Explainer: प्रचंड धूप भारत की नई हकीकत.. नई स्टडी में खुलासा, जानलेवा लू में भारत को क्यों जीना होगा?
Heatwave News: पिछले कुछ सालों से हर साल प्रचंड गर्मी और लू के थपेड़ों का चलना भारत में नई हकीकत बनती जा रही है और इस साल अप्रैल और मई महीने में पूर्वी और दक्षिणी भारत के हिस्सों में जानलेवा गर्मी के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया गया है।
एक नई स्टडी रिपोर्ट से पता चला है, कि जलवायु परिवर्तन के कारण असामान्य रूप से उच्च तापमान लगभग 45 गुना ज्यादा हो गया है। दूसरे शब्दों में कहें, को यदि जलवायु परिवर्तन नहीं होता, तो यह बेहद कम संभावना होती, कि उस समय इतना असामान्य रूप से प्रचंड गर्मी दर्ज किया जाता।

भारत में पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ते तापमान को लेकर ये नई स्टडी 'वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन' ने किया है। ये संगठन, शोधकर्ताओं का एक अंतरराष्ट्रीय समूह है, जो यह पता लगाने की कोशिश करता है, कि क्या कोई विशेष प्रचंड मौसम की घटना, जलवायु परिवर्तन के कारण हुई है?
ये लगातार तीसरा वर्ष है, जब भारत में गर्मियों के शुरुआती दौर में लू को जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। इन्हीं शोधकर्ताओं ने पहले दिखाया था, कि 2022 के मार्च-अप्रैल और 2023 के अप्रैल में अत्यधिक गर्मी के पीछे की वजह भी जलवायु परिवर्तन हो सकती है।
एट्रिब्यूशन साइंस स्टडी, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को मापने में तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक घटना है, और अभी तक वैज्ञानिक, जलवायु परिवर्तन को वजह से मौसम पर पड़ने वाले प्रभावों को दोष देने के मामले में काफी सतर्क रहे हैं। हालांकि, पिछले दो दशकों में नए मशीनों और पद्धतियों ने यह कहना संभव बना दिया है, कि जलवायु परिवर्तन के कारण किस मौसम का प्रभाव कैसा पड़ा है।
भारत में खतरनाक लू का प्रकोप
स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लू का प्रकोप खतरनाक स्तर की सीमा रेखा पर पहुंचने लगा है। हीटवेव को उच्च तापमान से परिभाषित नहीं किया जाता है। बल्कि, इन्हें तापमान में असामान्यताओं से परिभाषित किया जाता है। उदाहरण के लिए, जिस स्थान पर आमतौर पर गर्मियों के दौरान 40 डिग्री सेल्सियस तापमान होता है, उसे लू नहीं कहा जाता है, भले ही तापमान 42 या 43 डिग्री तक बढ़ जाए। लेकिन, अगर किसी अन्य जगह पर सामान्यता 27 से 28 डिग्री तापमान रहता हो और वहां तापमान बढ़कर 35 डिग्री पर जा चुका हो, तो उसे हीटवेभ कहा जाता है।
गर्मियों के दौरान उत्तरी, मध्य और पूर्वी भारत में लू चलना काफी आम है। लेकिन अब इस बात के बहुत से सबूत मौजूद हैं, कि जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी की लहरें लगातार, कठोर और लंबे समय तक चलने वाली होती जा रही हैं।
पिछले साल, देश के कई हिस्सों में फरवरी महीने में ही लू की स्थिति का अनुभव हुआ था, जो तकनीकी रूप से भारत के लिए सर्दियों का महीना था। अधिकतम तापमान सामान्य से 5 से 11 डिग्री ज्यादा दर्ज किया गया, जो आसानी से हीटवेव के मानदंडों को पूरा करता था।
इसने भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) को परेशानी में डाल दिया, क्योंकि लू की घोषणा अभी तक सिर्फ अप्रैल-जुलाई अवधि में ही की जाती रही है। पिछले साल पूरे देश में फरवरी का औसत तापमान सामान्य से 1.36 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था, जिससे यह भारत में अब तक का दूसरा सबसे गर्म फरवरी रहा। वर्ष 2023 भी भारत के लिए अब तक का दूसरा सबसे गर्म वर्ष साबित हुआ।
