यूक्रेन पर रूसी आक्रमण को लेकर चीन में कैसी है हलचल, ताइवान की आजादी बचेगी या नहीं ?
हॉन्ग कॉन्ग, 2 मार्च: यूक्रेन पर रूसी हमले के सात दिन हो चुके हैं। पहले दिन से ही यह चर्चा दुनिया भर में हो रही है कि जब रूस ऐसा कर सकता है तो चीन ताइवान के साथ क्या कुछ कर सकता है? खुद ताइवान भी मानता है कि दोनों की स्थिति में अंतर है, हालांकि उसका ये कहने का संदर्भ दूसरा है। दरअसल, एक्सपर्ट भी मानते हैं कि रूस ने यूक्रेन के खिलाफ जो कदम उठाया है, उसकी टाइमिंग बहुत खास है और इसके पीछे चीन का एक बड़ा रोल हो सकता है। आइए बदले कूटनीतिक माहौल में इन सभी परिस्थितियों पर एक नजर डालने की कोशिश करते हैं कि ताइवान की आजादी बची रह पाएगी या उसे चीन अपने में मिला लेगा और दुनिया तमाशबीन बनी रहने को मजबूर होगी?

पुतिन और जिनपिंग की दोस्ती संयोग है या प्रयोग ?
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन में उनके समक्ष शी जिनपिंग की मुलाकात बीजिंग विंटर ओलम्पिक के दौरान 5 फरवरी को हुई थी; और रूस ने ओलम्पिक खत्म होने के महज चार दिनों बाद ही यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया। इससे इतना संकेत तो जरूर मिलता है कि पुतिन के इरादों से जिनपिंग कुछ न कुछ वाकिफ तो जरूर रहे होंगे। पुतिन ने उन्हें इसकी भनक नहीं लगने दी हो, यह समझना लगभग बेमानी है। दोनों मुल्कों की ओर से जो साझा बयान जारी हुआ था, उसमें भी चीन ने 'यूरोप में सुरक्षा गारंटी' को लेकर पुतिन की मांग पर 'सहानुभूति' और 'समर्थन' जताया था। जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में रूसी मामलों की एक्सपर्ट एंजेला स्टेंट के मुताबिक, 'मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगी कि व्लादिमीर पुतन यूक्रेन के खिलाफ ऐक्शन के लिए यह समय नहीं चुनते, यदि उन्हें नहीं पता होता कि चीन उनके साथ है....तथ्य यह है कि उन्हें पता था कि जो भी हुआ चीन उनके साथ रहेगा।'

रूसी-चीनी भाई-भाई पर एक्सपर्ट की राय
लेकिन, एक्सपर्ट मानते हैं कि चीन यह कतई नहीं चाहेगा कि यूक्रेन में रूस ज्यादा दिनों तक युद्ध की स्थिति में बना रहे। बीजिंग की कोशिश होगी कि इस जंग में रूस के पीछे खड़े रहने के बाद भी उसका हाथ साफ रहे। लेकिन, चीन की यह भी कोशिश होगी कि पश्चिमी देश या नाटो भी ताकतवर बनकर ना उभरें। क्योंकि, उसे लगता है कि कुछ भी हो जाए, अमेरिका की हिट लिस्ट में बीजिंग ही नंबर वन रहेगा। स्टेंट का कहना है कि 'चीन को पश्चिम के साथ अपने आर्थिक हितों को खतरे में डालने की कोशिश नहीं करने के साथ ही रूस के लिए अपने समर्थन को बहुत सावधानी से संतुलित करना होगा। इससे यह रूस को भी कुछ हद तक प्रतिबंधों से राहत दिलाने में मदद कर सकता है।'

चित भी मेरी-पट भी मेरी वाले अंदाज में जिनपिंग सरकार
चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने 25 फरवरी को ब्रिटिश और फ्रांस के विदेश मंत्रियों के सामने जो अपनी स्थिति पेश की थी, उसके मुताबिक वह चाहता है कि 'यूक्रेन मुद्दे (हालांकि, रूसी आक्रमण को वह अभी तक हमला कहने से बच रहा है) पर सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए।' उन्होंने दूसरी बात ये कही कि एक देश की सुरक्षा दूसरे देश की कीमत पर नहीं होनी चाहिए और सैन्य गुटबंदी के विस्तार के खिलाफ भी चेतावनी दी थी। इस तरह से इस मामले में भी उसने रूस के खिलाफ बोलने की जगह अमेरिका और नाटो पर ही आरोप मढ़ने की कोशिश की। तीसरा, ये कि 'सभी पार्टियों को संयम' बरतनी चाहिए। यानि, यूक्रेन पर रूस ने हमला किया है, इस बात को वह गोल करना चाह रहा है। यही नहीं, उसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर रहते हुए भी उससे अलग रहकर कहा कि इसे 'सकारात्मक भूमिका' निभानी चाहिए।

