पाकिस्तानी चुनाव में पहचान को तरसतीं हिंदू महिलाएँ

पाकिस्तान दलित हिंदू
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भारत की सीमा से सटे पाकिस्तान के बड़े रेगिस्तानी ज़िले थरपारकर की ज़मीन गर्मी से तप रही थी.

लीला तारूमल अपने कच्चे घर की रसोई में लकड़ियां जलाकर परिवार के लिए खाना बनाने की कोशिश कर रही हैं.

सीधे सिर के ऊपर चमक रहे सूरज ने तपिश और ज़्यादा बढ़ा दी, लेकिन इस गर्मी का लीला पर कोई असर नहीं हो रहा है.

लीला यहां के स्थानीय रूढ़िवादी दलित हिंदू समुदाय से हैं, जहां अधिकतर महिलाओं के पास कोई पहचान पत्र नहीं है.

लेकिन अब पाकिस्तान में हालात बदल गए हैं और डिजिटल पहचान पत्रों के बिना रहना लगभग नामुमकिन सा हो गया है.

बीते चार सालों में लीला पाकिस्तान की नेशनल रजिस्ट्रेशन एंड डेटाबेस अथॉरिटी (नादरा) के कई चक्कर लगा चुकी हैं. लेकिन उन्हें अभी तक पहचान पत्र नहीं मिला है.

अपने साड़ी के पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए वो कहती हैं, "मैं अब थक चुकी हूं. मैंने उन्हें रिश्वत तक दी लेकिन कोई काम नहीं हुआ. न मैं बैंक खाता खोल सकती हूं, न ही सरकार से कोई मुआवज़ा ले सकती हूं. यहां तक कि मैं वोट तक नहीं डाल सकती."

पहचान पत्र की कमी

पाकिस्तान में 25 जुलाई को संसदीय चुनाव होने हैं. पाकिस्तान के चुनाव आयोग का मानना है कि देश में 1.21 करोड़ योग्य महिला मतदाताओं के पास पहचान पत्र नहीं हैं और लीला की तरह ही वो भी अपना वोट नहीं डाल पाएंगी.

जिन महिलाओं के पास डिजिटल पहचान पत्र नहीं हैं, उन्हें मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सकता है.

यहां से कुछ किलोमीटर दूर तुलसिम बालानी के घर के बाहर कई महिलाएं जुटी हैं. तुलसी भी दलित हैं. वो स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रही हैं.

उनकी चुनौती ये है कि उनके बहुत से समर्थकों के पास पहचान पत्र है ही नहीं.

हाथ में पहचान पत्र लिए वो अपने समर्थकों को समझाते हुए कहती हैं, "ये कार्ड बहुत महत्वपूर्ण है. ये आपके पाकिस्तानी नागरिक होने का सबूत है. अगर आप बेनज़ीर आय सहायता कार्यक्रम के तहत हर महीने आर्थिक मदद चाहती हैं, तो आपके पास ये होना ज़रूरी है."

हिंदू महिलाएं
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हिंदू महिलाएं

मुश्किल राह

पाकिस्तान के चुनाव आयोग के मुताबिक़ थरपारकर ज़िले में ढाई लाख के क़रीब महिला मतदाता हैं. चुनाव आयोग के एक अनुमान के मुताबिक़ इनमें से क़रीब दो लाख के नाम मतदाता सूची में है ही नहीं.

तुलसी का मानना है कि अज्ञानता की वजह से ये महिलाएं पीछे छूट गई हैं. लेकिन इसकी मूल वजह ग़रीबी है.

वो कहती हैं, "इनमें से अधिकतर महिलाओं के पास फीस चुकाने के पैसे नहीं हैं और न ही वो इन दूरस्थ इलाक़ों से नादरा के दफ़्तर तक की यात्रा का ख़र्च उठाने में सक्षम हैं."

