नेपाल आम चुनाव को कैसे प्रभावित कर रहा है चीन, अगर इस बार जीता, तो भारत की होगी बड़ी 'हार'
नेपाल की सत्ता पूरी तरह से कम्युनिस्ट पार्टियों के हाथ में आ जाए और दूसरी पार्टियों का राजनीतिक वजूद ही मिट जाए, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सबसे बड़ी कोशिश यही है।
Nepal Election 2022: नेपाल में 20 नवंबर को होने वाले लोकसभा और 7 प्रांतों के विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी काफी तेज है, लेकिन इन सबके बीच चीन ने नेपाल चुनाव को प्रभावित करने और अपनी पसंद की सरकार बनाने के लिए नेपाल की अंदरूनी राजनीति में प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल चुनाव में चीन का हस्तक्षेप लगातार बढ़ता जा रहा है, लिहाजा इस महीने होने वाले चुनाव से पहले, नेपाल के लोकतंत्र को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। पहली चुनौती इसका अपना गुटवाद है, जबकि दूसरी चुनौती नेपाल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का बढ़ता प्रभाव है।

नेपाल में प्रभाव बढ़ा रहा है चीन
एशिया-पैसिफिक फाउंडेशन के सीनियर रिसर्च फेलो मार्कस एंड्रियोपोलोस ने फॉरेन पॉलिसी में लिखे अपने लेख में लिखा है कि, चीन नेपाल की घरेलू राजनीति में तेजी से घुसता जा रहा है। साल 2008 में लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के बाद से नेपाल में अभी तक 10 बार प्रधानमंत्री बदल चुके और 14 सालों के लोकतांत्रिक गणराज्य में अभी तक एक बार भी स्थिर सरकार का गठन नहीं हो पाया है, जो अपना कार्यकाल पूरा करे। वहीं, अब 20 नवंबर को नेपाल के लोग 11वीं बार सरकार का गठन करने के लिए मतदान करेंगे, लेकिन, गठबंधनों के निरंतर गठन और फिर उनके टूटने से नेपाल की राजनीति काफी प्रभावित होती रही है और नेपाली मतदाताओं का मन चुनाव से भंग होता रहा है। भौगोलिक आधार पर नेपाल चीन से भी जुड़ा हुआ है, लेकिन अगर नेपाल चीन की राजनीति से जुड़ता है, तो उसके लोकतंत्र का संक्रमण होना तय है। लेकिन, हाल के वर्षों में ये संबंध तेजी से विकसित हुए हैं, जिसे नेपाल के अंदर के लोग काठमांडू के राजनीतिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप के रूप में वर्णित करते हैं।

नेपाल को चीन क्यों मानता है जरूरी?
चीन के दक्षिण एशिया में अपना वर्चस्व स्थापित करने के प्लान में नेपाल सबसे अव्वल स्थान पर है, लिहाजा चीन की कोशिश नेपाल की राजनीतिक को नियंत्रित करने की रही है, लिहाजा नेपाल में इस बार होने वाला चुनाव या तो बीजिंग की नेपाल पॉलिसी को हमेशा के लिए खत्म कर सकता है, या फिर नेपाल उसके लिए रणनीतिक अड्डा बन सकता है। शी जिनपिंग भी लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति बन चुके हैं, लिहाजा अपने तीसरे कार्यक्रम में पूरी आशंका है, कि वो आक्रामक विदेश नीति के तहत आगे बढ़ेंगे, तो फिर भारत को ध्यान में रखते हुए चीन चाहेगा, कि वो इसी लोकसभा चुनाव परिणाम को अपने नियंत्रण में लाए। हालांकि, चीन के लिए मुश्किल ये है, कि नेपाल की दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां एक दूसरे खिलाफ चुनावी मैदान मे हैं और नेपाल में सत्ताधारी कांग्रेस गठबंधन भारत के करीब है।

