सौ साल के हुए किसिंजर, बांग्लादेश युद्ध में भारत के खिलाफ भेजी थी नौसेना, क्यों कहा जाता है शीत युद्ध का हीरो?

किसिंजर को चीन और अमेरिका के बीच शांति कायम करने और बातचीत का रास्ता खोलने की उनकी नीति के लिए जाना जाता है। उन्होंने चीन में 2 साल बिताए और दोनों देशों के बीच सामान्य संबंध बनाने में चीनी राष्ट्रपति के साथ बातचीत की

Henry Kissinger Turns 100

सौ साल की उम्र तक जीने का सपना हर किसी का होता है मगर इतनी लंबी उम्र तक बेहद कम लोग जी पाते हैं। वहीं अगर बात चर्चित हस्तियों की हो तब तो इसकी संख्या और भी कम हो जाती है। 100 साल के माइलस्टोन को छूने वाली लिस्ट में अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर आते हैं।

किसिंजर आज यानी कि 28 मई को 100 साल के हो गए हैं। वह आज ही के दिन 1923 में जर्मनी में पैदा हुए थे। एडोल्फ हिटलर के अत्याचारों से परेशान होकर किसिंजर का परिवार 1938 में जर्मनी छोड़कर अमेरिका आ गया।

अमेरिका आने के बाद किसिंजर ने अमेरिकी सेना में अपनी सेवाएं दीं। इसके बाद उन्होंने मशहूर विश्वविद्यालय हार्वर्ड में पढ़ाई की और वहीं पर पढ़ाना भी शुरू कर दिया। देश-विदेश नीतियों पर उनकी किताबों को दुनियाभर में चर्चा मिली।

1968 में रिचर्ड निक्सन ने राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद किसिंजर को नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का चीफ बनाया। निक्सन और किसिंजर की जोड़ी इतनी जमी कि जब वे दोबारा राष्ट्रपति बने तो उन्होंने किसिंजर को विदेश मंत्री बना दिया।

हालांकि कुछ वक्त बाद ही पत्रकारिता से जुड़ा सबसे चर्चित वॉटरगेट स्कैंडल कांड हुआ। निक्सन का भंडाफोड़ हुआ जिसमें उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी। जेराल्ड फोर्ड नए राष्ट्रपति बने, मगर किसिंजर का पद बचा रहा।

किसिंजर के ऊपर कई देशों में हिंसा भड़काने, तख्तापलट कराने और नरसंहार के संगीन आरोप लगते हैं। आधिकारिक दस्तावेजों में इनकी पुष्टि भी हो चुकी है मगर उन्हें कभी इसकी सजा नहीं मिल पाई।

ऐसा कहा जाता है कि किसिंजर की वजह से कई देशों में राजनैतिक संकट पैदा हुआ। उनकी नीतियों के चलते लाखों लोग मारे गए। इसके बावजूद उन्हें 1973 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया।

हेनरी किसिंजर जितने कुख्यात हैं राष्ट्रवादियों के बीच उतने ही लोकप्रिय भी। उन्हें शानदार राजनीति-विज्ञानी और कठोर एक्शन लेने वाला डिप्लोमैट बताया जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि किसिंजर न होते तो अमेरिका, सोवियत संघ से शीत युद्ध नहीं जीत पाता और कम्युनिस्टों के आगे घुटने टेक देता।

यही वजह है कि अमेरिका में किसी भी दल का राष्ट्रपति चाहे वो डेमोक्रेट हो या रिपब्लिकन जब वाइट हाउस पहुंचता है, वो किसिंजर से एक बार जरूर मिलता है।

वह हेनरी किसिंजर ही थे जिनके प्रयास से चीन और अमेरिका करीब आ पाए। कुछ सालों के लिए ही सही मगर किसिंजर के चाल की वजह से ही साम्यवादी देश चीन पूंजीवादी देश अमेरिका के धड़े का हिस्सा बन पाया।

1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच बांग्लादेश युद्ध के दौरान ये किसिंजर ही थे जिनके आदेश पर अमेरिका ने भारत के खिलाफ अपनी नौसेना का सातवां बेड़ा भेज दिया था।

किसिंजर पर 1970 में चिली के राष्ट्रपति सल्वादोर अलांदे का तख्तापलट कराने और उनकी हत्या कराने का भी आरोप लगता है। हेनरी किसिंजर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फ़िकार अली भुट्टो को फांसी दिलाने के भी आरोप लगते हैं।

हेनरी किसिंजर ने अपने सौंवें जन्म दिन से ठीक पहले ब्रिटिश पत्रिका द इकॉनमिस्ट को एक इंटरव्यू भी दिया है। इसमें उन्होंने कहा है कि दुनिया में आज हालात ठीक वैसे हैं, जैसे प्रथम विश्व युद्ध के पहले थे।

उनका ये भी कहना है कि अमेरिकी शासन-तंत्र हाल के कुछ वर्षों में दक्षिणपंथी रुझान वाला हुआ है। किसिंजर ने ये भी कहा कि अमेरिका और चीन ने अपने को पूरी तरह समझा लिया है कि दूसरा उसका दुश्मन है।

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