रूसी आक्रमण को लेकर चीन में क्या सोच रहे हैं लोग ?
यूक्रेन पर आक्रमण के खिलाफ जितना खुलकर विरोध रूस में देखा जा रहा है, उतना चीन में मौजूदा व्यवस्था में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता। दोनों वामपंथी विचारधारा की बुनियाद पर तानाशाही मानसिकता वाली व्यवस्था है, लेकिन अपने देश में जिनपिंग जितनी दादागीरी कर सकते हैं, पुतिन के लिए अभी भी उतना मुमकिन नहीं है। इसलिए चीन में सोशल मीडिया पर शुरुआत में यूक्रेन के समर्थन में एक भावना जरूर देखी गई, लेकिन यह अंगूठे के निशान या इमोजी तक ही आमतौर पर सीमित रहे। शब्दों में बयां करने की हिम्मत कुछ ही ने जुटाई। लेकिन, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के प्रोपेगेंडा के सामने किसी भी पोस्ट की कोई हैसियत नहीं है। चार चीनी प्रोफेसरों ने रूस को रुकने के लिए कहते हुए यूक्रेन के लोगों के समर्थन की कोशिश की थी, लेकिन सीसीपी ने उसे तत्काल ही डिलीट करवा दिया। उसके बाद रूस के समर्थन और अमेरिका के विरोध वाली प्रोपेगेंडा पोस्ट की इंटरनेट पर जैसे झरी लग गई। एक पर्यवेक्षक ने पाया कि आखिरकार 90 फीसदी पोस्ट सीसीपी के प्रोपेगेंडा से संबंधित रह गई। पुतिन की तानाशाही के बावजूद रूसी जनता इस मायने में चीनी जनता से खुद को ज्यादा सौभाग्यशाली मान रही होगी।

ताइवान की आजादी बचेगी या नहीं ?
आज पूरी दुनिया यह सोचने को मजबूर हुई है कि जब यूक्रेन जैसे स्वतंत्र और लोकतांत्रिक मुल्क पर रूस ने आक्रमण कर दिया और कोई उसे रोकने की हिम्मत नहीं जुटा सका तो ताइवान के साथ तानाशाह जिनपिंग क्या करेंगे? चीन में उनकी स्थिति रूस में पुतिन के मुकाबले कहीं ज्यादा ही मजबूत है। रूस के दिखावे वाले संसद के तीन सांसद ने भी गलत को गलत कहने की कोशिश तो की है। कम्युनिस्टों ने तो चीन में अपने कैडरों को इस लायक भी नहीं छोड़ा है कि वह दुनिया की किसी दूसरी भाषा को समझ भी पाएं। हालांकि, ताइवान (यह भी लोकतांत्रिक मुल्क है) के हौसले अभी बुलंद हैं और वहां की सरकार ने कहा है कि दोनों में तुलना नहीं है। लेकिन, कुछ एक्सपर्ट भी मानते हैं कि वास्तव में ताइवान पर खतरा बढ़ गया है। वैसे अमेरिका के लिए यूक्रेन और ताइवान में फर्क जरूर है। ताइवान अमेरिका का 9वां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जबकि यूक्रेन 67वां। वैसे तो अमेरिका ने ताइवान को सिर्फ उसकी सुरक्षा के लिए हथियार उपलब्ध करवाने का समझौता किया हुआ है। लेकिन, पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि वह ताइवान की रक्षा करेंगे! लेकिन, दूसरी तरफ चीन के लिए यूक्रेन और ताइवान में अंतर ये है कि वह पहले को तो एक संप्रभुत्व राष्ट्र मानता है, लेकिन ताइवान पर अपना संप्रभुत्व जताता है। मतलब, रूस जितना आक्रामक यूक्रेन के लिए हुआ है, उसके मुकाबले ताइवान पर चीन कहीं ज्यादा आक्रामक हो सकता है। खुद जिनपिंग बार-बार कह चुके हैं कि आज न कल, ताइवान एक दिन मेनलैंड का हिस्सा होगा। इसलिए, ताइवान सही मायने में अब ऐतिहासिक रूप से ज्यादा संकट में आ चुका है; और अपनी कही हुई बातों पर भरोसा जताने के लिए बाइडेन को पहले ऐसा कुछ करके दिखाना होगा।












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