एक भाई राष्ट्रपति, एक प्रधानमंत्री, एक वित्तमंत्री... जानिए राजपक्षे परिवार ने कैसे किया श्रीलंका को कंगाल?
करीब 2 करोड़ 20 लाख की आबादी वाले देश श्रीलंका में पिछले एक दशक में सबसे खराब आर्थिक उथल-पुथल का सामना कर रहा है। और बेतहाशा चीनी कर्ज ने देश को कंगाल बना दिया है।
नई दिल्ली, अप्रैल 01: श्रीलंका इस साल के अंत तक दिवालिया हो जाएगा और हिंद महासागर की गोद में बसा ये द्वीप कंगाल होने के काफी करीब पहुंच चुका है। देश में महंगाई हर हद को पार कर चुकी है और जरूरी सामानों की किल्लत ने आम लोगों को सड़कों पर आने के लिए मजबूर कर दिया है। देश में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं और भूखी जनता राष्ट्रपति से पूछ रही है, कि आखिर देश कंगाल क्यों हो गया है? श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे से इस्तीफा मांगा जा रहा है। देश का खजाना खाली हो चुका है और चीन के कर्ज में जकड़ा ये देश अब एक एक निवाले के लिए तरस रहा है। आखिर श्रीलंका कंगाली के रास्ते पर कैसे बढ़ गया और एक परिवार ने इस द्वीप की दशा कैसे बिगाड़ दी....आईये समझते हैं।

श्रीलंका में भारी आर्थिक संकट
करीब 2 करोड़ 20 लाख की आबादी वाले देश श्रीलंका में पिछले एक दशक में सबसे खराब आर्थिक उथल-पुथल का सामना कर रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण उर्वरक प्रतिबंध की वजह से देश में चावल और चाय जैसी फसलों की भारी किल्लत हो गई, तो विदेशी मुद्रा संकट से निपटने में सरकार की विफलता ने देश को आर्थिक कंगाली में झोंक दिया। अब स्थिति काफी बिगड़ चुकी है और खुद श्रीलंका का रिजर्व बैंक देश के दिवालिया होने की तरफ इशारा कर चुका है। श्रीलंका में मानवीय आपातकाल है और राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे की सरकार इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है। श्रीलंका की राजनीतिक शिखर पर एक ही परिवार के चार भाई बैठे हुए हैं और अब अगली पीढ़ी भी श्रीलंका की जनता की छाती पर मुंग पीसने सवार हो चुकी है। श्रीलंका की सत्ता पर काबिज इन निरंकुश शासकों ने भ्रष्टाचार की सारी हदें पार करते ना सिर्फ देश को चीन की आर्थिक गुलामी में धकेल दिया, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से तबाह कर दिया।

देश पर राजपक्षे परिवार का नियंत्रण
श्रीलंका में परिवारवाद की वास्तविक स्थिति फिलहाल ये है, कि राजपक्षे परिवार के आधा दर्जन से ज्यादा सदस्य श्रीलंका की केन्द्रीय सरकार में शामिल हैं। श्रीलंका के राष्ट्रपति हैं गोटबया राजपक्षे, जो 72 साल के हैं। उनके बड़े भाई हैं महिंदा राजपक्षे, जो श्रीलंका के प्रधानमंत्री हैं और उनकी उम्र 75 साल है। महिंदा राजपक्षे के पास श्रीलंका का शहरी विकास मंत्रालय भी है। महिंदा राजपक्षे, इससे पहले श्रीलंका के राष्ट्रपति भी रह चुके हैं। वहीं, राजपक्षे परिवार के सबसे बड़े भाई, चमल राजपक्षे श्रीलंका के गृहमंत्री हैं, तो एक भाई बासिल राजपक्षे श्रीलंका के वित्तमंत्री हैं।

बेटा, भतीजा, पोता... सब सरकार में शामिल
राजपक्षे परिवार की अगली पीढ़ी भी श्रीलंका का भविष्य कंगाल करने के लिए सत्ता में विराजमान है। प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के बेटे नमल राजपक्षे श्रीलंका के खेल मंत्री हैं, इसके साथ ही टेक्नोलॉजी मंत्रालय भी नमल राजपक्षे के पास है। वहीं, चमल राजपक्षे के बेटे शाशेंन्द्र राजपक्षे श्रीलंका के कृषि मंत्री हैं। यानि, श्रीलंका में करीब 70 प्रतिशत प्रमुख मंत्रालय राजपक्षे परिवार के पास है। पिछले दो दशकों से राजपक्षे परिवार श्रीलंका की राजनीति में शीर्ष पर है और श्रीलंका की तकदीर का हर फैसला कर रहा है। राजपक्षे परिवार को राजनीति के शीर्ष पर लाने का काम महिंदा राजपक्षे को जाता है, जब उन्होंने साल 2009 में एलटीटीआई का खात्मा कर श्रीलंका को गृहयुद्ध से मुक्ति दिलवाई थी। हालांकि, इस दौरान महिंदा राजपक्षे पर मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे। आरोप ये थे, कि तमिलों का श्रीलंका में नरसंहार किया गया और प्रधानमंत्री इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार थे।

