Gaza War: एक हजार दिन,लाखों जिंदगियां और 4 बड़े सवाल! फिलिस्तीनी राजदूत ने दुनिया से पूछा- आखिर कब मिलेगा जवाब

Gaza War 1000 Days: गाजा युद्ध शुरू हुए 3 जूलाई को 1000 दिन पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर भारत में फिलिस्तीन के दूतावास ने एक लंबा लेख जारी किया है। यह लेख भारत में फिलिस्तीन के राजदूत अब्दुल्ला एम. अबू शावेश (Palestinian Ambassador Abdullah Abu Shawesh) ने लिखा है।

इसमें उन्होंने गाजा युद्ध, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़े कई बड़े सवाल उठाए हैं।यह लेख किसी अदालत का फैसला या किसी अंतरराष्ट्रीय जांच रिपोर्ट नहीं है।

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ये ग़ज़ा की बर्बादी और लाखों दफन मासूम जिंदगियों के फैसलो को लेकर फिलिस्तीन की आधिकारिक राय और उसका पक्ष है। इसमें राजदूत ने चार बड़े सवालों के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की है। न्होंने इस लेख में चार बहुत ही सीधे और सरल सवाल उठाए हैं-क्यों? क्या? कौन? और कहां?

जख्म और तबाही के 1000 दिन... लेकिन क्या दुनिया ने कुछ सीखा?

इसकी शुरुआत एक भावुक सवाल से होती हैं। फिलिस्तीनी राजदूत अब्दुल्ला एम. अबू शावेश लिखते हैं कि 1000 दिन बीत गए। हजारों परिवार बिखर गए। लाखों लोग बेघर हो गए। हजारों बच्चों ने अपने माता-पिता खो दिए। लेकिन दुनिया आज भी कई जरूरी सवालों का जवाब नहीं दे पाई। देखा जाए तो 7 अक्टूबर 2023 सिर्फ एक तारीख नहीं थी। उस दिन ने पूरी दुनिया की राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और इंसानियत को एक नई चुनौती दी।

पहला सवाल- आखिर यह सब क्यों हुआ?

ग़ज़ा की तस्वीर को 7 अक्टूबर की घटना यानी महज उसी दिन से नहीं देखा जाना चाहिए। राजदूत अबू शावेश लिखते हैं-साल 1917 में ब्रिटेन ने 'बालफोर घोषणापत्र' के जरिए फलस्तीनियों की पुश्तैनी जमीन को दूसरों को सौंपने का वादा कर दिया था।

साल 1948 में लाखों फलस्तीनियों को बंदूक की नोक पर उनके अपने ही घरों से बाहर निकाल दिया गया, जिसे इतिहास में 'अल-नक़बा' (तबाही) कहा जाता है। तब से लेकर आज तक फलस्तीनी बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग अपने ही देश में बेघर शरणार्थी बनकर रह रहे हैं।

फिलिस्तीनी राजदूत ने कहा- गांधी जी के शांति के रास्ते पर चलने वाले फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने हमेशा शांति की बात की, लेकिन इस दर्द का कोई परमानेंट इलाज नहीं ढूंढा गया। अगर इतिहास को नजरअंदाज किया जाएगा तो असली वजह कभी समझ नहीं आएगी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि "7 अक्टूबर की घटना शून्य में नहीं हुई थी।"

दूसरा सवाल- 7 अक्टूबर को वास्तव में क्या हुआ?

7 अक्टूबर को जो कुछ हुआ, उसके बारे में दुनिया के सामने अलग-अलग दावे आए। कुछ आरोप लगाए गए। कुछ वीडियो सामने आए। कई बातें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चलीं। उसके बाद कई गंभीर आरोप भी लगाए गए। राजदूत का दावा है कि कुछ आरोपों के सार्वजनिक और स्वतंत्र प्रमाण अब तक सामने नहीं आए हैं। इसी वजह से उन्होंने मांग की है कि 7 अक्टूबर की घटनाओं की एक स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय जांच होनी चाहिए।

लेकिन उस सुबह के बाद जो हुआ, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। 73,000 से ज्यादा बेकसूर लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें सबसे ज्यादा संख्या नन्हे बच्चों और बेबस माताओं की है। बच्चों को भूखा रखकर तड़पाया जा रहा है, दवाइयों की कमी है और अस्पतालों को मलबे का ढेर बना दिया गया है। दुनिया भर में जब दूसरे देशों पर पाबंदियां लगती हैं, तो इस युद्ध को रोकने के लिए कोई आगे क्यों नहीं आता? यह दोहरा रवैया ही सबसे बड़ा दर्द है।

तीसरा सवाल- इस तबाही का जिम्मेदार कौन?

