Pakistan: आजादी के 75 सालों में एक बीमारू देश कैसे बन गया पाकिस्तान, जिन्ना का ख्वाब हुआ पूरा?
साल 20222, जैसा कि पाकिस्तानियों ने देश की 75 वीं स्वतंत्रता दिवस की सालगिरह मनाई है, अगले 25 सालों में क्या पाकिस्तान क्या सही मायनों में एक आजाद देश हो पाएगा, जब देश अपनी स्वतंत्रता की सौवीं वर्षगांठ मनाएगा?
इस्लामाबाद, अगस्त 14: ये साल 2047 है और जिस पाकिस्तान को साल 2022 में दक्षिण एशिया का बीमार मुल्क कहा गया था, वो अब एक मध्यम आय वाला देश बन चुका है। साल 2025 के बाद से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था प्रति वर्ष औसतन 7.5 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, और पाकिस्तान में प्रति व्यक्ति बढ़कर 8,000 डॉलर से अधिक हो गया है। मानव विकास को मापने वाले संगठन देश को समावेशी, नई टेक्नोलॉजी की तरफ अग्रसर और सबसे महत्वपूर्ण, स्वतंत्र बता रहे हैं। पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था स्थिर और लोकतांत्रिक है और विश्व की बड़ी कंपनियों में पाकिस्तानी महिलाएं अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। पाकिस्तान अब आतंकवादियों का समर्थन नहीं देता है और कट्टरपंथ अब पाकिस्तान के लिए इतिहास की बात है। पाकिस्तानी शहर अब इतने विकसित हो चुके हैं, कि दुनियाभर के देश पाकिस्तान से जलते हैं।

चलिए, वास्तविकता की तरफ चलते हैं...
साल 20222, जैसा कि पाकिस्तानियों ने देश की 75 वीं स्वतंत्रता दिवस की सालगिरह मनाई है, अगले 25 सालों में क्या पाकिस्तान ऊपर लिखी बातों की तरह हो पाएगा, जब देश अपनी स्वतंत्रता की सौवीं वर्षगांठ मनाएगा? आज की परिस्थितियों को देखते हुए ये नामुमकिन लगता है और पिछले 75 सालों में जिस तरह से नेताओं ने पाकिस्तान को आगे बढ़ाया है, वो काफी खतरनाक है। पाकिस्तान के आतंकवादी दुनियाभर में लोगों को मार रहे हैं, धमकियां दे रहे हैं, पाकिस्तानी नेता उन आतंकियों का बचाव रकते हैं। लेकिन, क्या वो पाकिस्तान, जिसके ज्यादातर नागरिकों की उम्र 25 साल के आसपास है, वो 2047 तक उस पाकिस्तान का निर्माण कर पाएंगे, जिसकी वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के लिए नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार मुल्क के तौर पर शाख हो। पाकिस्तानी अखबार डॉन के मुताबिक, लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज (एलयूएमएस) में अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ अली हसनैन ने अपनी सार्वजनिक टिप्पणी में तर्क दिया, पाकिस्तान में नागरिकों के जीवन की सुरक्षा की गारंटी नहीं है, उनकी संपत्ति की रक्षा करने वाली प्रणाली और न्याय की गारंटी नहीं है। उन्होंने कहा कि, अच्छी बात सिर्फ ये है, कि समाज का एक तबका ऐसा अभी भी है, जो एक उज्ज्वल भविष्य चाहता है, जो विकास चाहता है, जो टेक्नोलॉजी को पसंद करता है और जो चाहता है, कि देश मजहबी उन्माद से बाहर आए।