निरंकुश है राजपक्षे का परिवार
श्रीलंका की राजनीति में राजपक्षे परिवार पूरी तरह से निरंकुश माना जाता है और सत्ता को अपने ही पास रखने के लिए ये परिवार संविधान में संशोधन तक कर चुका है। साल 2015 तक महिदा राजपक्षे दो बार श्रीलंका के राष्ट्रपति रह चुके थे और उन्होंने साल 2015 में संविधान संशोधन कर तीसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था, लेकिन वो चुनाव हार गये, लेकिन साल 2019 में ईस्टर के मौके पर एक चर्च में इस्लामिक आतंकियों ने भीषण बम धमाका कर श्रीलंका की राजनीति को फिर बदल दिया। जनता ने एक बार फिर से राजपक्षे परिवार को ही चुन लिया। आम चुनाव में गोटबया राजपक्षे को काफी आसानी से जीत हासिल हो गई और वो राष्ट्रपति बन गये और उन्होंने अपने बड़े भाई महिदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना दिया।

भारत के खिलाफ बोया नफरत का जहर
श्रीलंका की सत्ता ज्यादातर वक्त राजपक्षे परिवार के पास ही रही है और 2015 से पहले महिदा राजपक्षे जब राष्ट्रपति हुआ करते थे, तो भारत विरोधी बयान की वजह से अकसर सुर्खियां बटोरते रहते थे और ऐसा माना जाता है कि, श्रीलंका की एक बड़ी आबादी के बीच महिदा राजपक्षे ने भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की कोशिश में कामयाबी भी पा ली और इस दौरान वो महिदा राजपक्षे चीन के साथ लगातार चिपकने की कोशिश करते रहे। भारत विरोधी रथ पर सवार महिदा राजपक्षे चीन के इतने करीब चले आए, कि शायद अब श्रीलंका के पास अपना कुछ नहीं बचा है और अगर श्रीलंका ने चीन को कर्ज के पैसे नहीं लौटाए, तो बाकी श्रीलंका का भी वही हाल हो सकता है, तो हंबनटोटा का हुआ है। हंबनटोटा बंदरगाह 99 सालों के लिए चीन के पास श्रीलंका को गिरवी रखनी पड़ी है।

RAW पर लगाए थे गंभीर आरोप
साल 2014 में भारत में नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन चुके थे और साल 2015 के मार्च में महिदा राजपक्षे राष्ट्रपति चुनाव हार जाते हैं। जिसके बाद वो भारत की खुफिया एजेंसी रॉ और अमेरिका पर चुनाव हरवाने का आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। महिदा राजपक्षे ने बगैर कोई सबूत पेश किए कहा था कि, उनकी चुनावी हार के पीछे रॉ और अमेरिका की साजिश है। भारत के साथ साथ महिदा राजपक्षे ने नॉर्वे और यूरोपीय देशों पर भी अपनी हार का ठीकरा फोड़ दिया था। महिदा राजपक्षे ने साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट को दिए गये इंटरव्यू में भारत के खिलाफ इतने संगीन आरोप लगा दिए थे। वहीं, भारत सरकार की तरफ से तमाम आरोपों को खारिज कर दिया गया था। इतना ही नहीं, महिदा राजपक्षे लगातार भारत के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाते रहे और चीन की बाहों में बलखाते रहे। लेकिन, वो भूल गये थे... भारत की मिट्टी का मंत्र वसुधैव कुटुमंबकम है, चीन की मिट्टी का नहीं।

सोना बेचकर काम चलाती रही सरकार
इकोनॉमी नेक्स्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2021 में श्रीलंका के केन्द्रीय बैंक के पास 6.69 टन सोने का भंडार था, जिसमें से करीब 3.6 टन सोना अभी तक बेचा जा चुका है और अब अनुमान के मुताबिक, श्रीलंका के पास करीब 3.0 से 31 टन ही सोना बचा है। श्रीलंका ने कोई पहली बार सोना नहीं बेचा है, बल्कि इससे पहले साल 2020 की शुरूआत में श्रीलंका के पास 19.6 टन सोना था, जिसमें से 12.3 टन सोना बेच दिया गया। इससे पहले साल 2015, साल 2018 और साल 2019 मं श्रीलंका ने सोना बेचा था और विदेशी मुद्रा जमा किया था और अब स्थिति ये है, कि श्रीलंका के पास सिर्फ 3 टन सोना बचा है, यानि इसके बाद श्रीलंका के पास बेचने के लिए कुछ नहीं बचेगा।

कंगाल हुए तो चीन ने दुत्कारा
श्रीलंका की राजपक्षे सरकार जिस चीन की गोद में खेल रही थी, उस चीन ने जरूरत पड़ने पर श्रीलंका को दुत्कार दिया है। इसी साल जनवरी महीने में दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुके श्रीलंका ने चीन के सामने कर्ज में कुछ छूट के लिए गुहार लगाई थी, लेकिन चीन ने कर्ज में किसी भी तरह की छूट देने से इनकार कर दिया था। जनवरी के पहले हफ्ते में श्रीलंका के राष्ट्रपति ने चीन से अनुरोध किया था, कि श्रीलंका की आर्थिक स्थिति काफी ज्यादा खराब है, लिहाजा चीन की तरफ से श्रीलंका को कर्ज स्ट्रक्चर में कुछ रियायत दी जाए, जिसे चीन ने ना सिर्फ सीधे तौर पर नकार दिया है, बल्कि साफ कर दिया, कि श्रीलंका को कैसे अपने देश में सुधार कार्यक्रम लाना है, उसका फैसला वो चीन से पूछकर करे।












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