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Hilsa Diplomacy: दुर्गा पूजा से पहले मछली बैन, जानिए भारत के खिलाफ हिलसा का कैसे इस्तेमाल करता है बांग्लादेश?

Hilsa ban India-Bangladesh Diplomacy: हिलसा बांग्लादेश की राष्ट्रीय मछली है। स्थानीय रूप से इसे इलिश के नाम से जाना जाता है, इसे मछलियों में रानी के रूप में माना जाता है और यह बांग्लादेश और सीमावर्ती भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल दोनों की पाक पहचान का हिस्सा है।

पूर्व बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बंगाल की खाड़ी और नदियों में पाई जाने वाली इस मछली का इस्तेमाल अपने पश्चिमी पड़ोसी भारत के साथ संबंधों को बढ़ावा देने के लिए कूटनीति के एक उपकरण के रूप में किया।

Hilsa ban India-Bangladesh Diplomacy

लेकिन बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने सितंबर में भारत को मछली के निर्यात पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगाने का फैसला किया, जिससे भारत में दुर्गा पूजा के त्यौहार से पहले एक तरह का पाक संकट पैदा हो गया। पश्चिम बंगाल में हिलसा मछली को दुर्गा पूजा के दौरान बेहद पवित्र माना जाता है, इसलिए ये विवाद काफी बढ़ रहा है। त्यौहार के दौरान सरसों की चटनी में पकाई गई हिलसा मछली एक लोकप्रिय व्यंजन है। कुछ विशेषज्ञों ने इस कदम को नई दिल्ली के खिलाफ हसीना का समर्थन करने के लिए बांग्लादेश की तरफ से एक कूटनीतिक धमकी के रूप में देखा गया है, जिन्होंने अगस्त के अंत में देश से भागने के बाद भारत में शरण ले रखी है।

ढाका ने जोर देकर कहा है, कि प्रतिबंध का उद्देश्य इस साल कम फसल के बीच घरेलू स्तर पर मीठे पानी की मछली की लागत को कम करना है। हालांकि, इसने दो हफ्ते के भीतर ही अपने आदेश को वापस ले लिया।

लिहाजा जानना जरूरी हो जाता है, हिलसा मछली कैसे भारत और बांग्लादेश के बीच डिप्लोमेसी के केन्द्र में आ गई है?

Hilsa ban India-Bangladesh Diplomacy

भारत-बांग्लादेश कूटनीतिक विवाद के केंद्र में हिलसा मछली क्यों है?

बांग्लादेश दुनिया की 70 प्रतिशत हिलसा का निर्यात करता है। लेकिन अत्यधिक मछली पकड़ने, बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण यह बेशकीमती मछली दुर्लभ और महंगी होती जा रही है।

मछुआरों का कहना है, कि इस साल वे समुद्र की खराब परिस्थितियों के कारण पर्याप्त मात्रा में हिलसा पकड़ने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

निर्यात से इसकी कमी और बढ़ गई है, क्योंकि इसकी उच्च लागत के कारण अधिकांश बांग्लादेशी इसे खरीदने में असमर्थ हैं। 2024 में, स्थानीय बाजारों में 1.5 किलोग्राम हिलसा मछली की कीमत लगभग 15 डॉलर (1,800 बांग्लादेशी टका) तक पहुंच गई, जबकि पिछले साल यह लगभग 10.9 डॉलर (1,300 टका) थी।

550,000 से 600,000 टन प्रति वर्ष के हिसाब से, हिलसा मछली बांग्लादेश के कुल मछली उत्पादन में लगभग 12 प्रतिशत का योगदान देती है, जो लगभग 500,000 मछुआरों और फिश इंडस्ट्री से जुड़े कम से कम 20 लाख लोगों के लिए रोटी-रोटी का प्रतिबंध करती है।

हिलसा से बनने वाले कुछ पसंदीदा व्यंजनों में भापा इलिश (उबले हुए हिल्सा), इलिश पोलाओ (हिल्सा के साथ पिलाफ चावल) और शोरशे इलिश (सरसों की चटनी में हिल्सा) शामिल हैं।

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क्या बांग्लादेश ने भारत को हिलसा मछली के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है?

सितंबर में, ढाका ने हिससा पर निर्यात प्रतिबंध लगाया था, खासकर भारत को शिपमेंट को निशाना बनाया गया था। यह अक्टूबर में दुर्गा पूजा उत्सव से पहले किया गया था, जब सीमा पार से मांग आम तौर पर चरम पर होती है।

मत्स्य अधिकारियों ने बताया कि घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता देने और हिलसा की घटती आबादी को प्रबंधित करने के लिए प्रतिबंध आवश्यक था। बांग्लादेश के मत्स्य और पशुधन मंत्रालय की सलाहकार फरीदा अख्तर ने ढाका ट्रिब्यून को कहा है, कि "हम इलिश को निर्यात करने की अनुमति नहीं दे सकते, जबकि हमारे अपने लोग उन्हें खरीद नहीं सकते। इस साल, मैंने वाणिज्य मंत्रालय को दुर्गा पूजा के दौरान भारत को किसी भी इलिश निर्यात को रोकने का निर्देश दिया है।"