पाकिस्तान की हिंसक प्रवृत्ति
अपने शुरूआती दिनों से ही पाकिस्तान हिंसक प्रवृतियों पर लगाम लगाने में कामयाब नहीं हो पाया। भारत से अलग होकर एक 'पवित्र भूमि' की स्थापना करने का ख्वाब देखा गया, लेकिन ये हिंसा के दलदल में फंसता चला गया। साल 1950 में हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों का पहला नरसंहार शुरू हुआ और तीन महीने की हिंसा में हजारों हिंदू मार दिए गये और हजारों को पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। उस समय पूर्वी पाकिस्तान में जो कुछ हुआ, उसने जल्द ही पश्चिमी पाकिस्तान को भी अपनी चपेट में ले लिया। साल 1953 में लाहौर में अहमदी विरोधी दंगों के कारण व्यापक हत्या, लूटपाट और आगजनी हुई। लाहौर में तीन महीने के लिए मार्शल लॉ लागू करना पड़ा और जबर ख्वाजा नजीमुद्दीन सरकार को बर्खास्त किया गया, उसके बाद ही ये दंगे खत्म हो पाए, लेकिन तब तक सैकड़ों अहमदी मुसलमान मारे चुके थे। पाकिस्तान निर्माण के प्रारंभिक वर्षों के दौरान इन हिंसक घटनाओं ने आने वाले बहुत से सालों के लिए उथल-पुथल को जन्म दे दिया, जिसमें साल 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में भीषण भयावहता, अल्पसंख्यकों का निरंतर उत्पीड़न, जो आज भी जारी है, और देश की राजनीति में सेना की महत्वपूर्ण भूमिका को हमेशा के लिए शामिल कर लिया।
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सच बोलना होता गया गुनाह
डॉन के मुताबिक, पाकिस्तान में सत्ता के लिए सच बोलने वाले व्यक्ति अक्सर खुद को सलाखों के पीछे पाते थे, जबकि भ्रष्ट नेता अपने विशेषाधिकार के साथ बचते चले गए। अनगिनत नागरिकों ने अवैध कारावास में रहते हुए अंतिम सांस ली। और इस दौरान लगातार नागरिक शासन पर सेना का कब्जा होता रहा, जिसने पाकिस्तान की लोकतंत्र की नींद को पूरी तरह के खोखली करके रख दी। मुशर्रफ का शासन और फिर अमेरिका पर आतंकवादी हमला, इन दो घटनाओं ने पाकिस्तान के भविष्य को भी हिलाकर रख दिया और फिर देश में दशकों में देखी गई हिंसा की सबसे विनाशकारी लहर को उजागर किया। डॉन के मुताबिक, पाकिस्तान ही वो मुल्क है, जो हिंसा का जश्न मनाता है, एक बार नहीं, बार बार मनाता है और पाकिस्तान ही वो मुल्क है, जो एक आतंकवादी संगठन के सत्ता में आने पर उसके समर्थन में झंडे लहराता है। पाकिस्तान की राजनीति में जो अच्छे लोग हैं, उनके परिवारवाले सालों से उनकी रिहाई का इंतजार कर रहे हैं और पाकिस्तान की महिलाएं अकल्पनीय शारीरिक और भावनात्मक हिंसा की शिकार हैं। 2017- 18 पाकिस्तान जनसांख्यिकी और स्वास्थ्य सर्वेक्षण से पता चलता है कि, 15 साल की उम्र से लगभग 3 में से 1 महिला ने शारीरिक हिंसा का अनुभव किया है!

पाकिस्तान में शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त
डॉन के मुताबिक, पाकिस्तान की स्कूलों में मजहब बुरी तरह से हावी है और ये आजादी की शुरूआत से ही हुआ है, जहां विज्ञान को सबसे आखिरी पसंद माना जाता है। किताबों में मुस्लिम वर्चस्व की इतनी बातें लिखी हैं, कि जवान होने वाले ज्यादातर छात्र 'मुस्लिम घमंड' के साथ आगे बढ़ते हैं और उनके पास दुनिया में मिल जाने की क्षमता खत्म हो गई रहती है। शिक्षा में समाज का विकास गौण है और सिर्फ धार्मिक किताबों को पढ़ने पर जोर दिया जाता है। डॉन के मुताबिक, पाकिस्तान की इतिहास की किताबें झूठ का पुलिंदा है, जिसमें भारत से हर जंग जीतने की बात की गई है, लिहाजा पाकिस्तान के छात्र उन गलतियों के बारे में सीख और समझ ही विकसित नहीं कर पाते, जो गलतियां अतीत में की गई हैं। लिहाजा, पाकिस्तान में प्रतिभाओं को पनपने ही नहीं दिया जाता है।

