आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सबसे कमजोर कड़ी कनाडा, पेंटागन के पूर्व अधिकारी ने की ग्रे लिस्ट में डालने की मांग

Canada Khalistan News: खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को भारत से जोड़कर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो बुरी तरह से फंस गये हैं, क्योंकि भारत के साथ लगातार बढ़ते तनाव के बीच, अब दुनियाभर के पत्रकारों मे कनाडा और खालिस्तानी आतंकवादियों की पड़ताल करनी शुरू कर दी है।

अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों ने आतंकवाद के खिलाफ कनाडा की लड़ाई की जांच करने के साथ साथ खालिस्तानियों के पुराने वीडियो और बयानों को ट्विटर पर शेयर करना शुरू कर दिया है, जिसमें वो भारत के खिलाफ नफरती शब्दों और हिन्दुओं के नरसंहार की बातें कर रहे हैं। उन वीडियोज में जस्टिन ट्रूडो की पार्टी को समर्थन देने वाले जगमीत सिंह का भी नाम शामिल है, जिसका 2016 से 2018 के दौरान दिए गये हिंसक बयानों का वीडियो वायरल हो रहा है और पत्रकार, ट्विटर पर जस्टिन ट्रूडो से जवाब मांग रहे हैं।

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पेंटागन के पूर्व अधिकारी और अमेरिकन एंटरप्राइजेज इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो माइकल रुबिन ने कनाडा को ग्रे लिस्ट में डालने की मांग की है। उन्होंने कनाडा को लेकर सख्त ट्वीट किए हैं और अपने लिखे एक आर्टिकिल में उन्होंने बताया है, कि किस तरह से कनाडा आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कमजोर कड़ी साबित हो रहा है।

माइकल रुबिन ने भारत कनाडा विवाद पर सख्त बयान देते हुए कहा है, कि 'हरदीप सिंह निज्जर कोई शरीफ आदमी नहीं था। उसके हाथों पर खून लगा है और वह कई हमलों में शामिल रहा। हरदीप सिंह निज्जर भी वैसे ही प्लंबर था, जैसे ओसामा बिन लादेन कंस्ट्रक्शन इंजीनियर था।"

इसके अलावा, माइकल रूबीन ने 9fortyfive की एक रिसर्च रिपोर्ट में दावा किया गया है, कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कनाडा सबसे कमजोर कड़ी साबित हुआ है।

19fortyfive में लिखे गये अपने आर्टिकिल में उन्होंने कहा है, कि कनाडा के कथित करिश्माई युवा प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रूडो अपनी एक प्रगतिशील छवि बनाना चाहते हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने उन्हें "उदारवादी राजनीति का दुनिया का सुनहरा लड़का" बताया है, जबकि इस बात पर अफसोस किया जा सकता है, कि एक भ्रष्टाचार घोटाले ने उनकी "रॉक-स्टार लोकप्रियता" को धूमिल कर दिया है।

हालांकि, उनका अधिकांश प्रगतिशील पहलू 'पहचान की राजनीति' को अपनाने पर टिका हुआ है। और, जैसा कि अक्सर होता है जब जातीय लॉबी, व्यक्तियों पर हावी हो जाती है, तो कट्टरपंथ जीत जाता है, जबकि मूक बहुमत हार जाता है।

कनाडा में एक बड़ी सिख आबादी है, जिनमें से ज्यादातर बड़े कनाडाई समुदाय में एकीकृत होते हुए शांतिपूर्वक अपने धर्म का पालन करना चाहते हैं। यह सामान्य है। दुनिया भर में, सिख अपने पड़ोसियों के साथ शांति से रहते हैं। लेकिन, कनाडा में सिखों के एक वर्ग ने अशांति कायम कर दी है।

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कनाडा में सिख आबादी के बीच फैला खतरा

कनाडा में खालिस्तानी अभियान और ज्यादा खतरनाक हो गया है। खालिस्तानी आतंकवादी हिंसा की धमकी देकर नियमित रूप से सिख व्यापारिक समुदाय के बीच भी धन की उगाही करते हैं। उनकी रणनीति वही दर्शाती है, जो कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) और तमिल टाइगर्स ने 1980 और 1990 के दशक में यूरोप में कुर्द और तमिल प्रवासी लोगों के बीच किया था।

