इजरायल-हमास युद्ध से चीन का प्लान हुआ फेल, क्या अमेरिका की तरह ड्रैगन भी मिडिल ईस्ट में फंस गया?

इजराइल-हमास के बीच जारी जंग ने पूरी दुनिया को दो खेमे में बांट दिया है। ऐसे में न सिर्फ अमेरिका इस जंग में उलझ गया है बल्कि चीन भी इस युद्ध से काफी प्रभावित होता नजर आ रहा है।

इस साल की शुरुआत में चीन ने शिया देश ईरान और सुन्नी देश सऊदी अरब के बीच चली आ रही पुरानी राजनयिक दरार को खत्म कर दोनों देशों की बीच सामान्य संबंधों स्थापित करने में मदद की थी।

Israel-Hamas war upend China

अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशियाई देशों के प्रमुख आर्थिक भागीदार और सऊदी और ईरानी तेल दोनों के खरीदार के रूप में चीन को आर्थिक लाभ की उम्मीद थी।

यहां तक कि चीन ने तो शांति वार्ता के लिए इजराइल और फ़िलिस्तीन के बीच मध्यस्थता की भी पेशकश की थी और मई में एक ही समय में अलग-अलग यात्राओं पर फिलिस्तीनी प्राधिकरण के अध्यक्ष महमूद अब्बास और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मेजबानी की।

ऐसा प्रतीत होता है कि बीजिंग खुद को अमेरिका के विकल्प के रूप में पेश करने के लिए तैयार है, लेकिन अब इजराइल-हमास युद्ध मिडिल ईस्ट में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में चीन की महत्वाकांक्षाओं के लिए चुनौती बन रहा है।

संघर्ष के दोनों पक्षों में बीजिंग के हित हैं। चीन ने लंबे समय से दो-राज्य समाधान की वकालत की है और यहां तक कि 1960 और 1970 के दशक में फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को भी हथियारों से मदद की है। इसके साथ ही चीन, इजराइल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार भी है।

इससे पहले शुक्रवार (27 अक्टूबर) को चीन, 119 अन्य देशों के साथ शामिल हो गया, जिन्होंने मानवीय संघर्ष विराम के आह्वान वाले गैर-बाध्यकारी संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया था।

फिर भी, चीन अब तक बड़े पैमाने पर तटस्थ बना रहा है और सऊदी-ईरान के बीच शांति स्थापित करने में निभाई गई उसी प्रमुख भूमिका से बच रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से चीन ने एक तटस्थ रेखा खींची है और संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान का आह्वान करता रहा है।

अब सवाल यह है कि आखिर चीन युद्ध को लेकर तटस्थ क्यों बना हुआ है। दरअसल, इस स्थिति में किसी का पक्ष न लेना चीन के दीर्घकालिक क्षेत्रीय हित में है। इस क्षेत्र में चीन के मजबूत आर्थिक हित हैं और यदि मौजूदा युद्ध में अन्य खिलाड़ी शामिल होते हैं तो वे प्रभावित होंगे।

सऊदी अरब, इराक और ईरान से चीन पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा आयात करता है। वहीं, 2021 में इजराइल के साथ चीन का व्यापार 18 बिलियन डॉलर का रहा। चीन को अगर महान शक्ति के रूप में दिखना है, तो वह एक पक्ष को दूसरे के खिलाफ नहीं चुन सकता है।

जाहिर है कि वैश्विक मंच पर बीजिंग की स्थिति दांव पर है। यह चीन को इजराइल के साथ अपने संबंधों को खतरे में डालकर भी तटस्थ रहने के लिए प्रोत्साहित करता है। इसीलिए चीन ऐसे बयान देता है कि वह नागरिकों के खिलाफ सभी हमलों के खिलाफ है। ऐसा कर वह एक साथ हमास और इज़राइल दोनों की आलोचना करता दिखाई देता है।

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