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ट्रंप की अफ़ग़ानिस्तान में हड़बड़ी से भारत को कितना नुकसान होगा

अमरीकी सैनिक को सम्मानित करते राष्ट्रपति ट्रंप
Getty Images
अमरीकी सैनिक को सम्मानित करते राष्ट्रपति ट्रंप

अफ़ग़ानिस्तान की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा अमरीकी सैन्य मौजूदगी पर निर्भर करती है. अफ़ग़ानिस्तान के लिए अमरीका सुरक्षा का केंद्र बिंदु है. साल 2001 के बाद अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी मौजुदगी को बरकरार रखा है.

उसकी एक वजह ये है कि अमरीका अफ़ग़ानिस्तान की स्थिरता को अपनी विदेश नीति का एक मुख्य लक्ष्य मानकर चल रहा था. तभी से राजनीतिक, आर्थिक और क्षेत्रीय रूप से स्थिर अफ़ग़ानिस्तान, अमरीकी विदेश नीति की प्राथमिकता रहा है.

लेकिन ट्रंप प्रशासन अब अपनी नीति में बदलाव करना चाहता है. राष्ट्रपति बनने से पहले चुनाव लड़ने के दौरान ही ट्रंप ने कहा था कि वो अमरीकी सैनिकों को इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान से बाहर लाना चाहते हैं.

इस बात पर उन्हें काफी समर्थन मिला क्योंकि अमरीका दो दशकों तक चली इन दो लड़ाइयों से थक चुका है और चाहते हैं कि राजनीतिक सत्ता घरेलू मोर्चे पर अधिक ध्यान दे. ट्रंप ने चुनाव में इसी बात को भुनाया और अब चाहते हैं कि अगले चुनाव से पहले अफ़ग़ानिस्तान में कुछ ऐसा कर दिखाएं कि कह सकें, हां मैंने अपना वादा पूरा किया.

इसलिए अब ट्रंप प्रशासन अपनी नीति में जल्दबाज़ी में या एक निर्धारित टाइम फ्रेम में बदलाव करना चाहता है.

बड़ा बदलाव

तालिबान लड़ाके
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तालिबान लड़ाके

तालिबान जिसके ख़िलाफ़ अमरीका इतने वर्षों से लड़ रहा था, उसी तालिबान को अमरीका अब अफ़ग़ानिस्तान के राजनीतिक ढांचे में शामिल करने के लिए तैयार हो गया है.

दोनों के बीच सात दौर की बातचीत हो चुकी है और आगे भी कुछ शर्तें तय करने के लिए बातचीत जारी है. बड़ा बदलाव यही होगा कि अमरीका कल तक जिसके ख़िलाफ़ लड़ रहा था, वही अब अफ़ग़ानिस्तान के सरकारी तंत्र और राजनीतिक ढांचे का हिस्सा बन जाएगा.

इसकी वजह से अमरीका ये कह पाएगा कि अफ़ग़ानिस्तान में अलग-अलग धड़ों में राजनीतिक सुलह हो गया है. मौजूदा राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी और उससे पहले सत्ता में शामिल रहे राजनीतिक धड़े वो अभी तक तालिबान के खिलाफ थे.

लेकिन तालिबान ने ये संदेश बार बार दिया है कि वो कहीं भी हमला कर सकता है, अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन के एक बड़े हिस्से पर उसका नियंत्रण है और उसके बगैर कोई राजनीतिक समाधान नहीं हो सकता, उसे सैन्य रूप से हराया नहीं जा सकता है.

अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिक
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अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिक

इसके जबाव में अमरीकी नीति ये है कि हम चूंकि तालिबान को हरा नहीं पा रहे हैं, इसलिए बातचीत करके तालिबान को सत्ता के ढांचे में जगह दी जाए. इसकी वजह से तस्वीर कुछ ऐसी बन सकती है कि आप तालिबान को सत्ता में देखेंगे, तालिबान की नीतियों को लागू होते देखेंगे, तालिबान के उग्र इस्लामी एजेंडे के कुछ अंश आपको नज़र आ सकते हैं.

अमरीका और तालिबान के बीच सात दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी ये स्पष्ट नहीं हो पाया है कि किस शर्त पर तालिबान को सत्ता में लाया जा रहा है. संकेत ये हैं अभी तक कि कुछ भरोसा अमरीका देगा और कुछ गारंटी तालिबान देगा. इसमें तालिबान ने अफ़ग़ान धड़ों के बीच बातचीत और अपनी ओर से संघर्ष विराम की बात कही है.

इससे पहले तक तालिबान का कहना था कि हम सिर्फ अमरीका से बात करेंगे, अशरफ़ गनी सरकार से बात नहीं करेंगे. तालिबान का तर्क ये रहा है कि सरकार तो कठपुतली है और असली नियंत्रण अमरीका का है, इसलिए हम अमरीका से ही बात करेंगे. लेकिन अब तालिबान का रुख़ बदला है. अमरीका गांरटी लेना चाहेगा कि अफ़गानिस्तान की जमीन को अमरीका के खिलाफ़ इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.

