हक्की-पिक्की: मुगलों से पराजित होकर दक्षिणी भारत पलायन करने वाली इस जनजाति को कितना जानते हैं?

31 हक्की-पिक्की आदिवासी सूडान में फंस गए हैं। ये शहर अल-फशेर में रह रहे हैं। ये लोग आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी बेचने के लिए सूडान गए थे। इनमें से 19 लोग कर्नाटक के हुनसूर, 7 शिवामोगा और 5 लोग चन्नागिरी के रहने वाले हैं।

HakkiPikki Tribe

सूडान में मिलिट्री और पैरामिलिट्री के बीच लड़ाई जारी है। इस लड़ाई में कर्नाटक के 31 आदिवासी फंस गए हैं। ये सभी हक्की पिक्की जनजाति के हैं। ये लोग आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी बेचने के लिए सूडान गए थे। सूडान हिंसा को लेकर ये जनजाति फिर से चर्चा में है।

हक्की पिक्की जनजाति को अर्ध खानाबदोश कहा जाता है। हक्की पिक्की जनजाति एक क्षत्रिय आदिवासी समुदाय से संबंध रखता है जिसका पैतृक संबंध महाराणा प्रताप सिंह के साथ होने का दावा किया जाता है।

कुछ रिपोर्टों के मुताबिक मुगल शासकों के द्वारा पराजित होने के बाद ये जनजाति उत्तर भारत से पलायन कर कर्नाटक और अन्य दक्षिणी राज्यों में बस गए। इस जनजाति के चार कबीले हैं- गुजरतिया, कालीवाला, मेवाड़ा और पनवारा।

हक्की पिक्की जनजाति की मातृभाषा का नाम 'वागरीबुली' है। यह एक इंडो-आर्यन भाषा है। वागरीबुली भाषा गुजराती से बहुत मिलती जुलती है। यूनेस्को ने हक्की पिक्की को लुप्तप्राय भाषाओं में से एक के रूप में लिस्टेड किया है।

हक्की पिक्की जनजाति कई भाषाओं के जानकार माने जाते हैं। इस जनजाति के लोग कन्नड़, तमिल, तेलगू और हिंदी में अच्छी तरह से बातचीत कर लेते हैं। इस जनजाति को बर्ड कैचर के रूप में जाना जाता है।

कन्नड़ भाषा में हक्की का अर्थ है पक्षी और पिक्की का अर्थ है पकड़ने वाला। पक्षी पकड़ना ही इस जनजाति का पारंपरिक व्यवसाय है। हक्की पिक्की जनजाति अपने विभिन्न स्वदेशी हर्बल उत्पादों विशेष रूप से हर्बल तेल के लिए जाने जाते हैं।

हक्की पिक्की जनजाति को हिंदू धर्म के विश्वासियों के रूप में माना जाता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, इस जनजाति की आबादी 11892 थी।

हक्की पिक्की जनजाति में 99 फीसदी लोग हिन्दू धर्म का पालन करते हैं। इसके अलावा उनकी धार्मिक मान्यताओं में कुछ अन्य धार्मिक विश्वास, अनुष्ठान और समारोह, संस्कार आदि शामिल हैं।

बाकी कई अन्य जनजातियों की तरह ये जनजाति भी मातृसत्ता के नियमों का पालन करती है। समुदाय के प्रत्येक कबीले के अपने देवता होते हैं। सबसे खास बात ये है कि एक ही देवता के उपासक आपस में विवाह नहीं कर सकते।

कोरोना वायरस के खतरों से जब दुनिया जूझ रही थी तब ये जनजाति सुर्खियों में आई थी क्योंकि लॉकडाउन के कारण इन्हें काफी कष्ट उठाना पड़ा था। हक्की पिक्की अपने लोगों के अनोखे नाम रखने के लिए भी जानी जाती है।

यदि आपका इस जनजाति के लोगों से संपर्क हो तो आपको हाईकोर्ट, डब्बा, चेन, होटल, टी, रिवॉल्वर, अमिताभ, जूही चावला, मोदी, गूगल जैसे दिलचस्प नाम सुनने को मिल जाएंगे। कहा जाता है कि इस जनजाति के लोग नाम रखने को कुछ खास महत्व नहीं देते हैं, हालांकि हर नाम के पीछे कोई न कोई कनेक्शन जरूर होता है।

1970 के दशक में कर्नाटिक सरकार द्वारा पक्षियों के शिकार के उनके व्यापार पर प्रतिबंध लगने के बाद, हक्की-पिक्की आदिवासियों का पुनर्वास किया गया। इस अभियान के दौरान हक्की पिक्की जनजाति को उनके वन आवासों से बाहर कर दिया गया और बेंगलुरु, हासन और मैसूर जैसी जगहों में रहने के लिए भेज दिया गया था।

इसके बाद से इस समुदाय के लोग खेतों में काम करने, साइकिल पर शहरों के चारों ओर घूमकर चाकुओं, कैंचियों को तेज करने जैसे कामों से जुड़ गए। इसके अलावा इस समुदाय के लोग जड़ी बूटियां भी बेचते हैं।

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