लगातार चढ़ते धरती के पारे को कैसे थाम पाएगा भारत?

भारत, जलवायु परिवर्तन
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जलवायु परिवर्तन पर बनी संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी ने कहा है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग को नहीं रोका गया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

संस्थान की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनियाभर के देशों को इस पर तुरंत लगाम लगाने की ज़रूरत है. अगर ऐसा नहीं होता है तो 2030 तक धरती के कई हिस्से रहने लाय नहीं होंगे.

इस संदर्भ में आयूषी अवस्थी बता रही हैं कि भारत और दक्षिणी एशियाई देशों पर कितना बड़ा ख़तरा मंडरा रहा है.


इस महीने की शुरुआत में आईपीसीसी ने एक रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट में धरती के बढ़ रहे तापमान पर अभी तक की सबसे कड़ी चेतावनी दी गई है.

रिपोर्ट कहती है कि अगर तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस भी बढ़ता है तो इससे वंचित और कमज़ोर आबादी सबसे ज़्यादा प्रभावित होगी.

उन्हें भोजन की कमी, आमदनी, महंगाई, आजीविका के साधन, स्वास्थ्य और जनसंख्या विस्थापन की समस्याएं झेलनी पड़ सकती हैं.

भारत उन देशों की कतार में खड़ा है जो इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे. देश की आबादी बड़ी है और यहां आर्थिक रूप से असमानता ज़्यादा है.

रिपोर्ट जिस अस्थिरता की बात कर रही है, अगर वो नहीं रोकी गयी तो भारत पर इसका असर विनाशकारी हो सकता है- न केवल सामाजिक रूप से बल्कि राजनीतिक रूप से भी.

ग्लोबल वार्मिंग
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अगर ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से समुद्र का जल स्तर बढ़ता है तो देश के कई हिस्से बर्बाद हो जाएंगे. तटीय क्षेत्रों में रहने वाले और आजीविका के लिए समुद्र पर निर्भर रहने वाले लोग सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे.

वहीं दूसरी तरफ, 2015 जैसी गर्म हवाएं आम हो जाएंगी, जिससे सबसे ज़्यादा कोलकाता और पाकिस्तान का कराची शहर प्रभावित होंगे. साल 2015 में गर्म हवाओं के चलते दक्षिण एशियाई देशों में हज़ारों लोगों की मौत हो गई थी.

हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अभी देर नहीं हुई है. अगर तापमान को बढ़ने से रोका गया तो संभावित क्षति को कम किया जा सकता है.

लेकिन यह दक्षिण एशियाई देशों के लिए आसान नहीं होगा. भारत सहित अन्य देश विकासशील देश हैं, जो सीमित संसाधनों में आगे बढ़ रहे हैं.

जलवायु परिवर्तन
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कितने ख़र्च करने होंगे

रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2015 से 2050 के बीच ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए देशों को 900 बिलियन डॉलर खर्च करने होंगे.

लेकिन ऐसा लगता है कि ये बहुत कम पड़ जाएंगे.

जब नया अंतरराष्ट्रीय समझौता, इंटेंडेड नैशनली डेटरमाइंड कॉन्ट्रीब्यूशन अग्रीमेंट के तहत देशों से साल 2020 के बाद ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए ख़र्च का ब्यौरा मांगा गया तो कई देशों ने अनुमानित ख़र्च से कहीं अधिक राशि का ज़िक्र किया.

भारत ने कहा है कि अग्रीमेंट के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए एक ट्रिलियन डॉलर ख़र्च करने होंगे. वहीं, पाकिस्तान ने यह ख़र्च 40 बिलियन डॉलर बताया है.

ये आंकड़े बताते हैं कि अब यह समस्या कितनी बड़ी हो चुकी है.

यह भी स्पष्ट नहीं है कि ये ख़र्च कौन उठाएगा. आईपीसीसी की हालिया रिपोर्ट में भारत ने कहा है कि उसे ख़र्चों का वहन ग़ैर-अनुपातिक तरीक़े से करना होगा.