तुलसी कहती हैं कि कई बार इन महिलाओं को अपने साथ अपने परिवार के अन्य सदस्यों को साथ ले जाना पड़ता है और अन्य दस्तावेज़ भी जुटाने पड़ते हैं. ये सब करना उनके लिए नामुमकिन सा हो जाता है.

वो कहती हैं कि इनमें से कुछ कई बार जाती हैं लेकिन फिर हार कर जाना बंद कर देती हैं.

कच्चे घर
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कच्चे घर

वो कहती हैं कि मतदाता पहचान पत्र न होने की वजह से सिर्फ़ उनकी राजनीतिक आवाज़ ही नहीं दबेगी बल्कि वो सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों से भी बाहर रहेंगी.

हाल के सालों में थरपारकर ज़िला उच्च शिशु मृत्यु दर की वजह से ख़बरों में रहा है. कमज़ोर बच्चों और ग़रीब मांओं की तस्वीरें थरपारकर की पहचान बन चुकी हैं. सूखे और ग़रीबी की सबसे ज़्यादा मार दुधमुहे बच्चों और उनकी मांओं पर ही पड़ी है.

इसके चलते सरकार ने सामाजिक कल्याण की कई योजनाएं भी शुरू की हैं. लेकिन पहचान पत्र न होने की वजह से वो इनका फ़ायदा नहीं उठा पा रही हैं.

थरपारकर में नादरा के ज़िला अधिकारी प्रकाश नंदानी कहते हैं कि बेनज़ीर सहायता कार्यक्रम की वजह से बहुत सी महिलाएं पहचान पत्र बनाने के लिए प्रोत्साहित हुई हैं.

अस्पताल में बच्चे
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अस्पताल में बच्चे

बेनज़ीर सहायता कार्यक्रम

पाकिस्तान की संघीय सरकार बेनज़ीर सहयाता कार्यक्रम चलाती है जिसके तहत ज़रूरतमंद महिलाओं को आर्थिक मदद दी जाती है.

ये आर्थिक मदद सिर्फ़ उन्हीं महिलाओं को मिल पाती है, जिनके पास पहचान पत्र होते हैं.

प्रकाश नंदानी कहते हैं, "इस कार्यक्रम से 90 हज़ार महिलाएं फ़ायदा उठा रही हैं. बीते कुछ सालों में थरपारकर की हज़ारों महिलाओं ने पहचान पत्र बनाने के आवेदन दिए हैं ताकि वो सरकार की इस योजना का फ़ायदा उठा सकें."

लेकिन अभी भी हज़ारों महिलाओं के पास पहचान पत्र नहीं है. नादरा ने पहचान पत्र बनवाने की फ़ीस भी माफ़ कर दी है ताकि चुनावों से पहले अधिक से अधिक महिलाएं अपने पहचान पत्र बनवा लें.

तुलसी ने भी महिलाओं के पहचान पत्र बनवाने के लिए कमर कस ली है. वो कहती हैं कि वो महिलाओं को अपने साथ लेकर नादरा के दफ़्तर जाएंगी और उनके पहचान पत्र बनवाएंगी.

पाकिस्तान के दलित हिंदू
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वो कहती हैं, "ये हमारे दलित समुदाय के लिए राजनीतिक झटका है. इसी वजह से सत्ता के गलियारों में हमें अहमियत नहीं दी जाती है, किसी को हमारी चिंता नहीं है क्योंकि चुनावों में हमारे समुदाय के बहुत से लोगों की गिनती ही नहीं हो पाती है. अब हम इसे ठीक करने के प्रयास कर रहे हैं. हम अपने लोगों की मदद कर रहे हैं और उन्हें इस बारे में जागरूक कर रहे हैं."

हालांकि ये समस्या सिर्फ़ थरपारकर तक ही सीमित नहीं है. ये समस्या देशभर में है और इसे ठीक होने में समय लगेगा. फिलहाल तो लगता है कि 1.21 करोड़ महिलाएं वोट नहीं डाल पाएंगी.

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