19fortyfive की रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है, कि अंतर यह है, कि जहां यूरोपीय पुलिस जातीय समुदायों के खिलाफ हिंसा की धमकी देने वाले आतंकवादी समूहों से जबरन वसूली पर रोक लगाने की कोशिश कर रही है, वहीं, जस्टिन ट्रूडो की सरकार आंखें मूंद कर बैठी हुई है।

19fortyfive के कंट्रीब्यूटिंग एडिटर माइकल रूबीन, जो अमेरिकन एंटरप्राइजेज इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो भी हैं, उनका कहना है, कि कनाडा में खालिस्तानियों की ये उगाही, अब चरम पर पहुंच गया है, क्योंकि खालिस्तानी कट्टरपंथी भारत के अंदर एक अलग राष्ट्र-राज्य बनाने के लिए समर्थन का सुझाव देने के लिए जनमत संग्रह की एक श्रृंखला आयोजित कर रहे हैं।

उन्होंन आर्टिकिल में लिखा है, कि "कनाडा में, यह भारत-विरोधी, हिंदू-विरोधी और सिख-विरोधी घृणा अपराधों में वृद्धि के साथ मेल खाता है। ट्रूडो की निष्क्रियता कनाडा के खालिस्तानी अलगाववादी समूहों को आतंकवादी संस्थाओं के रूप में नामित करने की भी अनदेखी करती है।"

खालिस्तान को आतंकवादी संगठन क्यों नहीं मानता अमेरिका?

माइकल रूबीन का कहना है, कि संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए, कनाडा में होने वाली ऐसी गतिविधियां बहुत दूर लग सकती हैं। चूंकि "खालिस्तान" आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में नहीं आता है, जिस तरह से इस्लामिक स्टेट और अल कायदा जैसे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों द्वारा आतंकवाद को बढ़ावा दिया जाता है, इसलिए इसे नजरअंदाज करना भी आसान लग सकता है। लेकिन, यह एक बड़ी गलती होगी।

उन्होंने चेतावनी के लहजे में लिखा है, कि कट्टरपंथ को उकसाना आसान है, लेकिन एक बार जड़ें जमाने के बाद उसे मिटाना लगभग असंभव है।

उन्होंने लिखा है, कि 1970 के दशक में शुरू हुए इस्लामी चरमपंथ के सऊदी और पाकिस्तानी उकसावे की कीमत दुनिया को आज भी चुकानी पड़ रही है। लाखों लोगों की संख्या वाले दूसरे समूह को भड़काने के प्रयासों को नजरअंदाज करना गैर-जिम्मेदाराना है, खासकर जब इस तरह के उकसावे का मूल किसी विदेशी खुफिया सेवा की निंदक नीतियों में निहित हो, तो यह नैतिक और रणनीतिक कदाचार है।

दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा

माइकल रूबीन ने चेतावनी देते हुए लिखा है, कि "यदि जस्टिन ट्रूडो, सिख समुदाय के सबसे चरम तत्वों को समायोजित करना जारी रखते हैं और राजनीतिक कारणों से, उनके आतंकी वित्तपोषण को नजरअंदाज करते हैं, तो वह न केवल कनाडा को नुकसान पहुंचाएंगे, बल्कि वह इसे एक दायित्व बना देंगे।"

उन्होंने मांग की है, कि जस्टिन ट्रूडो को चाहिए, कि कनाडा के नैतिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए आईएसआई और पंजाब में उसके कुत्सित प्रयासों को नाकाम करना चाहिए, जो उसने कश्मीर में करने की कोशिश की और करने में विफल रहा।

उन्होंने लिखा है, कि "हालांकि, खालिस्तानी चरमपंथी आतंकी वित्त का मुकाबला करने में कनाडा की गंभीरता की कमी को देखते हुए, कनाडा के इस पड़ोसी को ग्रे-लिस्ट में डालने का समय आ गया है।"

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