भारत के इस दावे को पूरी तरह ग़लत नहीं ठहराया जा सकता है.

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योजना की कमी

भारत पर पर्यावरण के लिए घातक गैसों को रोकने का दबाव है. यहां पानी की समस्या भी बढ़ रही है, यह उसके लिए चुनौती है.

देश सूखे, बाढ़, चक्रवात और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है.

देश के पास एक बेहतर आपदा प्रबंधन की टीम है, लेकिन इसे और मज़बूत करने की ज़रूरत दिख रही है. भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी अपना लक्ष्य तय किया है.

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ये लक्ष्य हासिल कैसे किए जाएंगे और इस दिशा में अगला क़दम क्या होगा.

दुनियाभर के देश अगले दो महीने में पोलैंड में मिलेंगे और वे रिपोर्ट के निष्कर्ष पर चर्चा करेंगे. रिपोर्ट में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं, जो विशेष रूप से दक्षिण एशियाई देशों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण चर्चा की मांग करते हैं.

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रिपोर्ट में एक उपाय सुझाया गया है कि जिन देशों में कार्बन का उत्सर्जन ज़्यादा है, वो इसे कम करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करें.

लेकिन इस बात पर चर्चा की ज़रूरत है कि बड़े स्तर पर इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल कितना हो पाएगा, जबकि इसकी काफ़ी कमी है.

रिपोर्ट का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि अगर लक्ष्यों को हासिल नहीं किया गया तो 2050 तक दुनिया को कार्बन का उत्सर्जन रोकना होगा.

भारत ने भी यह तय नहीं किया है कि वह कार्बन उत्सर्जन को रोकने से जुड़े लक्ष्यों को कब तक हासिल करेगा.

जबकि चीन ने यह लक्ष्य 2030 तय किया है. भारत अभी 2050 की रणनीति विकसित कर रहा है.

देश अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में विकास करने की सोच रहा है लेकिन यह आसान नहीं होगा. बड़े स्तर पर अक्षय ऊर्जा को संग्रहित करने के लिए उपायों की ज़रूरत होगी, जो बहुत महंगी हो सकती है.

उदाहरण के लिए बड़े पैमाने पर बैट्री की ज़रूरत होगी, लेकिन इनकी कीमतों में तेज़ी से कमी नहीं आने के कारण लक्ष्य आसान नहीं दिख रहे हैं.

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भारत के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है परिवहन तंत्र की. वर्तमान में देश की सड़कों पर बड़ी संख्या में साइकिल और रिक्शे दौड़ रहे हैं.

लेकिन जैसे ही लोगों की आमदनी बढ़ती है, वो तुरंत मोटर साइकिल और स्कूटर खरीद लेते हैं. कारों को लेकर क्रेज़ भी भारतीयों में ख़ूब है. वित्तीय कंपनियां सस्ते कर्ज़ पर कार ख़रीद को बढ़ावा दे रही है.

इस समस्या के समाधान के लिए भारत को इलैक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना होगा. साथ ही इसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को दुरुस्त करना होगा.

रेल और दूसरे उपायों से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने की ज़रूरत है, लेकिन यह सब कुछ आसान नहीं दिख रहा है.

क्योंकि इसे बेहतर करने के लिए तकनीक और पैसे की कितनी ज़रूरत होगी, यह स्पष्ट नहीं है. सिर्फ लक्ष्य तय किए गए हैं, पर ये हासिल कैसे होंगे, इसकी योजना तैयार नहीं है.

सिर्फ़ भारत ही नहीं दक्षिण एशिया के दूसरे देश भी इन्हीं योजनाओं की कमी से जूझ रह हैं.

(आयूषी अवस्थी ब्रिटेन की इस्ट अंगलिया यूनिवर्सिटी में पीएचडी स्कॉलर हैं.)


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