हालांकि, कुछ हफ्ते बाद, वाणिज्य मंत्रालय ने प्रतिबंध को उलट दिया और भारत को 3,000 टन की शिपमेंट को मंजूरी दे दी। मंत्रालय के बयान में कहा गया है, "निर्यातकों की अपील को देखते हुए, आगामी दुर्गा पूजा के अवसर पर विशिष्ट शर्तों को पूरा करते हुए 3,000 टन हिल्सा मछली (भारत को) निर्यात करने की मंजूरी दी गई है।"

भारत में हिलसा की कीमतों में तेजी से उछाल आया है, क्योंकि ढाका ने निर्यात में 1,000 टन की कमी की है। लेकिन सरकार बांग्लादेश में कीमतों को कम करने में नाकाम रही है।

सेंटर फॉर अल्टरनेटिव्स के तहत बांग्लादेश पीस ऑब्ज़र्वेटरी के एक शोध डेटा विश्लेषक खांडाकर तहमीद रेजवान ने कहा, "भारत में हिलसा की तस्करी करने वाले मछुआरों के एक सिंडिकेट ने कीमतों को ऊंचा रखा है।"

वहीं, भारत के एक विशेषज्ञ ने अलजजीरा की एक रिपोर्ट में कहा है, कि संक्षिप्त प्रतिबंध ने ढाका और नई दिल्ली के बीच सद्भावना और दोस्ती के प्रतीक के रूप में मछली का उपयोग करने की शेख हसीना की प्रथा से "एक मजबूत बदलाव" को चिह्नित किया।

शेख हसीना ने पहली बार मछली का इस्तेमाल कूटनीतिक उपकरण के रूप में तब किया था, जब वह 1996 में सत्ता में आई थीं। उन्होंने पड़ोसी देशों के बीच एक प्रमुख द्विपक्षीय मुद्दे, जल बंटवारे पर एक ऐतिहासिक समझौते से पहले तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु को हिलसा उपहार में दिया था। 2016 में, पूर्व बांग्लादेशी प्रधान मंत्री ने ममता बनर्जी को भी हिलसा की एक खेप भेजी थी। इसके एक वर्ष बाद, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, जो उस समय के एक प्रमुख बंगाली नेता थे, उन्हें भी मित्रता के प्रतीक के रूप में हिलसा मछली उपहार में दी गई।

लेकिन भारत-बांग्लादेश संबंधों के एक विशेषज्ञ के अनुसार अंतरिम सरकार, शेख हसीना की भारत समर्थक विदेश नीति से अलग रुख अपना सकती है। कोलकाता में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की एसोसिएट फेलो सोहिनी बोस ने अल जजीरा से कहा, कि अंतरिम सरकार का यह कदम दोनों देशों के बीच "सद्भावना से समझौता" करता है।

Hilsa ban India-Bangladesh Diplomacy

क्या हिलसा पर पहली बार प्रतिबंध लगा है?

नहीं।

बांग्लादेश ने जल-बंटवारे के समझौते पर विवाद के बाद 2012 में भारत को हिलसा निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। और फिर जनवरी 2018 में सद्भावना के तौर पर प्रतिबंध हटा लिया गया।

इसके अलावा, पिछले कुछ सालों में शेख हसीना की सरकार ने दुर्गा पूजा से पहले सैकड़ों टन मछली "उपहार" देकर गुड डिप्लोमेसी अपनाती रहीं।

बांग्लादेश समय-समय पर प्रजनन अवधि के दौरान हिलसा की सुरक्षा के लिए मछली पकड़ने पर स्थानीय प्रतिबंध भी लगाता रहा है। मुख्य प्रतिबंध अक्टूबर के दौरान 22 दिनों के लिए लागू किया जाता है और 2007 से यह चलन में है। हिलसा के प्रजनन के मौसम के दौरान यह प्रतिबंध उसे बिना किसी बाधा के प्रजनन करने का समय देता है। इसका नकारात्मक पक्ष यह है, कि इससे मछुआरों के लिए आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं, जिनमें से कई अपनी आजीविका के लिए हिलसा पर निर्भर हैं।

भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध क्यों तनावपूर्ण हैं?

भारत ने शेख हसीना के 15 साल के शासन के अंत तक उनका मजबूत समर्थन किया। इसके अलावा, नई दिल्ली ने बांग्लादेश से भागने से कुछ समय पहले 300 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत पर भी कोई बयान नहीं दिया। वहीं, शेख हसीना का भारत में शरण लेना भी बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को पसंद नहीं आया।

बांग्लादेश से बार बार शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग उठ रही है, लेकिन ये एक ऐसी मांग है, जिसे शायद ही भारत सरकार कभी मानेगी।

बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीएनपी का कहना है, कि भारत को बांग्लादेश की सिर्फ एक पार्टी से संबंध नहीं बनाना चाहिए, उसे हर पार्टी से बात करनी चाहिए। आलम ये है, कि शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद भारत ने सिर्फ एक बार बीएनपी के नेताओं से बैठक की है। वहीं, देश की अंतरिम सरकार मोहम्मद यूनुस को भी अभी तक प्रधानमंत्री मोदी ने मिलने का वक्त नहीं दिया है।

भारत की ये डिप्लोमेसी सख्त मानी जा रही है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है, कि भारत 'ब्लैकमेल' नहीं होगा। भारत की डिप्लोमेसी गंभीर है और उसी का नतीजा है, कि मालदीव के साथ संबंध भी अब पटरी पर आ चुके हैं।

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