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चीन की अर्थव्यवस्था पर चली भारत-US की लाठी, पहले साल ही व्यापार का हुआ बुरा हाल.. जिनपिंग की निकली हेकड़ी?

China Economy News: तीन महीने पहले ऐसा लग रहा था, कि कोविड महामारी के बाद जब दुनिया भर के बाजार खुले, तो चीन की अर्थव्यवस्था भी धीरे धीरे पटरी पर आने लगी है। चीन में उपभोक्ताओं ने खर्च करना शुरू कर दिया है, निर्यात फिर से बढ़ने लगा है और यहां तक, कि चीन का संकटग्रस्त आवास सेक्टर भी स्थिर होने लगा है।

लेकिन, वो एक बहुत बड़ा भ्रम था। तीन महीने के बाद की स्थिति पूरी तरह से अलग है। सोमवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों से पता चला है, कि चीन की अर्थव्यवस्था में वृद्धि की वार्षिक गति, वसंत ऋतु में घटकर 3% से कुछ ही ज्यादा रह गई है, जो शी जिनपिंग सरकार के लक्ष्य से काफी कम है।

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अब लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था ने वरिष्ठ चीनी अधिकारियों को विदेशों में जियो-पॉलिटिकल प्रतिद्वंद्वियों के साथ डिप्लोमेटिक बातचीत में शामिल होने और घरेलू स्तर पर आर्थिक नीति पर अधिक खुलापन दिखाने के लिए मजबूर किया है। एक मशहूर कहावत है, कि चीन में उसी वक्त तक विद्रोह नहीं हुआ है, जब तक वहां की अर्थव्यवस्था ठीक है, जिस दिन वहां की इकोनॉमी बिगड़ी, वहां के कम्युनिस्ट शासन का अंत हो जाएगा। और भारत और अमेरिका, चीन की इकोनॉमी पर ही लाठी चला रहे हैं।

चीन के बदलने लगे तेवर

चीन की अर्थव्यवस्था में आने वाली गिरावट की वजह से अमेरिका साथ उसकी बातचीत में आने वाले बदलाव को साफ साफ महसूस किया जा रहा है। चीन के तेवर बदल गये हैं और आवाज में नरमी आनी शुरू हो गई है।

हालांकि, कई सालों से चली आ रही राजनीतिक प्रतिद्वंदिता की वजह से अमेरिका और चीन कारोबार के मोर्चे पर आपस में बुरी तरह से उलझे हुए हैं, और चीन के लिए अमेरिका से पंगा लेना आसान नहीं है, ये अब चीन को समझ में आई है। यही दोनों देश मिलकर वैश्विक उत्पादन का 40 प्रतिशत निर्माण करते हैं।

पिछले महीने में, चीन ने राजधानी बीजिंग में तीन वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों का रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत किया है, जिनमें राष्ट्रपति जो बाइडेन के जलवायु दूत जॉन केरी, अमेरिका की वित्त मंत्री जेनेट येलेन और अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन शामिल हैं।

इन अधिकारियों की चीनी अधिकारियों के साथ घंटों की बातचीत की गई है। वहीं, आने वाले हफ्तों में तीन चीनी मंत्रियों के वाशिंगटन की यात्रा करने की उम्मीद है, क्योंकि दोनों देशों ने जलवायु परिवर्तन से लेकर सैन्य मुद्दों तक, हर चीज पर चर्चा शुरू कर दी है। इसी चीन ने इस साल की शुरूआत में कहा था, कि वो अमेरिका के साथ सैन्य मुद्दे पर एक शब्द भी बात नहीं करेगा।

कई सालों के बाद चीन का भारत से व्यापार घट गया है, जबकि यूरोप के साथ भी उसके कारोबार में कमी आई है। स्थिति ये है, कि चीन में बने सामानों की बिक्री नहीं हो रही है, जिससे चीन में महंगाई दर में भारी गिरावट आई है और सामान के दाम इतने सस्ते हो गये हैं, कि कंपनियों के लिए उत्पादन खर्च तक निकालना संभव नहीं हो पा रहा है।

लिहाजा, जो चीनी सरकार घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार जगत के नेताओं पर आक्रामक रही है, उसके तेवर अब ढीले पड़ चुके हैं और चीनी अधिकारियों के मुंह से नरम शब्दों का प्रवाह निकलते देखा जा रहा है।

इसी का नतीजा है, कि चायना डेवलपमेंट फोरम ने पिछले महीने तियानजिन में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक के दौरान, देश के प्रधानमंत्री ली कियांग ने, व्यक्तिगत आश्वासन दिया, कि चीन व्यापार के लिए खुला है।