इस साल हीटवेभ और भी ज्यादा खतरनाक
वहीं, इस वर्ष लू का पूर्वानुमान सबसे ज्यादा गंभीर था। गर्मियों की शुरुआत में हीटवेव ज्यादा लंबे समय तक चलने की संभावना थी, जो सामान्य 4 से 8 दिनों के बजाय कुछ स्थानों पर 10 से 20 दिनों का रिकॉर्ड किया गया है। अमेरिका स्थित जलवायु अनुसंधान संगठन क्लाइमेट सेंट्रल के एक विश्लेषण में कहा गया है, कि अप्रैल में ओडिशा में 18 दिनों की हीटवेव दर्ज की गई है, जो राज्य के लिए अब तक की दूसरी सबसे लंबी अवधि है। विश्लेषण में कहा गया है कि गंगीय पश्चिम बंगाल में पिछले 15 वर्षों में किसी भी महीने में सबसे ज्यादा गर्मी वाले दिन दर्ज किए गए हैं। और पूर्वी भारत में अब तक का सबसे गर्म अप्रैल दर्ज किया गया है।
मंगलवार को, आईएमडी ने कहा कि गुरुवार से उत्तर पश्चिम भारत में गर्म हवाओं का एक नया दौर शुरू होने की संभावना है।
लू का प्रभाव
लंबे समय तक गर्मी के संपर्क में रहने से निर्जलीकरण और हृदय और श्वसन संबंधी बीमारियां हो सकती हैं, और शरीर में कमज़ोरियां बढ़ सकती हैं, यहाँ तक कि अचानक मृत्यु भी हो सकती है।
भारत में अत्यधिक गर्मी के कारण होने वाली बीमारियों और मौतों का डेटा अच्छी तरह तैयार नहीं किया जाता है। जबकि, इन आंकड़ों को एकत्र करने और संकलित करने का प्रयास लगभग एक दशक पहले ही शुरू हुआ था। लेकिन विश्वसनीय आंकड़े अभी भी उपलब्ध नहीं हैं, और आईएमडी, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए), एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम या राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) जैसी विभिन्न एजेंसियों की तरफ से जो आंकड़े जारी किए जाते हैं, उनमें काफी अंतर होते हैं।
उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले साल संसद में एक प्रश्न के उत्तर में कहा था, कि उसके पास 2022 में गर्मी से संबंधित केवल 33 मौतों की जानकारी है। लेकिन एनसीआरबी, जो प्राकृतिक वजहों से होने वाली मौतों की जानकारी रखता है, उसने गर्मी की वजह से हुई आकस्मिक मौतों की संख्या साल 2022 में 730 बताया। इन दोनों आंकड़ों में आकाश-पाताल का अंतर है।
जबकि, उसी उत्तर में, स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2023 के पहले छह महीनों में गर्मी से संबंधित 264 मौतों की सूचना दी।
आईएमडी और एनडीएमए के आंकड़ों से पता चला है, कि जब से राज्य सरकारों और जिला प्रशासनों ने गर्मी को लेकर कार्य योजनाओं को लागू करना शुरू किया है, तब से गर्मी से संबंधित मौतों की संख्या में भारी गिरावट आई है।
हीटवेव के प्रति संवेदनशील माने जाने वाले सभी 23 राज्यों में अब प्रतिकूल प्रभावों को प्रबंधित करने के लिए हीट एक्शन योजनाएं हैं। सार्वजनिक स्थानों पर ठंडे पेयजल की व्यवस्था, ओरल रिहाइड्रेशन समाधानों का मुफ्त वितरण, पीक आवर्स के दौरान स्कूलों और कॉलेजों को बंद करना और पार्कों और अन्य छायादार स्थानों की संख्या बढ़ाना शामिल है। इन योजनाओं से निश्चित तौर पर होने वाली मौतों की संख्या में कमी आई है।
लेकिन, अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है, खासकर इसलिए, क्योंकि गर्म हवाएं अब ज्यादा दिनों तक चलने वाली हैं और उसकी स्थिति और खतरनाक होने वाली है। लिहाजा, जलवायु परिवर्तन के प्रकोप को कम करने के लिए कई कदम उठाने होंगे, खासकर भारी संख्या में पेड़ लगाने की जरूरत है, अन्यथा आने वाले साल विकराल हो सकते हैं।
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