सकारात्मक संभावना ये है कि अफ़ग़ानिस्तान में राजनीतिक प्रक्रिया आरंभ होगी. लेकिन आशंका ये है कि सरकार में आने के बाद तालिबान का रवैया बदलेगा या नहीं, क्योंकि सत्ता में आने के बाद तालिबान को रोकने वाला कोई नहीं होगा.

भारत की चिंता

अशरफ़ गनी के साथ नरेंद्र मोदी
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अशरफ़ गनी के साथ नरेंद्र मोदी

तालिबान की पुरानी सरकार जाने और साल 2001 में अमरीका के आने के बाद एक नई राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हुई थी.

उसके बाद भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में बड़े पैमाने पर निवेश किया है. भारत ने आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक और कूटनीतिक निवेश भी बड़े पैमाने पर किया है.

भारत, अफ़ग़ान नेशनल आर्मी, अफ़ग़ान राजनयिकों, नौकरशाहों और बाक़ी पेशेवरों को ट्रेनिंग देता है. भारत ने उनके लिए संसद की इमारत बनाई है, बांध बनाए हैं, सड़कें और बुनियादी ढांचा तैयार किया है. अफ़ग़ानिस्तान में भारत की छवि बहुत सकारात्मक है, लोग भारत को पसंद करते हैं.

भारत की भूमिका पर सवाल

लेकिन अब जिस तरह के समीकरण बनते नज़र आ रहे हैं, उसमें भारत की भूमिका पहले जैसी नहीं रहेगी. भारत, तालिबान को मान्यता नहीं देता है और भारत कहता रहा है कि तालिबान अपने इस्लामिक एजेंडे से बाहर नहीं निकल सकता.

तालिबान के सत्ता में आने से पूरे क्षेत्र में जो उग्र इस्लामी ताक़ते हैं, उनमें जोश भर जाएगा. उदाहरण के तौर पर पिछली बार जब तालिबान ने बढ़त हासिल की थी तो भारतीय कश्मीर में चरमपंथ बढ़ गया था. संदेश ये जाएगा कि जब हम अमरीका को भगा सकते हैं तो बाकी को भी खदेड़ सकते हैं.

इमरान ख़ान
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इमरान ख़ान

इस प्रक्रिया में पाकिस्तान का महत्व एक बार फिर बढ़ गया है. पाकिस्तान, अमरीका के लिए बड़ा महत्वपूर्ण रोल अदा कर रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को अमरीका भी बुलाया है. ट्रंप ये संदेश भी दे रहे हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के लिए पाकिस्तान महत्वपूर्ण है. ट्रंप ने अगस्त 2017 में जिस नीति की शुरुआत की थी, उसमें दक्षिण एशिया में भारत को तरज़ीह दी गई थी.

ऐसा लग रहा है कि उसमें बदलाव आ रहा है और अमरीका दोबारा पाकिस्तान को सेंट्रल रोल में लाना चाहता है क्योंकि पाकिस्तान के बिना तालिबान बातचीत आगे नहीं बढ़ाएगा. अफ़ग़ानिस्तान शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान अहम भूमिका अदा कर रहा है. पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका से भारत की परेशानी बढ़ सकती है. इससे क्षेत्रीय समीकरण भी गड़बड़ाएंगे.

हालांकि बदलते हालात में भारत ने भी अपना रवैया थोड़ा बदला है. भारत देख रहा है कि तालिबान का पक्ष भारी हो रहा है, उससे देखते हुए भारत ने भी कुछ बैक-चैनल बातचीत की है. चीन की भी इसमें भूमिका होगी. तालिबान के मुल्ला बरादर कुछ वक्त पहले चीन गए थे. वहां पर हो सकता है कि चीन ने तालिबान पर बातचीत के लिए दबाव डाला हो, शांति प्रक्रिया जल्द से जल्द आगे बढ़े ताकि अमरीका की रवानगी जल्द हो और चीन की भूमिका बढ़ जाए.

भारत चूंकि अफ़ग़ान शांति वार्ता से पूरी तरह बाहर है, इसलिए अमरीका के जाने और तालिबान के सत्ता में आने से भारत के हित ख़तरे में पड़ सकते हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, अफ़गानिस्तान में लगभग 57 प्रतिशत हिस्सा सरकार के नियंत्रण में है जबकि तालिबान 15 प्रतिशत हिस्से पर काबिज़ है, बाकी बचे हिस्से के लिए दोनों के बीच संघर्ष जारी है. दिक्कत ये भी है कि अफ़ग़ान नेशनल आर्मी अभी तक मज़बूती से उभर नहीं पाई है. उसे आज भी अमरीका की ज़रूरत होती है. समस्या ये है कि अफ़ग़ानिस्तान अपने बूते तालिबान से निपटने के लिए तैयार नहीं हो पाया है, जबकि तालिबान को पाकिस्तान से मदद मिलती रही है.

राष्ट्रपति ट्रंप
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राष्ट्रपति ट्रंप

रही बात अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की, उन्हें चुनाव की वजह से जल्दी है. लेकिन तालिबान को ऐसी कोई जल्दी नहीं है.

दोनों के नज़रिए अलग हैं और इसमें तालिबान खुद को अधिक सशक्त महससू करता है. वो चाहे तो आगे भी इंतज़ार कर सकता है और लड़ाई भी जारी रख सकता है.

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