प्रधानमंत्री ली कियांग ने बुधवार को चीन में चलने वाली बड़ी तकनीकी कंपनियों के अधिकारियों से मुलाकात की है और उन्हें अधिक कर्मचारियों को काम पर रखने के लिए प्रोत्साहित किया है, ताकि देश में रोजगार को बढ़ाया जा सके।

इन घटनाओं से सीधा संकेत मिलता है, कि चीन की अत्यधिक नियंत्रित और आक्रामक राजनीतिक व्यवस्था को आर्थिक मोर्चे पर प्रहार कर उसके तेवर को तोड़ा जा सकता है।

चीन ने अब अमेरिका के साथ साथ वैश्विक निवेशकों को भी बैठक के लिए बुलाया है, जिसकी अध्यक्षता चीन के प्रधानमंत्री करने वाले हैं, इस बैठक में वैश्विक निवेशकों से चीन में निवेश में आ रही बाधाओं को समझा जाएगा और उनका समधाना करने की कोशिश की जाएगी। चीन के इतिहास ये पहली बार ऐसी बैठक हो रही है, जब निवेशकों से चीन में निवेश को लेकर उनकी समस्याओं को जाना जाएगा।

ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि अमेरिका के साथ तनाव की वजह से ज्यादातर निवेशक चीन में निवेश करना जोखिम मानने लगे हैं और अमेरिका के साथ साथ यूरोपीय निवेश चीन से अपना निवेश निकालने में लग गये हैं।

चीन की अर्थव्यवस्था, जो मैन्युफैक्चरिंग पर निर्भर है, वहां से अगर निवेश निकलता है, तो कम्युनिस्ट सरकार परेशानियों में घिर जाएगी।

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डिप्लोमेसी पर झुका हुआ दिख रहा चीन

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, वाशिंगटन में सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के चीन मामलों के विशेषज्ञ स्कॉट कैनेडी ने कहा, कि "चीन क्या फैसला करने वाला है, ये पहले जितना रहस्यमयी था, वो अभी भी उतना ही रहस्यमयी है, लेकिन चीन की आर्थिक कमजोरी ने स्पष्ट किया है, कि इससे चीन की विदेश नीति में नरमी लाई जा सकती है, यहां तक की, चीन के नेता भी इस बात को मानने लगे हैं, कि तनकर रहना नुकसानदेह हो सकता है।"

हालांकि, विश्लेषकों का कहना है, कि चीन की डिप्लोमेटिक भाषा में आई नरमी आर्थिक और व्यावसायिक नीतियों तक ही सीमित है, उसमें चीन का राष्ट्रीय सुरक्षा या चीन की आक्रामकता शामिल नहीं है। चीन अपनी आक्रामकता को ऐसे ही रखेगा।

लेकिन, कुछ विश्लेषकों का मानना है, कि अगर अर्थव्यवस्था की गति में आई गिरावट से चीन झुक सकता है, तो अगर अर्थव्यवस्था पर गहरो चोट किया जाए, तो फिर चीन की आक्रामकता को भी तोड़ा जा सकता है।

विश्लेषकों के मुताबिक, चीन की भाषा में आई नरमी से, ऐसे कुछ संकेत मिले हैं, कि शीर्ष नेता शी जिनपिंग ने संयुक्त राज्य अमेरिका को लेकर एक व्यापक नीति में बदलाव का समर्थन किया है, एक ऐसा कदम जो किसी भी बदलाव को जड़ से उखाड़ने के लिए आवश्यक होगा।

चीन पर और आर्थिक प्रहार की जरूरत

शनिवार को चीन ने घोषणा की है, कि वह जापान सागर में रूसी सेना के साथ संयुक्त नौसेना और वायु सेना अभ्यास करेगा।

चीन की आधिकारिक शिन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार, शी जिनपिंग ने खुद 6 जुलाई को एक भाषण दिया था, जिसमें सेना से युद्ध की तैयारी को 'नये स्तर' पर ले जाने के लिए कहा था। इस भाषण में चेतावनी दी गई थी, कि "चीन की सुरक्षा स्थिति, बढ़ती अस्थिरता और अनिश्चितता का सामना कर रही है"।

चीन ने इस महीने भी ऐसे कदम उठाए हैं, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक विश्वसनीय कड़ी के रूप में उसकी प्रतिष्ठा को कमजोर कर सकते हैं।

चीन ने इस महीने सेमिकंडक्टर्स बनाने के लिए आवश्यक दुर्लभ धातुओं के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, इस कदम को चीन के प्रतिशोध के तौर पर देखा जा रहा है।

चीन-अमेरिकी संबंधों में विशेषज्ञता रखने वाली कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की राजनीतिक वैज्ञानिक जेसिका चेन वीस ने कहा, कि "घरेलू जोखिम कम्युनिस्ट पार्टी के लिए प्राथमिक हैं, इसलिए वह ज्यादा जोखिम लेना नहीं चाह रहे हैं।" उन्होंने आगे जोड़ा, कि "लेकिन अगर उसे मुक्का मारा जाता है, तो वह भी जवाब में मुक्का ही मारेगा।"

