महंगाई और मुसलमान, फ्रांस राष्ट्रपति चुनाव में दो बड़े मुद्दे, एक उम्मीदवार कट्टर, दूसरा महाकट्टर, कौन जीतेगा?
फ्रांस चुनाव में इस बार सबसे बड़े मुद्दे दो ही हैं। एक मुसलमान और दूसरा महंगाई। दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने मुसलमानों के नाम पर खूब राजनीति की है...
पेरिस, अप्रैल 24: फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव के लिए दूसरे दौर की वोटिंग हो रही है और फ्रांस के मतदाताओं को मौजूदा राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन के बीच किसी एक उम्मीदवार को देश का अगला राष्ट्रपति चुनना है। हालांकि, उम्मीदवार कई और हैं, लेकिन मुख्या मुकाबला इन्हीं दोनों नेताओं के बीच है और वामपंथी पार्टी इस चुनाव में तीसरे नंबर पर जा चुकी है।

मैक्रों को बहुमत मिलने का अनुमान
जनमत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 44 साल के मौजूदा राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के पास ठोस बढ़त है, लेकिन विश्लेषकों ने आगाह किया है, कि कम मतदान होने की स्थिति में आखिरी समय तक भी चुनावी नतीजे बदल सकते हैं। आपको बता दें कि, इस साल फ्रांस के 4 करोड़ 87 लाख मतदाताओं को देश का अगला राष्ट्रपति चुनना है, लेकिन चुनाव के पहले चरण में भी वोटिंग प्रतिशत कम रहा था। फ्रांस में मतदान स्थानीय समयानुसार सुबह 8 बजे शुरू हुए थे और शाम 7 बजे तक वोटिंग चलेगी। वहीं, कई बड़े शहरों में वोटिंग रात के 8 बडे तक चलेगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2017 के बाद से राष्ट्रपति मैक्रों की लोकप्रियता में थोड़ी कमी जरूर आई है, लेकिन यूक्रेन युद्ध ने उनकी चुनावी राजनीति में ऑक्सीजन फूंक दिया है।

महंगाई और मुसलमान बड़े मुद्दे
फ्रांस चुनाव में इस बार सबसे बड़े मुद्दे दो ही हैं। एक मुसलमान और दूसरा महंगाई। दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने मुसलमानों के नाम पर खूब राजनीति की है और उन्होंने देश की जनता से वादा किया है, कि अगर वो राष्ट्रपति बनती हैं, तो फ्रांस में हिजाब पहनने पर जुर्माना लगा दिया जाएगा। इसके साथ ही फ्रांस में कोविड के साथ स्थानीय मुद्दों की वजह से महंगाई काफी बढ़ गई है, लिहाजा मरीन ले पेन ने महंगाई पर भी लगातार राष्ट्रपति मैक्रों को घेर रही हैं। पिछले चुनावों के विपरीत, जहां आप्रवास, धर्म-बनाम-धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद फ्रांसीसी चुनाव के प्रमुख मुद्दे बने थे, वहीं इस बार का चुनाव मुसलमान, महंगाई और सिक्योरिटी के मुद्दे पर लड़ा गया है।

मैक्रों के खिलाफ माहौल
दक्षिणपंथी उम्मीदवार मरीन ले पेन ने लोगों की खरीदने की क्षमता कम होने का मुद्दा काफी जोर-शोर से उठाया है और चुनाव पूर्व ओपिनियन पोल में देश की 70 प्रतिशत जनता ने इस बात को माना था, कि मैंक्रों के पहले कार्यकाल के दौरान महंगाई बढ़ी है, जिससे लोगों की खरीदने की क्षमता में कमी आई है। इसके साथ ही देश की सुरक्षा और यूक्रेन युद्ध ने भी राष्ट्रपति चुनाव की कैंपेनिंग में प्रभाव डाला है। लेकिन, इनके बाद भी देश की एक बड़ी आबादी का विश्वास राष्ट्रपति मैक्रों में बना हुआ है और पहले चरण की वोटिंग के दौरान ये देखने को भी मिला है। वहीं, दक्षिणपंथी उम्मीदवार मरीन ले पेन रूस समर्थक मानी जाती हैं और 20 अप्रैल को चुनावी बहस के दौरान राष्ट्रपति मैक्रों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था।