फिलिस्तीनी राजदूत अपने लेख में मानते हैं कि 7 अक्टूबर का हमला फिलिस्तीनी लड़ाकों ने किया था। लेकिन उनका कहना है कि कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उन्होंने सवाल उठाया कि दुनिया की सबसे आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था रखने वाला इजरायल उस दिन इतना बड़ा हमला कैसे नहीं रोक पाया?

अगर पहले से चेतावनी मिली थी तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? उन्होंने बताया कि इजरायल के मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीति ने जानबूझकर ऐसे हालात पैदा किए। गाजा और वेस्ट बैंक के फलस्तीनियों को आपस में बांटकर रखा गया, ताकि फलस्तीन के लोग कभी एक होकर अपनी आजादी और हक की मांग न कर सकें।

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चौथा सवाल- 'कहां' ले जाएगा हमें यह रास्ता?

फिलिस्तीनी राजदूत भारत के लोगों और पूरी दुनिया से एक बहुत ही भावुक अपील करते हैं। वे पूछते हैं कि: क्या ये 1000 दिन हमें कोई सबक सिखाएंगे? या हम ऐसे ही दिनों को गिनते रहेंगे?

वे कहते हैं-"इतिहास सिर्फ उन लोगों को गुनहगार नहीं मानेगा जिन्होंने जुल्म किया, बल्कि इतिहास उन लोगों को भी कटघरे में खड़ा करेगा जो यह सब देखकर भी चुप रहे। जिन्होंने सच का साथ देने की हिम्मत नहीं दिखाई।"

जब तक फलस्तीन के लोगों को उनके घर, उनकी आजादी और सम्मान से जीने का अधिकार नहीं मिलता, तब तक यह दर्द खत्म नहीं होगा। दुनिया को अब जागना होगा ताकि आने वाली नस्लों को फिर से ऐसे 1000 दिन न देखने पड़ें।

1000 दिनों की सबसे बड़ी कीमत किसने चुकाई?

इस जंग का सबसे बड़ा और अहम सवाल यही है कि आखिर इस तबाही की सबसे बड़ी किमत किसने चुकाई...जब इन एक हाजार दिनों को पीछे मुड़ कर देखें तब लगता है कि इस जंग में सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों को हुआ। वे लोग, जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था।

वे बच्चे, जो स्कूल जाना चाहते थे। वे मां-बाप, जो अपने परिवार के साथ सामान्य जिंदगी जीना चाहते थे। वे बुजुर्ग, जो अपने घर छोड़ना नहीं चाहते थे। आज ग़ज़ा के कई इलाकों में अस्पताल, स्कूल, सड़कें और घर बुरी तरह प्रभावित हो चुके हैं। बड़ी संख्या में लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। भोजन, दवा और पीने के पानी जैसी बुनियादी जरूरतें भी कई जगह चुनौती बनी हुई हैं।

क्या है दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती

ग़ज़ा की यह जंग सिर्फ दो पक्षों का संघर्ष नहीं रह गई है। इसका असर पूरी दुनिया की राजनीति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून पर भी पड़ा है। यही वजह है कि 1000 दिन पूरे होने पर फिर वही सवाल उठ रहे हैं- क्या इस संघर्ष का कोई स्थायी समाधान निकलेगा?

क्या आम लोगों की पीड़ा कम होगी? क्या आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह जंग, डर और तबाही के बीच जीने को मजबूर रहेंगी? या फिर दुनिया इस दर्द से कोई सबक लेकर शांति की दिशा में आगे बढ़ेगी? इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इतना तय है कि ग़ज़ा का ये हश्र दुनिया के इतिहास में हमेशा एक दर्दनाक अध्याय के रूप में याद किए जाएंगे।

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