जर्मन राष्ट्रपति: हर एक पर है महामारी को मिटाने का जिम्मा

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लंदन। क्रिसमस के मौके पर जर्मन राष्ट्रपति फ्रांस वाल्टर श्टाइनमायर मे जनता से अपील की है कि कोरोना जैसी महामारी को हराने के संदर्भ में वे आजादी, भरोसा और जिम्मेदारी के मायने एक बार फिर से समझने की कोशिश करें. शनिवार को जर्मन टीवी पर प्रसारित होने वाले उनके संदेश की लिखित प्रति से यह पता चला है. राष्ट्रपति ने कहा है कि सरकारें अकेले इस महामारी को खत्म नहीं कर सकतीं बल्कि इसे हराना का जिम्मा हर एक को निजी तौर पर लेना होगा. राष्ट्रपति ने उन लोगों का खास तौर पर शुक्रिया अदा किया जिन्होंने कोविड के टीके लिए हैं और सभी तरह के नियम कायदों का पालन कर अपनी जिम्मेदारी निभाई है.

'सरकार की अकेले की जिम्मेदारी नहीं'

महामारी के दौरान बढ़ चढ़ कर भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, नर्सों, सरकारी अधिकारियों और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को प्रशंसा और धन्यवाद ज्ञापन करते हुए श्टाइनमायर ने कहा, "सरकार का तो यह कर्तव्य है और उसे करना ही होगा, लेकिन केवल सरकार ही नहीं. हमारी जगह सरकार तो अपने ऊपर मास्क नहीं लगा सकती है और ना ही हमारी जगह खुद टीका लगवा सकती है. यानि यह हममें से हर एक के ऊपर है कि अपना फर्ज निभाएं."

जर्मनी में टीका लेना सभी के लिए अनिवार्य नहीं है लेकिन फिलहाल इसे अनिवार्य बनाने पर विचार हो रहा है. टीके के पक्ष और विपक्ष वाले लोगों में लंबी बहस चलती आई है. इस पर टिप्पणी करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, "हम समझते हैं कि दो साल के बाद लोग तंग आ गए हैं, सब परेशान हैं, इसके कारण कई बार हमें अलगाव की भावना और कभी कभी तो खुलेआम गुस्सा भी देखने को मिल रहा है."

श्टाइनमायर ने अपील की है कि लोगों को अपने वैचारिक मतभेद के कारण आपस में फूट नहीं पड़ने देनी चाहिए. उन्होंने कहा कि एक लोकतंत्र में हर किसी की एक ही राय होना जरूरी नहीं है लेकिन यह याद रखना चाहिए कि "हम एक देश हैं. महामारी बीत जाने के बाद भी हमें एक दूसरे की आंखों में देखने की हालत में होना चाहिए."

पुरानी अवधारणाओं की याद

श्टाइनमायर ने उम्मीद जताई है कि "बेशकीमती पुराने शब्दों" का फिर से वजन बढ़ेगा. उन्होंने कहा, "भरोसे का क्या मतलब होता है? जाहिर है कि अंधविश्वास नहीं. लेकिन इसका मतलब यह तो हो सकता है कि ढंग की सलाह पर यकीन करें, भले ही मन की कुछ शंकाएं उस समय तक दूर नहीं हो पाई हों?"

राष्ट्रपति ने आजादी और जिम्मेदारी को लेकर अपनी समझ पर फिर से विचार करने की अपील की. उन्होंने कहा, "आजादी का मतलब क्या हर नियम के खिलाफ जोर शोर से विरोध प्रदर्शन करना है? क्या कभी इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि मैं खुद पर काबू रखूं ताकि सबकी आजादी को बचाया जा सके?" उन्होंने कहा कि इस तरह रवैया जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर सहमति बनाने में भी बहुत काम आएगा.

सकारात्मक बने रहें

अपने भाषण की शुरुआत में राष्ट्रपति इसी साल जर्मनी में आई भीषण बाढ़ का जिक्र करेंगे. जुलाई में देश के पश्चिमी हिस्से ने बाढ़ की तबाही झेली और अब तक हालात सामान्य नहीं हुए हैं. इसके अलावा इसी साल पश्चिमी सेनाओं ने अफगानिस्तान को छोड़ा जिसके बाद तालिबान ने फिर से वहां अपना कब्जा जमा लिया. ऐसे सभी घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, "जब हम इस साल पर नजर डालते हैं तो ऐसी कई चीजों को देख कर दुख होता है."

लेकिन बाढ़ की विभीषिका के दौरान और उसके कहीं बाद तक जिस तरह आम लोगों, स्वयंसेवियों ने आगे आकर बाढ़ पीड़ितों की मदद की उस पर राष्ट्रपति ने संतोष जताया. उन्होंने कहा, "मैं उन तमाम लोगों के बारे में सोच रहा हूं जिन्होंने बाढ़ पीड़ितों के साथ एकजुटता दिखाते हुए, दान और दूसरे तरीकों से मदद पहुंचाई." इस मौके पर जर्मन राष्ट्रपति ने देश के युवाओं के पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अडिग रहने की प्रशंसा की.

Source: DW

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