कांटे की टक्कर की पूरी संभावना
हालांकि, बतौर राष्ट्रपति रहते हुए इमैनुएल मैक्रों ने मुसलमानों को लेकर फ्रांस में काफी सख्त कानून बनाए हैं और फ्रांस के मस्जिदों की विदेशी फंडिंग्स, खासकर तुर्की से फंडिंग को पूरी तरह से रोक दिया है, लेकिन उन्होंने हिजाब पहनने पर जुर्माना लगाने के मरीन ले पेन के बयान का सार्वजनिक तौर पर कड़ा विरोध किया है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि, फ्रांस के मुसलमानों को 'कट्टर और थोड़ा कम कट्टर' उम्मीदवारों के बीच किसी एक को वोट देना है। वहीं, ओपिनियन पोल ने लगातार भविष्यवाणी की है, कि मैक्रों दूसरा कार्यकाल जीतेंगे। चुनाव के पहले दौर में भी उन्हें बढ़त हासिल हुई है और मुकाबला 56-44 पर पहुंच चुका है, लेकिन दूसरे दौर की वोटिंग उन आदिवासी क्षेत्रों में होनी है, जहां मरीन ले पेन को पिचले चुनाव में बढ़त मिली थी, लिहाजा मुकाबला कांटे की टक्कर का है।

दो उम्मीदवार... काफी अलग विचारधारा
अल जज़ीरा के बर्नार्ड स्मिथ ने राजधानी पेरिस से रिपोर्टिंग करते हुए कहा कि, 'मरीन ले पेन आज फ्रांसीसी उम्मीदवारों की एक बड़ी पसंद है और दोनों उम्मीदवार भविष्य में फ्रांस को देखने के तरीके के लिए बहुत अलग नजरिया पेश करते हैं, लेकिन मरीन के पसंदीदा होने के बाद भी मैंक्रों को वोट मिल रहे हैं'। वहीं, दोनों उम्मीदवार वामपंथी उम्मीदवार जीन ल्यूक मेलेनचॉन के वोटर्स के बीच वोट बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। वामपंथी उम्मीदवार पहले दौर की वोटिंग के दौरान मरीन से सिर्फ एक प्रतिशत वोट से हार गये थे और चुनावी रेस से बाहर हो गये थे। अलजजीरा के रिपोर्टर का कहना है कि, "मेलेनचोन ने मैक्रों का समर्थन नहीं किया, उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि कोई भी वोट 'दक्षिण' की ओर नहीं जाना चाहिए।" यानि, उन्होंने मरीन ले पेन को वोट नहीं देने की अपील अपने समर्थकों से जरूर कर दी है, जिसका फायदा मैक्रों को हो सकता है।

सिर्फ 39 की उम्र में राष्ट्रपति बने थे मैक्रों
विश्लेषकों ने हालांकि चेतावनी दी है कि, मौजूदा राष्ट्रपति मैक्रों, जो 2017 में देश के सबसे युवा आधुनिक नेता के रूप में सिर्फ 39 साल की उम्र में राष्ट्रपति पद को संभाला था, वो इस चुनाव को जीत सुनिश्चित मानकर चुनावी मैदान मे जाने की गलती नहीं कर सकते हैं। हालांकि, यूक्रेन युद्ध की वजह से मैक्रों को चुनाव प्रचार में ज्यादा वोट मांगने का मौका नहीं मिल पाया। लेकिन, फिर भी यह तय माना जा रहा है, कि, वामपंथी मतदाता जिन्होंने 10 अप्रैल को पहले दौर में अन्य उम्मीदवारों का समर्थन किया था, उनका समर्थन अब मैक्रों को मिल सकता है। कुल मिलाकर...कुछ घंटों का इंतजार और बचा है और तय हो जाएगा, कि फ्रांस का अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा?












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