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग ने सोमवार को विदेश मंत्रालय की दैनिक ब्रीफिंग में कहा, कि चीन की आर्थिक शक्ति कम नहीं हुई है और दुनिया भर के देशों के साथ उसके संबंधों के विकास में कोई बदलाव नहीं आया है।

उन्होंने कहा, "हमें यह भी उम्मीद है, कि अमेरिकी पक्ष द्विपक्षीय संबंधों को स्वस्थ और स्थिर विकास की राह पर वापस लाने के लिए चीन के साथ काम कर सकता है।"

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चीन की इकोनॉमी को दुनिया की जरूरत

नये व्यापारिक आंकड़ों से पता चलता है, कि गहराते जियो-पॉलिटिकल तनाव से चीन के व्यापार पर गंभीर असर का पड़ना शुरू हो चुका है। चीन में आवास की कीमतों में भारी गिरावट आ चुकी है और पिछले महीने भी हाउसिंग सेक्टर सूचकांक में रिकॉर्ड गिरावट देखी गई है।

चीन की अर्थव्यवस्था, जो पूरी तरह से निर्यात पर निर्भर है, उसमें तेज गिरावट होनी शुरू हो गई है।

चीन में निवेश की तस्वीर धुंधली हो गई है।

खासकर, अमेरिकी कंपनियों ने शिकायत की है, कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर चीनी सरकार के फोकस के बीच चीन में कारोबार करना और मुश्किल हो गया है। अधिकारियों ने फर्मों पर छापे मारे हैं और कर्मचारियों को हिरासत में लिया है। चीन की कंपनियों के अमेरिकी कंपनियों से होने वाले कारोबार पर सख्त जांच की जाती है।

आर्थिक तौर पर चीन का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। चीन की करोड़ों नौकरियां, वैश्विक व्यापार पर निर्भर हैं। चीन, दुनिया के देशों से जितना सामान खरीदता है, उससे तीन गुना ज्यादा सामान बेचता है, लिहाजा अगर चीन के निर्यात को ब्लॉक किया जाता है, तो उसकी अर्थव्यवस्था ही ढह सकती है, जिसे अब दुनिया ने महसूस कर लिया है, लिहाजा चीन के लिए आने वक्त में मुसीबत बढ़ने वाली है।

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चीन का निर्यात कैसे हो रहा है कम?

यूक्रेन युद्ध पर रूस के प्रति चीन के झुकाव ने यूरोप के साथ उसके संबंधों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। यूरोपीय संघ को चीन का निर्यात जून में एक साल पहले की तुलना में 14.2% कम हो गया।

भारत के साथ चीन का व्यापार पहली बार कम हो गया है और इंडो-पैसिफिक में अमेरिका और भारत ने जो व्यापारिक समझौते किए हैं, उसकी वजह से भारत की चीनी सामानों पर निर्भरता और कम होने वाली है और माना जा रहा है, कि भारत के अब चीन के साथ कारोबार तेजी से कम होंगे।

बाल्टिक देशों - लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया, जो विशेष रूप से रूस के दुश्मन हैं, उन्होंने पूर्वी यूरोप के साथ बातचीत के लिए चीन की राजनयिक प्रक्रिया को छोड़ दिया है।

लिथुआनिया ने ताइवान के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए हैं, जिसके बाद चीन ने पिछले साल जवाबी कार्रवाई करते हुए सभी तीन बाल्टिक देशों के साथ व्यापार को गंभीर रूप से कम कर दिया, विशेष रूप से लिथुआनिया से लगभग सभी आयात रोक दिया। इससे यूरोपीय संघ के बाकी सदस्य नाराज हो गए हैं, जिसका गंभीर नुकसान चीन के निर्यात को हो रहा है।

चीन ने पिछले कुछ महीनों में फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों के साथ शीर्ष स्तर की यात्राओं के और भी अधिक व्यापक आदान-प्रदान के साथ बिगड़े संबंधों को सुधारने की कोशिश की है। हालांकि, उसके बाद भी जर्मनी ने घोषणा की है, कि वो चीन के साथ अपने व्यापार को कम करेगा। जर्मनी ने गुरुवार को एक नई राष्ट्रीय रणनीति जारी की है, जिसमें चीन पर आर्थिक निर्भरता को कम करने का आह्वान किया गया है।

माना जा रहा है, कि आने वाले सालों में आर्थिक तौर चोट करके, चीन की आक्रामकता पर हथौड़ा चलाया जाएगा और इसके लिए तेजी से काम चल रहे हैं।

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