नेपाल में वामपंथ कितना मजबूत?
नेपाल की राजनीति में वामपंथी और साम्यवादी विचारधाराएं 20वीं शताब्दी के मध्य से ही मौजूद हैं और इन विचारधाराओं ने अपनी पैठ भी बनाई है। नेपाल में कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए सहानुभूति 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत तक तेजी से जारी रही, जिसकी वजह से नेपाल में बड़े पैमाने पर माओवादी विद्रोह हुए और उसे तेजी से समर्थन भी मिलता रहा, जिसकी वजह से नेपाल में राजशाही का अंत हुआ और आखिरकार राजा ज्ञानेंद्र शाह के शासन का अंत हो गया। लेकिन, वामपंथी पार्टियों ने सत्ता में आने के बाद चीन के साथ अपने संबंधों को विस्तार देने के अलावा देश के विकास के लिए कोई काम नहीं किया। लिहाजा, वामपंथ की पोल लोगों के बीच खुलने लगी और आज सभी प्रमुख नेपाली राजनीतिक दल खुद को लोकतांत्रिक समाजवाद के प्रस्तावक के रूप में देखते हैं। चूंकि नेपाल ने लोकतंत्र को अपनाया है, लिहाजा चायनीज कम्युनिस्ट पार्टी ने नेपाल में कुछ कम्युनिस्ट गुटों के साथ संबंधों को मजबूत कर फायदा उठाने की कोशिश की है, ताकि वो नेपाल की विदेश नीति को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सके और उसी का एक उदाहरण भारत के तीन क्षेत्रों को नेपाली मानचित्र में शामिल करना और उसे संसद में पास कराना शामिल है। ये काम सत्ता में रहते हुए नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों ने किया था।

चीन कैसे कर रहा नेपाल में हस्तक्षेप?
नेपाल की सत्ता पूरी तरह से कम्युनिस्ट पार्टियों के हाथ में आ जाए और दूसरी पार्टियों का राजनीतिक वजूद ही मिट जाए, इसके लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने नेपाल में एक संयुक्त वामपंथी पार्टी के गठन के लिए जोर दिया है, और इसके लिए चीन की तरफ से वामपंथी पार्टियों को कई तरह के लालच भी दिए गये और नेपाल को चीन का पूरा समर्थन देने का वादा भी किया गया। एंड्रियोपोलोस ने कहा कि, चीन की कोशिश नेपाल में भी चीन की तरह ही शासन का निर्माण करना है, ताकि नेपाल में भी सिर्फ एक कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी रहे, बाकि पार्टियां खत्म हो जाएं और नेपाल के सारे संस्थान कम्युनिस्ट पार्टी के अधीन आ जाएं। वहीं, चीन की कोशिश नेपाल के फ्री प्रेस को खत्म करने की है, ताकि चायनीज कम्युनिस्ट पार्टी की मशीन नेपाल को चीन के हितों की सेवा करने वाला एक संगठन बना दे। हालांकि, नेपाल की प्रमुख वामपंथी विचारधारा ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के लिए अपने दिल के दरवाजे तो खोल रखे हैं, लेकिन इसके राजनयिक गठबंधन दलों के बीच जारी विभाजन हैरान करने वाला है। लिहाजा, वामपंथी पार्टियां एकजुट नहीं हो पाती हैं।

