नाक के अलावा शरीर के ‘पिछले हिस्से’ से भी सांस ले सकते हैं इंसान, वैज्ञानिकों का दावा, बच सकती है जान
वैज्ञानिकों ने कहा कि, यह प्रयोग ‘यह साबित करने के लिए किया गया था, और इससे पता चलता है, कि चूहे और सूअर सही परिस्थितियों में आंतों में श्वसन करने में सक्षम हैं।
लंदन, जून 21: वैज्ञानिकों ने रिसर्च के आधार पर दावा किया है कि, अब नाक के अलावा शरीर के पिछले हिस्से से भी सांस लेना संभव है और बहुत जल्द ऐसा करने से इंसानों की जान भी बचाई जा सकती है। जर्नल क्लिनिकल एंड ट्रांसलेशनल रिसोर्स एंड टेक्नोलॉजी इनसाइट्स में छपी एक नई रिसर्च रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, वैज्ञानिकों के एक समूह ने कछुओं के धीमे मेटोबोलिज्म के आधार पर सूअरों और चूहों पर कई प्रयोग किए हैं।

सूअरों और चूहों पर किए गये प्रयोग
इस प्रयोग के दौरान म्यूकोसल अस्तर को पतला करने के लिए जानवरों की आंतों को साफ़ करना शामिल था, जिसका मकसद ब्लड फ्लो में बाधा को कम करता था। फिर उन्हें ऑक्सीजन की कमी वाले कमरे में रखा गया। ऐसा माना जाता है कि, क्योंकि कछुओं के पास इस तरह की परत होती है, वे अपने गुदामार्ग के माध्यम से सांस लेने में सक्षम होते हैं और सर्दियों में जीवित रहने में सक्षम होते हैं।

गुदा मार्ग से दिया गया ऑक्सीजन
डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार, जिसमें यह नहीं बताया गया है कि वैज्ञानिकों की टीम कहां से थी, उसमें बताया गया है कि, "नियंत्रण से वंचित जानवरों और आंतों के वेंटिलेशन से वंचित रहने वाले जानवरों की लगभग 11 मिनट के बाद मृत्यु हो गई। वहीं, जिन जानवरों को आंतों की सफाई के बिना आंतों में वेंटिलेशन दिया गया, वे लगभग 18 मिनट तक जीवित रहे, जो यह दर्शाता है कि कुछ ऑक्सीजन लेवल बढ़ा हुआ था। वहीं, अंत में, उन जानवरों में से 75% जिनके मलाशय को साफ़ किया गया था और दबाव के जरिए ऑक्सीजन दिया गया था, वो करीब एक घंटे तक जीवित रहे।

पीछे के हिस्से से श्वसन संभव
वैज्ञानिकों ने कहा कि, यह प्रयोग 'यह साबित करने के लिए किया गया था, और इससे पता चलता है, कि चूहे और सूअर सही परिस्थितियों में आंतों में श्वसन करने में सक्षम हैं।" उनके निष्कर्षों के अनुसार, अब वे मानते हैं कि अन्य स्तनपायी - जैसे कि इंसान भी गुदामार्ग के माध्यम से आवश्यक समय में सांस लेने से जीवित रह सकते हैं। हालांकि, ऐसा अभी रिसर्च में ही किया जा रहा है, लिहाजा ऐसा करने की कोशिश घर पर ना करें। दरअसल, वैज्ञानिकों के इस प्रयोग का मकसद विपरीत परिस्थितियों में पीछे से ऑक्सीजन देकर इंसानों की रक्षा करना है, जैसे अगर कोई शख्स हादसे का शिकार हो जाए।

इंसानों पर अभी तक प्रयोग नहीं
हालांकि, अभी तक कोई मानव परीक्षण नहीं किया गया है, और यह स्पष्ट नहीं है कि अभी तक ऐसा करने की कोई योजना है या नहीं। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह नया-नया कौशल किस तरह की स्थिति में इंसानों के काम आ सकता है।












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