Ganga Iftar Controversy: गंगा में इफ्तार पर बवाल, हिंदू महुआ को मुस्लिम सुबूही ने दिया ऐसा जवाब हो गया वायरल
Ganga Iftar Controversy: वाराणसी के गंगा घाट पर इफ्तार के दौरान चिकन खाने और उस पर हुई गिरफ्तारियों ने एक बड़ा कानूनी और धार्मिक विवाद खड़ा कर दिया है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने यूपी पुलिस को चुनौती देते हुए पूछा कि क्या गंगा में विसर्जित होने वाला मानव शरीर शाकाहारी है?
उनके इस तर्क पर सुप्रीम कोर्ट की वकील और 'सनातनी मुस्लिम मूवमेंट' की संस्थापक सुबूही खान ने कड़ा ऐतराज जताया है। सुबूही खान, जो राष्ट्र जागरण अभियान की राष्ट्रीय संयोजक भी हैं, ने इस तुलना को 'कुतर्क' बताते हुए इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अपमान करार दिया है।

Mahua Moitra Ganga Iftar: महुआ मोइत्रा का विवादित सवाल
सांसद महुआ मोइत्रा ने वाराणसी और यूपी पुलिस की कार्रवाई को कटघरे में खड़ा करते हुए एक ट्वीट किया। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक यह स्पष्ट नहीं होता कि गंगा में प्रवाहित 'मानव शरीर' (मांस और हड्डी) शाकाहारी है या मांसाहारी, तब तक चिकन खाने के आरोप में किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। महुआ का यह बयान सीधे तौर पर उन लोगों के समर्थन में है जो गंगा किनारे मांसाहारी इफ्तार को व्यक्तिगत आजादी का हिस्सा मानते हैं।
सुबूही खान का 'ईमान और आस्था' तर्क
सुप्रीम कोर्ट की वकील सुबूही खान ने महुआ के तर्क का जवाब देते हुए इसे 'इरादे और विश्वास' का मामला बताया है। सुबूही खान, जो 'सनातनी मुस्लिम मूवमेंट' के जरिए गंगा-जमुनी तहजीब की बात करती हैं, उनका कहना है कि जिस तरह मस्जिदों में सुअर का मांस प्रतिबंधित है, भले ही वह मांस ही क्यों न हो, उसी तरह गंगा की अपनी पवित्रता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म तर्क से नहीं, बल्कि वर्जनाओं और आस्था के सम्मान से चलता है।
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कानूनी पेच और पुलिसिया कार्रवाई
यूपी पुलिस ने इस मामले में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और सार्वजनिक स्थल की मर्यादा भंग करने के आधार पर कार्रवाई की है। कानून विशेषज्ञों और राष्ट्र जागरण अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि धारा 295A के तहत किसी भी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना दंडनीय है। पुलिस का कहना है कि गंगा घाटों की ऐतिहासिक और धार्मिक शुचिता बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है, जिसे किसी भी तर्क के आधार पर भंग नहीं किया जा सकता।
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आस्था बनाम अभिव्यक्ति की आजादी
यह पूरा विवाद अब इस मोड़ पर है कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी किसी धार्मिक स्थल की सदियों पुरानी परंपराओं से बड़ी है? जहां महुआ मोइत्रा इसे कानूनी और वैज्ञानिक चश्मे से देख रही हैं, वहीं सुबूही खान जैसे विचारक इसे 'सांस्कृतिक आक्रमण' मान रहे हैं। वाराणसी के स्थानीय लोगों का भी यही मानना है कि इफ्तार एक इबादत है, लेकिन इसे ऐसी जगह करना जहां मांसाहार वर्जित है, जानबूझकर विवाद को जन्म देना है।












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