अमीर और ताकतवरों का मुल्क
डॉन के मुताबिक, आजादी के 75 सालों के बाद जिस पाकिस्तान ने हिंदुओं से लड़कर आजादी हासिल की थी, ताकि हर एक मुसलमान आजादी के साथ अपना विकास कर सकें और जो दावा किया गया था, कि हिंदुओं के साथ मुसलमान नहीं रह सकते हैं, वो दावे ध्वस्त हो चुके हैं। पाकिस्तान में अब मुट्ठी भर मुसलमान ताकतवर हैं, जो तमाम गरीब और लाचार मुसलमानों को पैरों तले रौंदते रहते हैं। डॉन के मुताबिक, देश बीमार हो चुका है और देश में जमीन का कानून दम तोड़ चुका है। डॉन ने भारत से तुलना करते हुए कहा है, कि जहां नेहरू के नेतृत्व में भारत बड़े पैमाने पर भूमि सुधारों को आगे बढ़ाने में कामयाब रहा, वहीं पाकिस्तान के नेता ऐसा करने में पूरी तरह से विफल रहे। यहां तक कि जुल्फिकार अली भुट्टो के प्रयास भी उनकी अपार लोकप्रियता के बावजूद कम पड़ गए, जिसका अर्थ है कि सामंतवाद पूरे पाकिस्तान में, विशेष रूप से सिंध और पंजाब में एक वास्तविकता बना हुआ है। लेकिन संपत्ति के अधिकारों के बिना भूमि सुधार निरर्थक हैं और पाकिस्तानी सरकार पर सामंतवाद इतना ज्यादा हावी है, कि भूमि सुधार कानून का बनना अब असंभव सा दिखता है।

अर्थव्यवस्था में फेल हो चुका है पाकिस्तान
आज पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से फेल हो चुकी है और देश पर इतना कर्ज है, जिसे वो कभी भी चुका नहीं पाएगा। पकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार खाली होने के कगार पर है और उसे बार बार चीन, सऊदी अरब और यूएई के सामने कटोरा फैलाना पड़ता है, ताकि देश के पास जरूरी सामान खरीदने के लिए पैसा बचा रहे। पाकिस्तान पहले ही गैर-जरूरी और लग्जरी सामानों के आयात पर पाबंदी लगा चुका है। चीन के कर्ज में पाकिस्तान पूरी तरह से डूब चुका है और पिछले पांच सालों में ही पाकिस्तान ने अलग अलग प्रोजेक्ट्स के नाम पर चीन से 21.5 अरब डॉलर का लोन लिया है, लेकिन वो इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट अधूरे हैं और चीन ने अब लोन देने से पाकिस्तान को मना कर दिया है, जिसके बाद अब पाकिस्तान बीच मंछधार में फंसा हुआ है। वही, संयुक्त अरब अमीरात ने अब लोन देने से मना कर दिया है और पाकिस्तानी संपत्ति को खरीदने के एवज में पैसे देने की बात कही है, यानि, पिछले 75 सालों में पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को चूल्हे में झोंक चुका है। यानि, पाकिस्तान अपनी करनी की बदौलत एक बीमारू मुल्क बन गया, जबकि हर पाकिस्तान नेता जिन्ना के रास्ते पर ही आगे बढ़ने की बात करते हैं।

दिवालिया होने की तरफ बढ़ा देश
पाकिस्तान के बढ़ते आयात ने देश के व्यापार घाटे को काफी बढ़ा दिया है और देश की करेंसी का एक्सचेंज रेट भी बुरी तरह से गिर गया है। चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों (जुलाई-मार्च) की अवधि में कुल व्यापार घाटा बढ़कर 35.52 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 20.8 अरब डॉलर था। यानि कुल मिलाकर, व्यापार घाटा 15 अरब डॉलर से ज्यादा बढ़ गया, जो बाहरी खाते की बिगड़ती स्थिति को दर्शाता है। इतने घाटे के साथ, पाकिस्तान के आने वाले महीनों में भुगतान संतुलन संकट में फंस जाएगा, क्योंकि उसके पास विदेशी कर्ज चुकाने के लिए पैसे ही नहीं रहेंगे। वहीं, अब पाकिस्तान को इसी साल से चीन से लिए हुए कर्ज का सूद चुकाना होगा और पूरी संभावना है, कि पाकिस्तान ऐसा नहीं कर पाएगा, लिहाजा इस साल के अंत तक दुनिया एक नये पाकिस्तान को देख सकती है, जो डिफॉल्टर होने के साथ ही तेजी से दिवालिया होने की तरफ बढ़ जाएगा और चूंकी पाकिस्तान के परमाणु हथियार भी हैं, लिहाजा ये देश पूरी दुनिया को संकट में फंसा देगा।
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