गृहयुद्ध (Civil War) भड़का और पूरा मध्य पूर्व अस्थिर हो गया। यहीं से इस्लामिक स्टेट (ISIS) की शुरुआत हुई, जिसका असर आज भी क्षेत्र में देखा जा सकता है।
भारत के बगल में भी रचा खेल
2022 में पाकिस्तान में इमरान ख़ान की सरकार अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए गिरी। इमरान ख़ान ने सीधे तौर पर अमेरिका पर आरोप लगाया कि उनकी स्वतंत्र विदेश नीति-खासकर रूस के साथ रिश्तों-की वजह से उन्हें हटाया गया। एक कथित अमेरिकी "साइफर" ने इन आरोपों को और हवा दी। वहीं 2024 में बांग्लादेश में शेख़ हसीना सरकार के खिलाफ बड़े विरोध, मानवाधिकार दबाव और पश्चिमी देशों की सख़्त बयानबाज़ी के बीच सत्ता परिवर्तन हुआ। आलोचकों का दावा है कि लोकतंत्र और चुनाव की आड़ में अमेरिका ने राजनीतिक दबाव बनाकर अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई।
अमेरिका का जाना-पहचाना फॉर्मूला
जब अमेरिका अपनी ताकत से दुनिया को "री-शेप" करने निकलता है, तो एक जाना-पहचाना पैटर्न दिखता है- तेज़ सैन्य जीत, सत्ता परिवर्तन और फिर लंबे समय की अव्यवस्था।
वेनेजुएला में ट्रंप का नया दांव
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में डोनाल्ड ट्रंप का ताज़ा कदम देखा जाना चाहिए। शनिवार को ट्रंप ने वेनेजुएला में एक "त्रुटिहीन" अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन का खुला जश्न मनाया। इस ऑपरेशन में अमेरिकी स्पेशल फोर्स, हवाई हमले और नौसैनिक तैनाती शामिल थी। अंत में राजधानी कराकास से राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में ले लिया गया और अमेरिका भेज दिया गया।
सैन्य लिहाज़ से मिशन सफल
शुद्ध सैन्य दृष्टिकोण से देखें तो यह मिशन सफल रहा। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, एक भी अमेरिकी सैनिक मारा नहीं गया और लक्ष्य हासिल कर लिया गया। ट्रंप ऐसे ऑपरेशन पसंद करते हैं जो ताकत का सीधा प्रदर्शन हों। यह मिशन तेज़ था, असरदार था और कैमरों के सामने "विजय" की कहानी सुनाने लायक भी। हालांकि सैन्य सफलता के बावजूद, राजनीतिक रूप से यह कदम ट्रंप को कहीं ज़्यादा खतरनाक ज़मीन पर ले जाता है। इतिहास गवाह है कि असली मुश्किलें युद्ध के बाद शुरू होती हैं।
अमेरिका का पुराना रिकॉर्ड: 120 साल में 35 नेता
अमेरिका का इतिहास बताता है कि उसने पिछले 120 सालों में करीब 35 विदेशी नेताओं को जबरन हटाने में भूमिका निभाई है। यह दुनिया भर में हुए कुल ऐसे हस्तक्षेपों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है।
इन देशों में हुआ तख्तापलट
क्यूबा (1898), पनामा (1903, 1983, 1989), होंडुरास (1907), ग्वाटेमाला (1954), ब्राज़ील (1964), चिली (1973), बोलीविया (1971), अर्जेंटीना (1976 - अप्रत्यक्ष), पाकिस्तान (2022), बांग्लादेश (2024- अप्रत्यक्ष), ईरान (1953 - मोसादेक), इराक (2003 - सद्दाम हुसैन), सीरिया (1949 - पहला CIA तख्तापलट), लेबनान (1958), अफगानिस्तान (2001), लीबिया (2011 - गद्दाफी), यमन (1960s - अप्रत्यक्ष), फिलीपींस (1898-1902), दक्षिण कोरिया (1945-48), वियतनाम (1955-63 - दीम शासन), कंबोडिया (1970 - लोन नोल), इंडोनेशिया (1965 - सुहार्तो), थाईलैंड (1947 - अप्रत्यक्ष), जापान (1945 - युद्धोपरांत शासन परिवर्तन), मिस्र (2013 - राजनीतिक समर्थन विवादित) समेत कुल 120 सालों में अमेरिका 35 देशों में सरकार बना और मिटा चुका है।
इसे कहते हैं (FIRC)
शोधकर्ता इसे कहते हैं-विदेशी-थोपे गए शासन परिवर्तन (FIRC- Foreign-Imposed Regime Change)। आंकड़े बताते हैं कि ऐसे करीब 33% मामलों में एक दशक के भीतर गृहयुद्ध छिड़ जाता है।
ग्वाटेमाला से पनामा तक की कहानी
1954 के ग्वाटेमाला से लेकर 1989 के पनामा तक, अमेरिका ने बार-बार उन नेताओं को हटाया जिन्हें वह "अविश्वसनीय" मानता था। ग्वाटेमाला में तो एक ही साल में तीन नेताओं को हटाया गया, जिसके बाद दशकों तक हिंसा चली।
इराक और ईरान को भी किया अस्थिर
इराक में सद्दाम हुसैन की सरकार गिराने के बाद उसकी सुरक्षा व्यवस्था को भंग कर दिया गया। लाखों सशस्त्र लोग बेरोजगार हो गए, जिसने हिंसा और कट्टरपंथ को जन्म दिया। सत्ता के खालीपन में ईरान समर्थित मिलिशिया ताकतवर हुईं और अंततः ISIS उभरा। इसका असर सिर्फ इराक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया तक फैला।
वेनेजुएला में वही अनिश्चितता
ट्रंप प्रशासन मादुरो को "अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क का सरगना" बताकर कार्रवाई को सही ठहरा रहा है। लेकिन अमेरिका का अंतिम लक्ष्य क्या है-नई सरकार बनाना, संस्थाओं पर दबाव डालना या ट्रांजिशन अथॉरिटी बनाना-यह अब भी साफ नहीं है। साथ ही इतिहास यही बताता है कि सत्ता परिवर्तन करना आसान दिखता है, लेकिन स्थिरता लाना बेहद मुश्किल। वेनेजुएला के मामले में भी सवाल वही है-क्या यह फैसला हालात सुधारेगा या नई अराजकता लाएगा?
आख़िरी सवाल: सबक सीखा या नहीं?
अफगानिस्तान और इराक के बाद भी अगर वही रास्ता चुना जा रहा है, तो बड़ा सवाल यही है-
क्या अमेरिका ने इतिहास से कोई सबक सीखा है, या फिर वही कहानी एक बार और दोहराई जा रही है?
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