क्यों नहीं हो रहा वामपंथी पार्टियों का गठबंधन?
साल 2017 में नेपाल में हुए लोकसभा चुनाव में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) ने घोषणा की थी, कि वे उस आम चुनाव में गठबंधन के तौर पर एक साथ चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में कई विश्लेषकों को संदेह था, कि चीन ने इनके विलय में भूमिका निभाई है। फिर दोनों वामपंथी पार्टियों ने मिलकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया और फिर साल 2018 में सत्ता संभाली थी, लेकिन 2021 तक इनका गठबंधन टूट गया। जिसके बाद माओवादियों ने नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन कर नई सरकार का गठन कर लिया और उसने नेपाल की प्रमुख वामपंथी पार्टी पर अवसरवादी होने का आरोप लगााया था। नेपाल में अपनी महत्वाकांक्षाओं को हासिल करने के लिए चीन उस पार्टी को प्राथमिकता देने की बात करता है, जो चायनीज कम्युनिस्ट पार्टी की तरह हो। लेकिन, चीन की ये कोशिश कामयाब नहीं हो पाई और नेपाल में बनी कांग्रेस की सरकार ने उसकी बेल्ड एंड रोड इनिशिएटिव का प्रोजेक्ट नेपाल में रोक दिया, जिसपर नेपाल ने साल 2017 में दस्तखत किए थे। इसके साथ ही अब नेपाल में आवाज उठने लगे हैं, कि चीन से लिया गया कर्ज देश की बर्बादी का कारण बन सकता है, लिहाजा नेपाल के लोग अब चीन के खिलाफ लिखने और बोलने भी लगे हैं, जिससे वामपंथी पार्टियों पर दबाव आया है।

चीन को लेकर सतर्क भी है नेपाल?
नेपाल की एक मानसिकता हमेशा से रही है, कि भारत को छोड़कर अगर किसी दूसरे देश की कोई कंपनी निवेश करना चाहती है, तो उसे शक की निगाह से देखा जाता है और नेपाली लोग की आम राय यही होती है, की कहीं ये कंपनी देश पर कब्जा ना कर ले। ऐसे में चीन, जो अपनी कर्ज देने की नीति के लिए कुख्यात है, उसे लेकर नेपाल के लोगों में डर तो है ही। लिहाजा, चीन के साथ बीआरई प्रोजेक्ट के लिए समझौता करने के बाद भी नेपाल बाद में उससे मुकर गया। चीनी कर्ज को लेकर नेपाली संसद में चिंता है और ये चिंता नेपाल की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के नेताओं में भी है। फॉरेन पॉलिसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल के पोखरा में बनने वाले इंटरनेशनल एयरपोर्ट के उद्घाटन में बार बार देरी की वजह चीन की कर्ज देने की नीति ही थी।

चीन के साथ अब कैसे हैं नेपाल के संबंध?
निश्चित तौर पर नेपाल के अपने पाले में आने से चीन को जियो-पॉलिटिक्स में काफी फायदा पहुंचेगा और भारत पर वो काफी प्रेशर बना सकता है। वहीं, नेपाल और चीन के बीच गहरे संबंधों ने पहले ही संयुक्त राष्ट्र में एकजुटता का एक मजबूत प्रदर्शन किया है, जब साल 2021 में चीन के शिनजियांग, स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत और हांगकांग में चीन के नीति का नेपाल ने खुला समर्थन कर दिया था, जो भारत के लिए परेशान करने वाला था। एंड्रियोपोलोस ने कहा कि, अगर नेपाल में चीन की मनपसंद कम्युनिस्ट सरकार का गठन हो जाता है, तो फिर तिब्बत के स्वतंत्र होने की सारी उम्मीदें हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी। साल 2019 में नेपाल ने ताइवान पर चीन का साफ समर्थन कर दिया था, लेकिन उस वक्त नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली थे, जो चीन के सबसे बड़े समर्थकों में से एक हैं।

मोदी सरकार की चीन पर नजर?
फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि बीजिंग काठमांडू में एक संयुक्त वामपंथी पार्टी को सत्ता में लाने के लिए दबाव डालता है, तो यह दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देगा और ताइवान के साथ युद्ध की स्थिति में चीन की वैश्विक प्रतिष्ठा को मजबूत करेगा। लिहाजा, इस महीने 20 नवंबर को होने वाले चुनाव से पहले चीन नेपाली लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न कर रहा है, लिहाजा कुछ एक्सपर्ट का मानना है, कि नेपाल पर भारत को भी गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। हालांकि, पीएम मोदी अपने आठ साल के शासनकाल में 6 बार नेपाली प्रधानमंत्रियों से मुलाकात कर चुके हैं, लिहाजा एक्सपर्ट्स का मानना है, कि मोदी सरकार की नजर नेपाल पर जरूर होगी।
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